|
|
||||||||||
|
|
||||||||||
|
|||||||||||
|
◊अपनी बात◊कविता◊छंद◊ललित निबंध◊कहानी◊लघुकथा◊व्यंग्य◊संस्मरण◊ कथोपकथन◊ भाषांतर◊संस्कार◊पुस्तकायन ◊बचपन◊हलचल◊विशेषांक◊सृजनधर्मी◊लेखकों से◊संपादक बनें◊चतुर्दिक्◊शेष-विशेष◊पुरातनअंक◊अभिमत◊मुख्यपृष्ठ |
|
|||||||||
दोपहर में गाँव
घर की
खपरैलों के नीचे
शकुन्त माथुर की जीवंत पंक्तियों को जब उर्दू लिपि के
अंदाज से पढ़ता हूँ तो मेरे गाँव की दोपहर एक बारगी मुझे
बाँहें फैलायें बुलाने लगता
है । दूर क्षितिज तक फैली उजली धूप के समुद्र में स्वयं को
तैरते हुए देखता हूँ ।
दोपहर प्रकाश की उमंग का समय है। दोपहर किरणवृष्टि की चरम
बेला है । थोड़ी तपन,
थोड़ा
अल्हड़पन,
थोड़ा-थोड़ा बेधड़कपन । दोपहर यानी युवा तुर्क । एक संपूर्ण
युवक में मात्र
आक्रोश नहीं होता,
इसमें स्नेह और प्रेम की असीम संभावनाएँ भी होती हैं ।
दोपहर
सिर्फ अग्निवर्षा वाली अवधि का नाम नहीं,
उसमें शस्य की मुस्कान,
प्रकृति नैरन्तर्य
की सुरक्षा जैसी अनंत कामनायें भी होती है । दोपहर से
ज्यादा रोचक ज्यादा सुन्दर
भला कौन-सा कालखण्ड है
?आप
कहेंगे,
यह कैसी उलटबाँसी
?
दोपहर और वह भी रोचक !
संवेदना-उपासक से भोर की प्रभा का विस्मरण,
संध्या सुंदरी के लावण्य के प्रति
अनाकर्षण । भैया ! दोपहर है ही ऐसी अपने गाँव की-
गाँव दोपहर से मुँह नहीं चुराता । दोपहर में उसकी
संघर्ष-चेतना
तीव्रतम हो जाती है । उसके लिए दोपहर
'तपन'
का नहीं,
बल्कि लगन का प्रतीक है । वह
दोपहर में नगर-सा थम नहीं जाता । भोगवाद चाहे इसे गाँवों
की,
गाँव वालों की नियति
मानने का दंभ पालता रहे,
पर वस्तुत: यह उसका भ्रम है । गाँव में विश्रान्ति का नाम
मृत्यु है । कृषि आधारित जीवन पध्दति में दोपहर गर्मी की
भीषणता से बचने के लिए
कुरिया में बिलम जाने का समय नहीं,
वहाँ तो वही किसान,
मजदूर,
चरवाहा,
कुम्हारा,
लुहार ही अपने भविष्य की आभा की कल्पना कर सकते हैं,
जो घाम से घबराये नहीं,
छांव
में भटक जाये नहीं ।
गाँव समयोपासक होता है । उसकी मनीषा में समय के किसी भी
अंश के प्रति दुराग्रह नहीं होता । वह समय की साधना करता
है,
उसे बाँधता नहीं । वह
समय के साथ स्वयं को साध लेता है । क्यों न सधे
?
आखिर कर्मयोगी श्रीकृष्ण की कथाओं
को उसने भी सहेज जो रखा है- श्रीकृष्ण स्वयं को सूर्य में प्रतिष्ठित करते हैं । सूर्य का अर्थ तेजोमय है । सूर्य प्राचीन से प्राचीन और नवीन से नवीन सभी भाषाओं के साहित्य में तेजस्विता का प्रतीक है । ग्रीक भाषा में सूर्य को 'हेलियस' कहा गया है । यानी तेजवान । सूर्य ही संसार में समय-चक्र का ऑपरेटर है । समय-घड़ी का सारा खेल सूर्य किरणें ही रचती हैं। सूर्य किरणों की बोली सुनकर पृथ्वी कर्मक्षेत्र में प्रविष्ट कर हर दिन एक नया पाठ जोड़ता है और सूर्य किरणों के इशारों से पृथ्वी थक-माँदकर सो जाती है । सूर्य-किरणों से बचने का सीधा-सीधा मतलब अंधकार का आमंत्रण है।
प्रियतमा के बिलगाव के लपेटों से दोपहर की शिथिल पड़ जाती हैं । जंगल साँय-साँय करने लगता है । अज्ञात भय मन को लीलने लगता है । वह नितांत अकेलेपन की खाई में धँसने लगता है । ऐसे में कौने का काँव-काँव ही उसका संगी-साथी बन जाता है । कड़वी वाणी भी यथासमय रसदार लगती है । है न इसमें दोपहर की भूमिका!
