|
|
||||||||||
|
|
||||||||||
|
|||||||||||
|
◊अपनी बात◊कविता◊छंद◊ललित निबंध◊कहानी◊लघुकथा◊व्यंग्य◊संस्मरण◊ कथोपकथन◊ भाषांतर◊संस्कार◊पुस्तकायन ◊बचपन◊हलचल◊विशेषांक◊सृजनधर्मी◊लेखकों से◊संपादक बनें◊चतुर्दिक्◊शेष-विशेष◊पुरातनअंक◊अभिमत◊मुख्यपृष्ठ |
|
|||||||||
अगर,मगर और शायद -पद्मश्री रमेशचन्द्र शाह शायद वह मान जाये। एक बार कहके तो देखूं ! क्या कहा – अक्लमाद को इशारा काफी ? झूठ, बिल्कुल झूठ । न उसमें अक्ल की कमी है, न मैंने अपने इशारों में ही कोई कसर छोड़ी है । यह खिड़की इसकी गवाह है। दो-चार और लोग भी होंगे ही । आखिर इशारे पकड़ने के लिए यह तो जरूरी नहीं कि इशारे समझे भी जायें ही । उसका रेडियो और क्या करता है; इशारे पकड़–पकड़कर ही तो वह मेरा जीना हराम किये हुए है । तो क्या इससे मैं यह समझूँ कि वह अपने रेडियो जितना ही जड़ है ? रेडियो जितना ही जड़ और रेडियो जितना ही अक्लमंद ? मगर सचमुच ऐसा होता तो फिर रोना ही काहे का था ! बस ज़रा कान-भर उमेठ देता उसके और सब-कुछ सही हो जाता ।
अगर वह सचमुच रेडियो होता ! अगर उसके सचमुच कान होते ! मगर वह सचमुच अलमंद आदमी है और अपने मतलब की बातें भी बखूबी पकड़ता और समझता है । मेरे इशारे भला वह क्यों पकड़ेगा और क्यों समझेगा ? वे उसके किसी मतलब के नहीं । तो क्या मैं बेमतलब इशारे करता रहा हूँ ? जिन्हें वह देखकर भी अनदेखा कर सकता है, सुनके भी अनसुना कर सकता है ?
आगर यह बेमतलब की इशारे बाज़ी छोड़के मैं सीधा अपने मतलब की बात करूँ तो ? तो....शायद वह मान जाये । एक बार कह के तो देखूँ । क्या हर्ज है ?
चलो यही सही । मगर ...अगर वह उल्टे मेरी ही ज़बान पकड़ ले और कहे- “ मेरी मर्जी । मैं ज़ोर से बजाऊँ या धीरे, यह मेरा अपना मामला है । तुम इसमें दखल देने वाले होते कौन हो ?” – तो मैं क्या कहूँगा ? मैं कुछ न कुछ तो कहूँगा ही- चुप तो नहीं ही रहूँगा । जब न्याय मेरे साथ है तो मैं अन्याय क्यों सहूँगा ? क्या मुझे नहीं मालूम कि न्याय का मतलब ‘लॉजिक’ यानी तर्क-बुद्धि भी होता है और वह चीज़ भी जिसे ‘जस्टिस’ या इन्साफ कहा जाता है ? तो ऐसी दोधारी तलवार हाथ में होते हुए भी मैं उस लट्ठछाप आदमी से पटखनी खाके लौट आऊँ-ऐसा कैसे हो सकता है ?
“हद हो गयी- अरे ! मुझे नहीं पहचानते ? मैं तुम्हारा पड़ोसी हूँ, पड़ोसी। और...यह तुम्हारा अपना मामला बिलकुल नहीं है- तुम्हें कुछ भ्रम हो गया दीखता है। तुम अपनी मर्जी़ के मालिक तो जरूर हो, बेशक हो। पर उसकी भी कुछ सीमा है और तुम असीम हर्गिज नहीं हो भाई। असीम होते तो पूरे ब्रह्माण्ड का सुख लूटते-जहाँ इस छोटे-से कस्बे के सबसे गंदे मुहल्ले में क्यों आते। क्या तुम यहाँ भी अपनी मर्ज़ी से आये हो ?”
