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राष्ट्र भाषा और हमारा गणतंत्र - डॉ. शोभाकांत झा
व्याकुल करने वाली विसंगतियाँ तो अनेक हैं । उन सब पर चर्चा करने का न अवसर है न अवकाश ।यहाँ राष्ट्रभाषा हिन्दी के संदर्भ जो विसंगतियाँ है, उसके साथ हमारी आज का जो सलूक है, सरोकार है, उन्हीं संदर्भों पर कुछ चर्चा की जा रही है। आज यह हाल है कि भारत के नैनिहाल हिन्दी भाषा, हिन्दी अंक, हिन्दी-संस्कृति सबसे दूर होते होते चले जा रहे हैं । वे वन, दू, थ्री जानते हैं, एक, दो तीन नहीं। जानते भी हैं तो लिखना नहीं आता । वे माँ, बाबू जी, दादा-दादी ,काका-काकी, मामा-मामी, पिता को डैडी और हर गैर सरोकारी को अंकल कहते हैं-चाहे वे किसी उम्र के हों ।
मातृभाषा में बोलना-लिखना लज्जा की और हिन्दी में बोलना पिछड़ापन है। हम हिन्दी भी बोलते हैं तो इंगलिश रूप में। आधी हिन्दी आधी अंगरेज़ी। हमारे यहाँ काम करने वाली बाई भी कभी हमसे ही कह बैठती है- “महराज ! काबर टेंशन” लेते हैं ? साठ के करीब हमारी स्वतंत्रता पहुँच रही है, परन्तु अपनी भाषा में शासन तंत्र चलाने में हमें लाज आती है और अंगरेज़ी में हम गौरवान्वित होते है। तुर्की और इजराइल जैसे देशों ने अपनी आजादी के दूसरे ही दिन से विदेशी भाषा को छोड़कर अपनी भाषा में राज-कार्य आरंभ किया था और एक यह हिन्दुस्तान है....
गाधी- जैसे राजनीति, समाज और धर्म के महात्मा ने राष्ट्रभाषा हिन्दी की सामासिकता और ताकतों को पहचाना था । गैर हिन्दीभाषी होकर भी उन्होंने हिन्दी को आजादी के आन्दोलन का अभिन्न हिस्सा बनाया था। जागरण का जरिया बनाया था। उनका स्पष्ट मत था कि यदि हमें अंग्रेजों से लड़ना है तो उसकी अंगरेज़ी के विरुद्ध हिन्दी को खड़ा करना होगा । मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा देनी होगी । जन तन-तक पहुँचने के लिए, उन्हें जगाने के लिए उनकी ही भाषा में बात करनी होगी । तभी हम आजादी पा सकते हैं । आजादी को अर्थ दे सकते हैं।
गाँधी किसी भाषा को न खराब समझते न उसके वे शत्रु थे । उनका स्पष्ट मन्तव्य था कि- “युवक अंगरेज़ी और दुनिया की दूसरी भाषाएँ खूब पढ़ें । लेकिन, उनसे मैं आशा करूगा कि अपने ज्ञान का प्रसाद भारत को औऱ सारे संसार को उसी तरह प्रदान करेंगे, जैसे बोस,राय, और, स्वयं रवीन्द्र नाथ ने प्रदान किया है। मगर मैं यह हरगिज नहीं चाहूँगा कि कोई भी हन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाये, या उसकी उपेक्षा करे था उसे देख कर शरमाये अथवा यह महसूस के कि अपनी मातृभाषा के ज़रिये वह ऊँचा चिंतन नहीं कर सकता है।” (सत्य का आग्रह)