कवियों ने दोपहर को त्रासद
निरूपित कर उसे जिस तरह त्याज्य समय की श्रेणी में रखा है,
वह उनकी एकांगी भावुकता
है । मुझे गरमी का दोपहर वाला चेहरा सबसे अधिक रुचता है ।
छुटपन से ही । ऐसी दोपहर
के अनगिनत रंग हैं मेरे मन में । ग्रीष्म की दोपहरी आग का
गोला लेकर ही नहीं आती,
उसके साथ हम बच्चों को अतिरिक्त स्नान का उपहार भी मिलता
है । उन दिनों मुझे
त्रिसंध्या का संस्कार भी कहाँ पता था पर सुबह-शाम के
अलावा मध्याह्न -स्नान से
चुकता भी न था । गरमी इतनी पडती कि घर से दोपहर में फिर से
नहाने की स्थायी आज्ञा
मिली हुई होती । घर के पास ही तालाब था,
मित्रगण के इकट्ठे होने की देरी रहती,
फिर
जो डुबकी लगती कि जलपाँखी भी किनारा पकड़ लेती । मेरा
सिध्दार्थ मन सरस हो उठता ।
सूर्यदेव की ओर नजरें जातीं,
तो वे भी सरल दीखते । मुझे लगता,
जैसे उन्हें हमारी
जलक्रीड़ा भा गई हो-
गाँव से लगा हुआ अमरैया हो । सुरसुरी हवा चली, डालें लहराईं नहीं कि पीले-पीले रसीले आम टपकने वाले हों, तो आप ही बताइये कोई घर के भीतर कैद रह पायेगा ? चाहे चैत बौखलाया हुआ क्यों न हो । ऊपर से कोकिल से बतियाने का अवसर हो । चैत की दोपहरी में गाँव के बच्चे भी कोकिल हो जाते हैं । उधर से कोकिल कूकता है, इधर से बच्चे । बचपन के उन दिनों में कोकिल हो जाने का रस ही कुछ और है । एक रस और है मन में -नई नवेली कोकिला को दूर से निहारने का रस । मैं ही क्यों, सारा गाँव उस रस से भींगने के लिए उमड़ पड़ता था । पगडंडी की धूल में आग लगी है तो लगने दो । पाँव में पनही नहीं है तो रहने दो । किसे मतलब है कि बरात किस गाँव की है, कहाँ जा रही है, किस जात की है ? मतलब है तो बस दूल्हे-दुलहिन को एक नजर देखने की। आप भी लें उस परम रस का आनंद - ठंडी और घनी छाया देखकर सारे बरातियों ने अमराई में दोपहर गुजारने का मन बना लिया है । बाजा वाले भी पस्त हो चुके हैं । सकुचायी-शरमायी सी दुलहिन कहे तो किससे कहे कि उसे बड़ी जोरों की प्यास लगी है । यहाँ न माँ है, न छोटी बहन, न ही भाभी । उनसे भी कहे तो कैसे कहे कि अजी सुनिए, डोला रुकवाएँ ना ! लोक की दृष्टि से यह भला बच सकता है ! लोकगीतकार से रहा नहीं जाता । वह गुनगुना उठता है-''जरगे मझनिया के घाम,आमा तरी डोला उतार दे ।'' डोले से दुलहिन को उतारा जाता है । यहाँ दुलहिन के दाई-ददा नहीं तो क्या! इस गाँव में तो बेटियाँ हैं । जहाँ बेटियाँ होगीं, वहाँ महतारी भी होगी । ददा भी होगा। भाई भी होंगे और बहनें भी । देखते ही देखते गाँव से पानी आ जाता है और पानी के साथ लाई-मुर्रा भी । दोपहर बीतते ही बराती हँसते-खिलखिलाते अपने गाँव की ओर चले जाते थे, पर जाने क्यों सारे गाँव को लगता कि उनके घर से एक बेटी विदा हो गई या एक बेटी उनके घर लक्ष्मी बन कर आ गई । अब बरात तो ट्रैक्टर,जीप, बस के बिना निकलती ही नहीं । अब वे गाँव भी कहाँ रहे ! हाँ अमराई वहीं है, पर उस अमराई में दोपहर का सुनसान ही पसरा हुआ है।
रामजन्म का समय संघर्षों से विमुखता का समय नहीं हो सकता
है । यह
उछाह-मंगल का प्रवेशद्वार है । दोपहर मथुरा के ग्वाले-सा
आता है,
जिसके पास धूप का
दूध है । जिन्हें संपुष्ट होना हो,
जिन्हें कंस से जूझना हो,वे
जितना चाहें पी
लें,
कभी नहीं ख्रघने वाला । आजकल के पढ़े-लिखों को,
अपनी गोरी काया की माया में
उलझे रहने वालों को समझ में आये,
न आये,
गाँव आज भी दोपहर का माहात्म्य बखूबी समझता
है और मेरे जैसे किसी गाँव में पला- बढ़ा कवि संतोषरंजन भी
-
o जयप्रकाश मानस रायपुर, छत्तीसगढ़
|
|||||||||||
|
|
|
|
|||||||||