“जी हाँ।”-अरे यह मैं क्या सुन रहा हूँ ? बिलकुल ठीक सुन रहा हूँ। यह उसी की आवाज़ है।
“फालतू बकवास मत करो। यह ज्ञान-ध्यान कहीं और छाँटों । आखिर यह मेरी दुकान है। मेरे गाहक गाना पसंद करते हैं । इससे मेरी बिक्री बढ़ती है। मैं बाज़ार में बैठा हूँ न कि मरघट में। तुम्हें सुनसान ही चाहिए तो जंगल में जाओ या भाड़ में जाओ। मुझसे मतलब ? तुमसे किसने कहा था- तुम इस मुहल्ले में मकान लो ?”
हद हो गई- यह आदमी सचमुच अनहद है : असीम और अपरंपार है। अगर मैं कारतूस होता तो इसके आर-पार हो जाता। मगर यह तो मुझे फूस की तरह उड़ाये दे रहा है। और मैं हूँ कि उसकी ढीठ आँखों की चुनौती झेलता खड़ा हूँ। कोशिश करना मेरा काम है । मैं फिर कोशिश करता हूँ । मगर मेरे साथ एक बड़ी दिक्कत है्। अपनी आवाज़ पर मेरा बिलकुल बस नहीं । मैं जितना सख्त पड़ता जाता हूँ- मेरी आवाज़ उतनी ही मुलायम पड़ती जाती है और मुझे अपनी इस कमजोरी पर बेहद कोफ़्त होती है।
“मगर भाई।...सुनो, यह मकान मैंने नहीं लिया। इस मकान में तो हम लोग तीन पुश्तों से रहते आ रहे हैं। तुम्हारे दादा मेरे दादा के और तुम्हारे बाबा मेरे बाबा के दोस्त थे- तुम्हें ज़रूर याद होगा। तुम्हें यह भी पता हो कि आज तक कभी ऐसी नौबत भी नहीं आयी। बस जब से तुम्हारी दुकान खुली तभी से यह बखेड़ा शुरू हुआ।”
“तो फिर मैं क्या करूँ ? दुकान बंद कर दूँ?” वह बुरी तरह झल्ला गया है। मैं अपना मौका ताडता हूँ। निशाना ठीक ही बैठा है। “अरे नहीं भैया, नहीं। तुम दुकान क्यों बंद करोगे। दुकान बंद हो तुम्हारे दुश्मनों की। सिर्फ यह रेडियों-बल्कि रेडियो भी नहीं-सिर्फ यह लाउडस्पीकर, जो तुमने अपनी दुकान में नहीं, मेरी कनपटी पै ठोक रक्खा है, सिर्फ इसी को बंद करने को कह रहा हूँ । आखिर और भी तो इतनी सारी दुकानें हैं मुहल्ले में औरों की भी ग्राहक होंगे ही । उन्हें भी बिकी बढ़ाने की फिक्र होगी ही । जब उनका भी काम इसके बिना ही चल रहा है तो तुम्हारा क्यों नहीं चल सकता ?”
