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विजय "क़दीम" की कविताएं
मैं
तन्हाई का साथ छूटा है जबसे और भी तन्हा हो गया हूँ रहता तो गुलशन के बीच हूँ, मैं लगता फिर भी वीरानों में हूँ
अपनों का साथ छोड़ आया था ग़ैरों में बेगानों के बीच बेगाना ही रहा हूँ मुसर्रत तो कोई बाकी नहीं, पता नहीं किस अनबुझ प्यास से दिवाना हो गया हूँ.
चला तो ज़िन्दगी के रास्ते ही था सवारी मौत का बन दोराहे पे खड़ा हूँ. कहने को सब अपने ही तो हैं मैं किसीका नहीं, जाने टूट सा गया हूँ.
अपने-अपनों की खुशी की ख़ातिर ख़ुदी तक को दाव पर लगा कर ज़िन्दगी के जुए में सब कुछ हारे नाकाम जुआरी सा खड़ा हूँ ........ मैं
एक अनकही बात, अनसुनी आवाज़, अनदेखा वाक़या न कह, सुन और देख पाने के जुर्म में उम्र-कैद की सज़ा काटने को विवश कटघरे में खड़े मुजरिम सा हो गया हूँ ......मैं.
भ्रम उन बुझती आँखों में चमक दिखती है हल्की सी दबते से होठों पे चहक खिलती है हल्की सी
गिरती सी सांसों से महक आती है हल्की सी ग़मगीन चेहरे पे है एक मुस्कान हल्की सी
अवशेषों को तो देखो गुमाँ होता है महलों का पीछे मुड़ के जो देखो समाँ दिखता है बरसों का
मुझको अब भी शुबहा है उसके ज़िंदा होने का मुझको अब भी शुबहा हे उसके ज़िंदा होने का
फ़ासले फ़ासले दो दिलों के बीच के हैं हमसफ़र संग गुज़री तमाम उम्र फिर भी कम न हुए
दिलों का मिलना तो जाने ख़ुदा की नेमत है नसीब में नहीं था आप यूँ ख़फा क्यों हुए
हम-बज़्म, हम-जमात, हम कलाम ही सही अफ़सोस क्या जो हम-दिगर, हमराज़ न हुए
नहीं ये लाजिमी कि सबको मिले दिलरुबा यही समझाने की कोशिश में जाने क्या-क्या हुए
रहा नदी के दो किनारों सा ये गुज़र-गाह न मिले कभी भर-सफ़र, फ़ना तो संग हुए
निगार बाद मुद्दत के कुछ गुनगुनाने को जी करता है रूमानी गीत गुसलख़ाने में गाने को जी करता है
क्या आयी तू कल रात दहलीज पे सपनों के हर दर्द दबा एक पल जीने को जी करता है
हल्की सी मुस्कुराहट तूने जो है बिखेरी आगोश में ले तुझको रोने को जी करता है
इतनी सी इल्तिजा है टूटे नहीं ये सपना बाहों में भर के तुझको सोने को जी करता है
शिकस्तगी से अब रही न कोई शिकायत हमें बोसा तेरे रूख़सारों का लेने को जी करता है
हमने तो गुज़र कर ली बस तेरी आरज़ू में सर रख के तेरी गोद में मरने को जी करता है
oविजय "क़दीम"
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