बहुत सारी बातें गाँधी ने कही, किंतु उनके ही अनुयायियों ने उनके साथ ही उनके मन्तव्यों को भी दफना दिया । हमारी राजनीति पाखंडों का अखाड़ा बन गई है तो लोकतंत्र बाहुबलियों की रखैल । जिस बंदे मातरम और हिन्दी ने आजादी का विगुल बजाया था, उनकी आये दिन हो रही अवमानना किसी से छिपी नहीं है। .......‘वन्देमातरम’ के अमर गायक स्वयं वंकिम चन्द्र ने कहा था- “बाबू बहुत बातूनी होंगे, जो विदेशी भाषा में निपुण औऱ अपनी भाषा के विरोधी होगें कुछ बहुत विद्वान बाबूओं का जन्म होगा जो अपनी मातृभाषा में बातचीत करने में असमर्थ होंगे । विष्णु की भाँति उनके दस अवतार होंगे- कलर्क, आध्यापक, एकाकउंटेण्ट, डॉक्टर, वकील, न्यायाधीश, जमींदार, सम्पादक और, बेरोजगार । वे भारत की सदा आलोचना करेंगे और विदेशों की तारीफ़ । बाबू घर पर पानी पिएंगे और मित्रों के साथ मदिरा । वे अपने मित्रों, समाज और जनता को अपमानित करेंगे । उनके चाटुकारिता करने और करवाने के ही रिश्ते होंगे ।”
भाषा केवल शब्दों का संगठन या जखीरा नहीं । वह हमारी मानसिकता, संस्कृति, सोच-सरोकार का परिचायक भी है। कम से कम हम भारतीयों के मन में अंगरेज़ी आत्मीयता नहीं, पृथकता, श्रेष्ठता, धौंस-धाक, खौफ पैदा करती है। अंग्रजीदां अपने को विकसित और दूसरे की पिछड़ा समझते हैं । ठीक उसी तरह जिस तरह कोई-धूर्त लोग या प्रांत, छत्तीसगढ़ जैसे सीधे-सादे धर्मप्राण प्रांत को पिछड़ा समझते हैं । डॉ. विद्यानिवास मिश्र के अनुसार “अंगरेज़ी एक जबरदस्त साजिश है। यह दिमागी स्लेट को धो-पौंछकर ही सीखी जाती है। कम से कम हमारे देश में समस्या नहीं पर है। अंगरेज़ प्रभु हों, न हों, अंगरेज़ी प्रभुता पायेंगी-” (साहित्य अमृत, अंक, सितम्बर 2004)
गाधी जी ने जातिवाद, वर्गवाद शोषक और शोषित के भेदभाव को मिटाने के लिए कई स्तर पर आन्दोलन आरंभ किया था। इसलिए उन्होंने अंगरेज़ी और अंगरेज़ी सभ्यता का विरोध किया था । अंगरेज़ी सभ्यता को उन्होंने ‘चांडाल सभ्यता’ की संज्ञा दी थी, क्योंकि वह वर्गभेद और शोषण की प्रवृत्ति पैदा करती है गला काट प्रतियोगिता को जन्म देती है । संभव है, आनेवाले दस-बीस साल के भीतर भारत में दो वर्ग बन जाये – एक अंगरेज़ी बोलने-पढ़ने वालों का वर्ग औऱ दूसरा उन ग्रामीणों और पिछड़ों का वर्ग जो गाँवों में बसते हैं या जो किसी कारणवश अंगरेज़ी शिक्षा से वंचित रह जायेंगे । यह यह वर्ग-भेद भारत कोढ़-सी तरह परेशान करेगा जिस तरह जातिवाद, क्षेत्रवाद धार्मिक कट्टरता उसे आज परेशान कर रहे हैं । अंगरेज़ जो नहीं कर पाये वह अंगरेज़ी आज कर रही है। पहली कक्षा से अंगरेज़ी की अनिवार्यता, मातृभाषा, और संस्कृति का त्याग, गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह रोज-रोज उगते अंगरेज़ी माध्यम के स्कूल बहुत सारी आशंकाओं को उत्पन्ने करते हैं । असुखद भविष्य का संकेत देते हैं ।