“नहीं चल सकता, बस । कर लो जो करना है ।” यह मैं क्या सुन रहा हूँ ? खाली गद्दी मुझे घुर रही है । मुझे तमाचे-सा जवाब रसीद करके वह दुकान के भीतर ही कहीं गुम हो गया है । और वहीं से मुझे ललकार रहा है- मायावी दुदुंभि-सा । मैं ऋष्यमूक हो गया हूँ । एकदम खाली और उजाड़ । मैं सूर्यपुत्र नहीं हूँ; मैं इन्द्रपुत्र नहीं हूँ; मैं पवनपुत्र भी नहीं हूँ । नरो वा वानरो वा – मुझे मदारी बजा़र में छोड़ दिया गया है । मेरी पूँछ में तेल छिड़क के किसी ने आग लगा दी है और मैं बदहवास यहाँ से वहाँ दौड़ता फिर रहा हूँ । मेरी आग तभी बूझेगी जब मैं मुहल्ले को ही राख कर डालूँ । मगर मैं यह भी नहीं कर सकता । क्योंकि मेरा घर भी तो आखिर इसी मुहल्ले में है और अपना घर बचाके बाकी सब फूँक डालने की विद्या इस आखिरी वक्त में अब मैं कहाँ सीखने जाऊँ ? सुर्यपुत्र की कथा तो केवल कथा है । सुर्यपुत्र तो हमेशा अपनी दुर्दशा करवाने को ही आते हैं । चाहे वे कर्ण कहलाएँ अथवा बाली । जब त्रेतायुग में वह हुआ, द्वापर में भी वही हुआ तो फिर इस कलजुग में ही अब कौन सा चमत्कार घटित हो जाने वाला है ।
खैर-मैं, जो मदारी का तमाशा हूँ, बीच बाजार में अभी तक खड़ा हूँ । तमाशबीनों से घिरा हुआ । “जो करना है कर लो”- उसने कहा था । तो ठीक है मुझे कुछ कर ही गुज़रना चाहिए । ज्य़ादा दूर जाने की भी ज़रूरत नहीं है । यहाँ से सिर्फ पचास कदम की दूरी पर बाज़ार के सिरे पर ही थाना है । मैं थाने में रपट लिखाऊँगा । अब इससे कुछ कहने-सुनने की ज़रुरत नहीं है । पुलिस ही इससे निबट सकती है, वही इसे समझा सकती है कि लाउडस्पीकर लगाना जुर्म है । वैसे ही, जैसे बलात्कार जुर्म है । क्या कह बलात्कार नहीं है ? पुरे मुहल्ले के कानों के साथ । मगर.....
मगर....थाने की ओर लपकते मेरे पाँव सहसा ठिठक गये हैं । क्या मैं एक और तमाशा बनने जा रहा हूँ ? अगर सचमुच मुहल्ले के कानों के साथ बलात्कार हो रहा है और मुहल्ले को सचमुच इसका पता है तो फिर इस लाउडस्पीकर की क्या मजाल, जो यह साल-भार से यहाँ से डटा हुआ है ? और तो किसी को नहीं खला-और तो किसीने भी आज तक नहीं कहा कि “जनार्दन, ज़रा धीमा करो-हमारे कान फूटे जा सरे हैं- हमारे नींद में खलल पड़ रहा है...” आखिर क्यों नहीं कहा किसने उससे ? अगर उन्हीं को शिकायत नहीं है जो साल के तीन सौ पैंसठ दिन इसी कुहराम के भीतर जीते हैं तो ही कौन ऐसा अफलातून ईश्वरचन्द्र विद्यासागर हूँ जो आठ दिन भी यहाँ इस शोर के साथ नहीं निभा सकता ?
मगर न सही मैं अफलतून, न सही मैं विद्यासागर- क्या मुझे अपनी कोठरी में भी घड़ी-भर सुकून से बिताने का हक नहीं ? क्या मैं इतने से भी गया ? बड़ी मुश्किल से तो एक महीने की छुट्टी लेके यहाँ ठंडी हवा खाने और पहाड़ी एकांत में कुछ लिखने-पढ़ने को आता हूँ । क्या यह मेरा अपराध है कि जो घर मुझे विरासत में मिला, वह इस या उस ढलान पर न होकर बाज़ार के बीचोबीच ठुका हैं ? “यद्धात्रा निजभालपट्टलिखतम्....” मुझे अपने भालपट्ट पर लिखे हुए से कोई शिकायत नहीं है। क्यों हो ? मैं तो उसे पढ़ने से रहा । कोई और उसे पढ़ के मुझे बताये- इसमें भी मुझे रस नहीं।
