रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रैल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 
 
सूर्योदय

 

 

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एक संभावनाशील कवि के रूप मेः राजीव रंजन प्रसाद

कभी हिंदी के महत्वपूर्ण और न बिसार सकने की दक्षता अर्जित कवि कुँवर नारायण की पंक्तियाँ को दोहरायें तो हम कह सकते हैं कि -

 

"कविता मनुष्य के दिल और दिमाग में जितना ही नज़दीक अपनी जगह बनायेगी उसके लिए जीवित रहना उतना ही संभव और अर्थपूर्ण होगा । प्रचार-प्रसार के तमाम माध्यमों के मुकाबले में और यों भी, कविता की स्थिति जितनी नाज़ुक है उतनी ही विशिष्ट भी, और यह विशिष्टता ही उसका प्रमुख बल है । कविता आज उसी या वैसे ही से काम करके ज़िंदा नहीं रह सकती जिसे दूसरे माध्यम, या दूसरे प्रकार के लेखन, बेहतर कर रहे हैं । कविता को भाषा में वहाँ अपनी पक्की और स्थायी पहचान बनाना है जहाँ आदमी के बनाये किसी भी स्थूल उपकरण की पहुँच नहीं है । बदलते संदर्भों में मनुष्य के सबसे कम उद्घाटित या विलुप्त होते, जीवन-स्त्रोतों की खोज और भाषा मे उनके संरक्षण की क्षमता शायद आज भी कविता की सबसे बड़ी ताकत है ।"

 

यह भाषा और कविता में यह ताकत जुटाने या भरने की दक्षता आज की अंतरजालीय कविता में यदि किसी के पास दिखाई देती है तो उसे हम राजीव रंजन प्रसाद कह सकते हैं । यद्यपि यह ताकत उसके यहाँ अभी विकसना प्रारंभ हो रहा है तथापि एक विश्वास दिखता है । संभावनाएं अनन्त होती हैं और उसके लक्षण दिखाई देते हैं । सामान्य सी दिखाई देने वाली घटनाओं और मनोभावों को भाषा में एक नये अर्थ-छवि से लैश करता हुआ कवि नहीं लगता कि पहली बार कविता कर रहा है । यद्यपि वह भाषा को कंपेक्ट बनाने की शैली में अभी निष्णात नहीं दिखाई देता परन्तु उसकी यही सतर्कता उसे एक पूर्ण संभावनाशील कवि के रूप में हमारे सामने उपस्थित कर देती है । और यही कारण है कि अपनी लघु कविताओं में जिसे क्षणिका के रूप में हिंदी वाले जानते हैं, वह कविता के सभी शर्तों को पूरा कर दिखाता है । जैसे भंगिमा, जैसे सौंदर्य, जैसे मुहावरा, जैसे अलंकार । जैसे रस भी । कविता को यदि हम विचारों के गिरफ्त से मुक्त कर दें तो वह मात्र रस है । हम कविता के पास इसलिए नहीं जाते क्योंकि हमें विचारों की आवश्यकता होती है । हम कविता के आँगन में इसलिए जा बैठते हैं क्योंकि हमें आनंद चाहिए । भावों को रससिक्त करने । मन की वेदना को हरने के लिए । कविता हमें विचार देती है । यह दीगर बात है । तो आकर्षण राजीव के पास जमा होने लगा है ।

 

राजीव गद्य की दुनिया में ज्यादा रहते हैं बनिस्बत पद्य के । आज का लगभग युवा पद्यमय संसार से जुड़ना चाहता है पर उसकी मजबूरी है कि उसका अपना संसार गद्यमयता से ग्रस्त है । जाहिर है वहाँ तर्क है । विचार हैं । जीवन रस की शुष्कता है । वहाँ उसमें संवेदना को तेज करने वाले उत्प्रेरक कम है । कम से कम एक सांस्कृतिक विरासत और उससे जुड़ी गुरू-शिष्य परंपरा जैसे गतिविधियाँ लगातार घटती जा रही हैं । ऐसे क्षणों में कला माध्यमों में अपने को सिद्ध कर दिखाने की जिजीविषा भी तेज नहीं हो पा रही । ठीक ऐसे दौर में अंतरजाल में अपनी कविता से लोगों को ध्यान जिन युवा रचनाकारों ने अपनी और खेंचा है उनमें राजीव रंजन प्रसाद को एक मानना चाहिए ।  प्रिंट मीडिया के बजाय सीधे इंटरनेट पर अपनी कविताओं की प्रतिष्ठा से न केवल वे नीरसता में सरसता के लिए जगह तैयार कर रहे हैं बल्कि वे एक तरह से कविता की ताकत और पहुँच को सिद्ध कर रहे हैं।