अब सवाल उठता है कि बिगड़ती हालात से मुक्ति पाने के लिए हमें क्या करना चाहिए ? इस सवाल पर हरेक राजनीतिक दल को, प्रदेश व दलगर् और व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर लोकहित में सोचना होगा । भाषा नीति बनानी होगी- दूर लक्ष्य नीति । ताकि हमारा लोकतंत्र मजबूत हो सके । सभी लोग अपने लोकतंत्र से जुड़ सकें । भारत को भारत या हिन्दुस्तान रूप में जानें, समझें, इन्डिया के रूप में नहीं । कृष्ण को कृष्णा औऱ योग को योगा न समझें । भिलाई सेक्टर दस में अंगरेज़ी माध्यम का हाई स्कूल है। उसका नाम है ‘श्री शंकर विद्यालय' किन्तु अंगरेज़ी में लिखा होने के कारण लोग उस ‘शंकरा' का अर्थ नहीं लग रहे थे। वहाँ परिसर में जाकर देखा तो श्री शंकराचार्य का मंदिर बना हुआ था औऱ त्र्यंवकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनमः का टेप चल रहा थी । शब्द उच्चारण भेद से अर्थ में, भावना में परिवर्तन हो जाता है।
मातृभाषाओं औऱ हिन्दी को तत्काल अंगरेज़ी के दबदबे से बचाने के लिए हरस्तर पर अंगरेज़ी की अनिवार्यता समाप्त करनी होगी । निष्ठापूर्वक संसद, विधान सभाओं और न्यायालयों की कार्यवाही हिन्दी में चलानी होगी । दो बच्चों से अधिक होने पर या यदि ग्रामीण पंच-सरपंच नहीं बन सकते तो राष्ट्रभाषा न जाननेवाले लोग सांसद और विधायक क्यों बनें ? संयुक्त राष्ट्र संघ में पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी हिन्दी में भाषण देते हैं तो हमारे वर्तमान प्रधामंत्री मनमोहन सिंह अंगरेज़ी में । संसद मे बजट अंगरेज़ी भाषा में पेश किया जाता है। अंग्रेजी अनुवाद को अधिकृत माना जाता है। दस प्रतिशत अंगरेज़ीदां नबे प्रतिशत को हाँक रहे हैं। जब प्रजातंत्र जनता की सरकार, जनता द्वार और जनता के लिए होती है तो जनभाषा का अनादर क्यों ? जनता को भी सोचना होगा कि उसकी सरकार उसकी भाषा में बोले । उसी में काम करे । जो दल या सरकार उसकी भाषा,संस्कृत और प्रगति से खिलवाड़ करे उसे वह उखाड़ फेंके। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को झक मारकर अपना उत्पाद बेचने के लिए हमारी भाषा सीखनी होगी। हिन्दी जाननेवाले युवक-युवतियों को नौकरी देनी होगी, वे हमारे पर कृपा करने नहीं आये है, अपना माल बेचने आये हैं। ईस्ट इंडिया कम्पनी को अपना कारोबार फैलाना था, मिशनरियो को धर्म फैलाना था, उन्होंने हिन्दी सीखी । हिन्दी में पढ़ना-पढ़ाना आरंभ किया ।
जन प्रतिनिधि और जनता मिल-बैठकर दूरदर्शी भाषा नीति बनाये । अपनी भाषा व संस्कृति को समझें, प्रेम करे । अंगरेज़ी मानसिकता से उबरे । हीन ग्रंथि से मुक्त हों । आज का भाषिक परिदृश्य बहुत खराब है। धीरे-धीरे देशी भाषाएँ दम तोड़ रही हैं । हिन्दी अनुवाद की भाषा बना दी गई है। इस निराशा के अन्धकार में आशा की किरण एक ही दिखाई पड़ रही है कि बेरोजगारों और दलितों की फौज के भीतर से कोई न कोई मंगल पाण्डेय आगे आयेगा और अंगरेज़ी के वर्चस्व को ललकारेगा । अंगरेज़ी न जाननेवाली जनता बगावत करेगी । जनतंत्र का नया युग आरंभ होगा, क्योंकि हम भारतीय आशा का आँचल कभी नहीं छोड़ते औऱ हमें अपनी बुनियाद सदा याद रहेगा ही । oडॉ. शोभाकान्त झा कुशालपुर, रायपुर, छत्तीसगढ़
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