मुझे शोर से शिकायत नहीं, बाजार में जितना शोर अमूमन रहता है, उतने का तो मैं आदी हूँ। मेरा पूरा बचपन और लड़कपन भी इसी शोर पर निछावर हुआ था। अर्थात् यह शोर मेरा आत्मीय है, सगा है, सहोदर है; फलसफे की ज़बान में कहूँ तो मेरी आत्मा का सुन्दर आवरण है। यों आमतौर पर उसके साथ मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। वह मुझे भला लगता है। मैं उसे नहीं न्यौतता, वही मुझे अपने पास बुलाता है। उसका मेरे आसपास रचे होना मुझे क्यों बुरा लगने लगा।मैं उसमें लिथड़ता नहीं । बाज़ार में निकलता भी कम ही हूँ। मिलना-जुलना भी लोगों से मेरा दैनिक कार्यक्रम नहीं है। घंटों बीराने में टहलने से फुर-सत मिले तब न ? आजकल बाज़ार में टहलना एक फैशन बन गया है। अच्छे-खासे लड़कों और लड़कियों को मल्ली बाज़ार से तल्ली बाज़ार और तल्ली बाज़ार से मल्ली बाज़ार अपनी शामें तबाह करते देखता हूँ तो जी कराह उठता है : हाय, हमारे ज़माने में तो ऐसा नहीं होता था। तब लगता है, कहीं मैं सचमुच बुढ़ा तो नहीं हो रहा हूँ ? जब देखो तब नयी पीढ़ी को कोसता रहता हूं ? कभी उनके अपाहिज सौंदर्य-वोध को, कभी उनकी प्रकृति-द्रोही संस्कृति को, कभी उनकी कुसंस्कारी प्रकृति को। आखिर मुझे हो क्या है ! क्या मैं अपने चालीसवें में ही सठिया गया ? अरे, नहीं भरता किसी का मन सहज प्रकृति से, या महज संस्कृति से, तो इसमें किसी का क्या दोष ! हमारे यहाँ अवसरों का कितना अकाल है। किस कदर निष्काम और निरानंद हमारी जीवन चर्या है। बेचारे इसी तरह अपना जीवन बहला लेते हैं-कुछ दरस-परस पा लेते हैं तो इसमें तुम क्यों कुढ़ते हो ? क्या गलत है इस सब में जो उसी जरूरत के तहत हो रहा है और जो तुम्हें फूटी आंखों नहीं सोहाता ।
मगर सोहाने की भली चलायी। सोहाता तो मुझे यह लाउडस्पीकर भी नहीं। एक तो वैसे ही अपने यहाँ सब कुछ ‘लाउड’ है- शायद ही दुनिया की किसी तहजीब में मौन की ऐसी महिमा गायी गयी हो और उसके साथ इस कदर कोलाहल जुड़ा हो। तिसपर लाउडस्पीकर तो हद है । अरे एड़ी से लगाके चोटी तक जो संस्कृति इस कदर ध्वन्यात्मक है, उसमें धव्नि-विस्तारक का क्या काम ! मगर नहीं साहब, नहीं, हम तो अखंड कीर्तन ही करेंगे और सबको सुनाके ही मानेंगे । हम सरस्वती को भी नहीं बख्शेंगे । क्या अलमोड़े के बाजार को, क्या हिन्दी की हाट को, हम यहाँ से वहाँ तक सिर्फ ध्वनि-विस्तारकों और ध्वनि-विस्तारकों से पाटकर ही चैन लेंगे ।
मैंने पहले ही कहा न कि बिना लाउडस्पीकर का अपना आत्मीय शोर हो तो वह चलेगा, बिलकुल चलेगा । मगर सरे-बाज़ार रेडियो और लाउडस्पीकर नहीं चलेगा; हर्गिज नहीं चलेगा । चाहे इसके लिए मेरी इस-गँवारू तो नहीं मगर बाज़ारू-मिट्टी को बिलकुल निपट अकेले ही क्यों न चलना पड़े । “इकला चलो रे” ऐसे मौकों के लिए ही तो कहा गया ।
