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दोहे के भेद -डॉ. सुमन शर्मा छंदशास्त्र में दोहे के अनेक भेदों का उल्लेख है। हिन्दी में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ का ग्रंथ ‘छन्द प्रभाकर’ सर्वाधिक प्रमाणिक और प्रचलित है। जो अन्य गन्थ लिखे गये हैं उन पर ‘छन्द प्रभाकर’ का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। छन्द प्रभाकर में कहा गया है कि ‘दोहे के अनेक भेद होते हैं पर यहाँ उनमें से मुख्यतः जो 23 हैं, वे ही दिए जाते हैं। इन 23 दोहों का भेद वर्ण, लघु और गुरू वर्गों की संख्या को आधार मानकर किया गया है। ये नाम और लघु गुरू संख्या इस प्रकार हैं-
भ्रमर-22गुरु और 4लघु (2) सुभ्रमर-21 गुरू और 6लघु (3) शरभ-20गुरू और 8 लघु (4)श्येन-19 गुरू और 10 लघु (5) मंडल-18 गुरू और 12 लघु (6) सर्कट-17 गुरू और 14लघु (7) करम16 गुरू और 16लघु (8) नर-15 गुरु और 18 लघु (9) हंस-14 गुरु और 20 लघु (10) गयंद-13 गुरु और 22 लघु (11) पयोधर-12 गुरू और 24 लघु (12) चल-11 गुरू और 26 लघु (13) बानर-10 गुरू और 28 लघु (14) त्रिनल-9 गुरू और 30 लघु (15) कत्छप-8 गुरू और 32 लघु 16 मच्छ-7 गुरू और 32 लघु (16)’ मच्छ-7 गुरू और 34 लघु (17) शार्दूल-6 गुरू और 36 लघु (18) अहिचर-5 गुरू और 36 लघु (19) ब्याल-4गुरू और 40लघु (20) बिडाल-3 गुरू और 42 लघु (21) श्र्वान-2 गुरू और 44 लघु (22) उदर-1 गुरू और 46 लघु (22) उदर-1गुरू और 46लघु (23)सर्प-0 गुरू और 48 लघु।
दोहों के उपर्युक्त नामों मे अधिकांश प्राणियों के नाम पर हैं जिससे यह संकेत मिलता है कि ये नाम दोहों की गति को आधार मानकर रखे गए हैं। उदाहरण के लिए दोहे का भेद ‘भ्रमर’ 22 गुरू और 4 लघु वर्णोंसे बुना जाता है जिसके 4 वर्ण अनिवार्यता के रूप में होते हैं। दो लघु वर्ण तो द्वितीय और चतुर्थ चरणों के अंत में अनिवार्य होते हैं तथा दो की अनिवार्यता प्रथम एवं तृतीय चरणों के समापन-स्तर पर लय को वांछित लचक देने के लिए होती है। ये दोनों विषम चरण होते हैं और विषम चरणों के अंत में(दोहे में) समण, रगण या नगण पड़ना चाहिए। स्पष्ट है सगण, रगण या नगण पड़ना चाहिए। स्पष्ट है सगण, रगण या नगण कोई भी हो एक लघु तो आना ही हैं रगण में भी एक लघु तो होता ही है। अतः चार लघु वर्ण दोहे की अनिवार्यता हैं। समचरणों के विषय में भी कहा गया है कि समचरण के अंत में दगण या तगण होना चाहिए यानी गुरू लघु होना चाहिए। यहाँ भी एक लघु की अनिवार्यता हैं। समचरणों के विषय में भी कहा गया है कि समचरण के अंत में जगण या तगण होना चाहिए यानी गुरु लघु होना चाहिए । यहाँ भी एक लघु की अनिवार्यता शास्त्र द्वारा प्रमाणित है । इन चार लघु वर्णों की चार मात्राओं को छोड़कर शेष मात्राएँ 4 बचती हैं जो 22 गुरु वर्णों से पूरी हो जाती है (दोहे को 47 मात्राओं के अर्द्धसम छन्दों की श्रेणी में माना जाता है )। इस अभिरचना (22 गुरु, 4 लघु) में लय में कम से कम मोड़ आते हैं जो संगीत की सहजता का आभास देते हैं । ‘भ्रमर’ साहित्य में संगीतात्मकता का प्रतीक भी है । उसका अर्थ है कि दोहे की यह संरचना लय और गेयता की दृष्टि से सर्वाधिक सहज और स्वभाविक है । शायद इसीलिए इसे छन्द शास्त्र के ग्रंथों में दोहा-भेदों की सूची में सर्वोपरि स्थान दिया गया है । डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ का एक भ्रमर दोहा दृष्टव्य है – कोई कैसे क्या करे, क्यों पावे आनन्द । आंसू डूबी सृष्टि में, हैं कष्टों के छन्द।।
डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ ने एक 46 मात्राओं के दोहे का भी उल्लेख किया है जिसका नाम है ‘विदोहा दोहा’ यह दोहा सम चरण में एक मात्रा कम रखता है अर्थात् विषम चरणों में 13-13 व सम चरणों 10-10 मात्राएँ होती हैं । यथा- ‘वंशी बोली राधिके तू अपने घर जा।’ (13+10=23) ‘मोहन के अध रानि पर, आज गई मैं आ ।।’ (13+10=23) 46 मात्राएँ ।
दोहे का प्रारम्भ जगण से नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे लय की रमणीयता भंग हो जाती है । फिर भी अनेक दोहाकारों ने ऐसे दोहे लिखे हैं । छन्द शास्त्र में ऐसे दोहे को चंडालिनी दोहा कहा गया है । जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ के अनुसार दोहे के पहले और तीसरे चरण के आदि में कोई ऐसे शब्द का प्रयोग न करे कि जिसके तीनों वर्ण मिलकर जगण का रुप (ISI) सिद्ध हो जाए ए। यदि ऐसा हो तो ऐसे दोहे को चंडालिनी कहते हैं । ये दूषित है अतएतव त्याज्य है । इस स्थिति के विषय में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानू’ का दोहा दृष्टव्य है- ‘जहाँ विषम चरणनि परै कहूँ जगन जो आनि बखान ना चंडालिनी, दोहा दुख की खानि ।’
यहाँ प्रथम चरण में ‘जहाँ’ शब्द में ‘विषय’ का ‘वि’ मिलाकर जगण ( ISI) बनता है इसलिए इस में लय भंग नहीं है तथा यह शास्त्रीय कसौटी पर खरा है, परन्तु तृतीय चरण का शब्द ‘बखान’ अपने आप में पूरा जगण है अतः यह लय भंग कर रहा है तथा छन्द शास्त्र में इसे वर्जित मानकर ‘चंडालिनी’ दोहा नाम दिया गया है ।
चन्द्रपाल शर्मा ‘शीलेश’ के एक दोहे को उद्धत कर डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ ने चरण गुप्त दोहे का उल्लेख किया है जिसे तीन चरणों में लिखा जाता है परन्तु पढ़ा चार चरणों की तरह जाता है । यथा- ‘गोरी गोरी मोहिनी लसै छबीली बाल । कारी कारी सोहिनी लटें छरीली चाल ।’
इसमें प्रथम दल के वर्ण क्रमांक2,4,8,7,10,12 और 13 वही वर्ण हैं जो दूसरे दल में इन्हीं क्रमांकों पर हैं । इस प्रकार इस दोहे को इस प्रकार लिख दिया जाता है- गो गो मो नी सै बी बा री री हि ल छ ली ल का का सो नी टें री चा
यहाँ प्रथम पंक्ति में एक-एक वर्ण के बाद मध्यवर्ती पंक्ति का एक-एक वर्ण लिया जाता है और इसी प्रकार तृतीय पंक्ति के एक-एक वर्ण के बाद भी मध्यवर्ती पंक्ति का एक-एक वर्ण लिया जाता है । इस तरह चाक्षुक दृष्टि से इस में तीन चरण हैं परन्तु छान्दसिक दृष्टि से इस में दोहे के चारों चरण व्याप्त हैं ।
दोहे के भेदों को निश्चित सीमा में नहीं बांधा जा सकता । मात्रिक गणों के संयोजन की चर्चा में जिन रुपों का विवरण दिया गया है उन्हें भी दोहे के भेदों के रुप में मूल्यांकित किया जा सकता है । इसके अतिरिक्त जो 23 भेद लघु-गुरु वर्ण व्यवस्था के आधार पर दर्शाये गये हैं उनमें यह आवश्यक नहीं होता कि दोनों दल इस व्यवस्था का समानान्तर रुप में अनुपालन करें । एक दोहे के चारों चरण अलग-अलग व्यवस्थाओं के हो सकते हैं। 16 गुरू वर्ण के ‘क्रम’ दोहों में 16 लघु वर्ण के स्थान अक ऐसे न हों तो उसमें भी एक नया दोहा भेद जन्म ले सकता है। एक दोहे में पहला लघु वर्ण प्रथम स्थान पर, दूसरे में दूसरे स्थान पर तीसरे में तीसरे स्थान पर हो तो कुल लघु वर्ण 16 होने पर भी ये तीनों अलग-अलग रूप भेद के सूचक होंगे। इस प्रकार यह भेद-संख्या बहुत आगे जा सकती है। मात्रिक गणों के अलग-अलग अंयोजन के चरणों को अलग-अलग बुनावट में या तारतम्य में रखकर भी दोहों की भेद संख्या 52 से काफी अधिक हो सकती है । संदर्भ- 1. छन्द प्रभाकर, जगन्नाथ प्रसाद भानू पृष्ठ-85 2. वही पृष्ठ 85-87 3. छन्द-क्षीरनिधि-ओमप्रकाश वरसैंया ओंकार, पृष्ठ-80 4. वहीं पृष्ठ-80 5. प्रतापशोभा (जनवरी-मार्च 1998) सम्पादक-प्रदीप नारायण सिंह, पृष्ठ 32 6. वहीं, पृष्ठ34 7. छन्द-प्रभाकर-भानु, पृष्ठ 84 8. वही, पृष्ठ 84 9. प्रतापशोभा (जनवरी-मार्च 1998, पृष्ठ 34) संपर्कः द्वारा अविनाश चन्द्र उपाध्याय A 11-गंगा त्रिवेणी अपार्टमेंट, सैक्टर 9 रोहिणी, दिल्ली-110085
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