मैं अकेला नहीं हूँ-अपने इस परमात्मीय शोर के साथ हूँ । उसमें लिथड़कर नहीं, बल्कि उसके साथ, वाकई साथ । बाजार से जंगल और जंगल से बाज़ार, यही मेरी दिनचर्या है, यही मेरी जीवन-यात्रा है । बहुत सुनसान भी मुझे बहुत देर तक नहीं सोहाता । जंगल मुझे खींचता है, बेतरह खींचता है; मगर जंगल में में मुझे मकान मिले मुफ्त भी, तो मैं वहाँ नहीं रह पाऊँगा । जंगल में रोज़ जाता हूँ : घंटों वहाँ पड़ा भी रहता हूँ ; मगर लौटकर फिर यहीं आता हूँ जहाँ मेरी जगह है । जहाँ मेर लोग, मेरी बोली-बानी, मेरी गालियाँ और असीसें, मेरा कलुष और मेरी निर्मलता, मेरा श्रम और मेरी विश्रांति हैं । मुझे जंगल जाने न मिले कुछ दिन, तो मैं छटपटा उठूँगा । लगेगा – मेरी छाती पर किसीने मन-भर का बोझ रख दिया है और मैं हिल-डुल भी नहीं सकता । मगर जंगल में ही रह जाना पड़े दो दिन तो मैं जानता हूँ, निश्चित रुप से जानता हूँ कि मैं फिर से बाजा़र लौटने के लिए, फिर से बाज़ार हो आने के लिए अकुला उठूँगा । यही मेरी नियती है; मैं जंगल हूँ, मैं बाज़ार में फिरता एक हाथ लम्बा झाड़ू और उससे उठती गर्द हूँ; दुकानों में उमड़ता कच्चे कोयले का ज़हरीला धुआँ हूँ- मुझी में एक के बाद एक दुकानों के पट खुलते हैं, ग्राहकों की आवाजाही, मोल-तौल, भाव-ताव, गाली-गुफ्ता, मान-मनौवल, कानाफूसी, चीख-पुकार, धौंस-घपट्टा, फसक-फराल... सब मेरे ही घट में घटते हैं । यह जीवन की दुकान मानो मैंने ही खोली है जहाँ कुछ भी बिना मोल चुकाये नहीं मिल सकता, जहाँ...“जीवन वह कलेवा है जो जीवन देकर ही खरीदा जा सकता है ।” ....हाँ, मैं ही यह बाज़ार हूँ-यह लोगों की उमड़ती नदी....लोगों की तरह-तरह की आवाजें और छुप्पियाँ....लोगों का सरसराता-हहराता जंगल....जो मुझे चाहों ओर से घेरकर छा लेता है जो मुझे लोरी-सा सुलाता है, प्रभाती-सा जगाता है, चुटकुले-सा हँसाता है, मर्म-व्यथा-सा रुलाता है । अज्ञेय की एक कविता मुझे जाने क्यों याद आ रही है....
पर....सबसे ज्यादा मैं वन के सन्नाटे के साथ मौन हूँ क्योंकि वही मुझे बताता है मैं कौन हूँ....
यह कविता मुझे पकड़ती है, गहरे कहीं पकड़ती है। मगर मुझ में कुछ है जो इस पकड़ाई से छुट जाता है और छूटकर उसे देखता है उस आखिरी पंक्ति के ‘वही’ को। मुझे में कुछ अटकता है। नहीं ! यह सिर्फ वन का सन्नाटा ही नहीं है जो मुझे बताता है कि मैं कौन हूँ । उसके अलावा-उसी से लगा-लिपटा-यह बाजारू शोर, नहीं मानव-कोलाहल भी है। और वह भी मुझे बताता है, मैं कौन हूँ । यह शोर और वह सन्नाटा ही कहीं आपस में गुँथ कर मुझे उस लाउडस्पीकर से बचा सकता है जो वहाँ उस दुकान में नहीं, मेरी कनपटी पर जड़ा हुआ है और जिसकी रपट लिखाने मैं थाने की ओर भाग रहा था। मगर क्या सचमुच ? नहीं ! शायद । o पद्मश्री रमेशचन्द्र शाह भोपाल
|
|||||||||||
|
|
|
|
|||||||||
|
◊अपनी बात◊कविता◊छंद◊ललित निबंध◊कहानी◊लघुकथा◊व्यंग्य◊संस्मरण◊ कथोपकथन◊ भाषांतर◊संस्कार◊पुस्तकायन ◊बचपन◊हलचल◊विशेषांक◊सृजनधर्मी◊लेखकों से◊संपादक बनें◊चतुर्दिक्◊शेष-विशेष◊पुरातनअंक◊अभिमत◊मुख्यपृष्ठ |
|||||||||||
|
|||||||||||