 

राजीव के पास अभी कविता के कथ्यों का व्यापक फलक विकसित नहीं हो सका है । एक आम कवि की तरह उनमें भी प्रेम, रोमानियत, विडम्बनाओं को लेकर कुछ भाव-चित्र या शब्द चित्र हैं पर यह भी सच है कि हर कवि अपनी पारी प्रेम और देह के आसपास ही शुरू करता है । आत्मा के पास तो वह बाद में पहुँचता है । चाँद सीरीज की कविताएं यही कहती हैं । पर उसके यहाँ एक ही कथ्य को विविधता के साथ और कई कोणों से देखने की दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है । यह उसकी विकासमान किन्तु अपरिमार्जित दिशा में गतिमान संवेदना का परिणाम ही है जो कवि निठारी पर कविता लिखता हैं तो दूसरी और स्वयं को मिली दुनिया की स्थायी किन्तु अप्रत्याशित दुरभिसंधियों पर अंगुली उठाता है । यह जो अँगुली उठाना है, एक तरह से बौद्धिक और संवेदनाजन्य हस्तक्षेप, यही साहित्य का उत्स है । कविता स्वयं में कवि की कलात्मक प्रतिक्रिया भी है । दुनिया को बेहत्तर बनाने की दिशा में। एक कवि के रूप में राजीव भी यही चाहते हैं । हर कवि यही चाहता है। देखना यह होगा कि कथ्य का विस्तार और उसे पकड़ने की गति कवि में कितनी तीव्रता से बढ़ती है । राजीव अंतरजाल पर प्रकाशित कवियों में खास कर युवा कवियों में अपनी पहचान बनाते चल रहे हैं । शब्दों को आम दुनिया से उठाकर, उसमें एक श्रेष्ठ कविता तराशने की पुलक के साथ, दुनिया के समांनांतर एक निष्कलुश दुनिया को रचने की निष्ठा सहित । विश्वास किया जाना चाहिए कि भविष्य में उनके पास सामान्य प्रतीत होने वाले ऐसे ही शब्दों से एक सार्थक कविता रचने की एक दिव्य दृष्टि भी होगी । शिल्प की विविधताओं के साथ । नयी भाषा और उसकी ताजगी के साथ । http://rajeevnhpc.blogspot.com में उनकी अब तक प्रकाशित कविताओं में से कुछ हमारे पाठकों के आस्वाद के लिए खासतौर पर प्रस्तुत है । हमें आपके विचारों की आशा है- संपादक

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टुकडे अस्तित्व के..

 

जरासंध की जंघाओं से दो फांक हो कर
जुडते हैं इस तरह टुकडे अस्तित्व के
जैसे कि छोटी नदिया गंगा में मिल गयी हो
चाहो तो जाँच कर लो
अब मिल गया है सब कुछ, एक रंग हो गया है
हर हर हुई है गंगे, हर कुछ समा गया है
फिर उठ खडा हुआ हूँ, हिम्मत बटोर ली है
मैं जानता हूँ दुनिया भी भीम हो गयी है
वो दांव-पेंच जानें कि फिर चिरा न जाऊं
लेकिन लडूंगा जब तक सागर में मिल न जाऊं
मैं जानता हूँ कान्हा तुम राज जानते हो
टुकडा उठा के तृण का
दो फांक कर के तुमने उलटा रखा है एसे
जैसे कि वक्त मेरा मुझको छला किये है
मैं मुस्कुरा रहा हूँ
मैं मिटने जा रहा हूँ
तुममें समा रहा हूँ
फिर ये सवाल होगा, क्या मुझसे वक्त जीता?
तुम सोच रखो उत्तर, तुम ठेके हो सत्य के
जब सामना करेंगे मेरे टुकडे अस्तित्व के...

 

मंदिर और क्षणिकायें..

 

मंदिर -१

 

मंदिरों का एक इतिहास होता है

लेकिन हमारा तो कोई इतिहास नहीं है

फिर हमें खंडित होनें की प्रतीक्षा क्यों है?

क्या इस लिये

कि हम धर्मग्रंथों से बाहर निकल आये हैं

या इसलिये कि हमारे गीत

अपरिचित हैं हवाओं के लिये

या इसलिये कि इस धरती में

कोई भी सृजन एक बोझ होता है

फिर यह स्नेह क्यों न हो

आस्था क्यों न हो

या इस लिये

कि हमनें एक नयी दुनिया बनाने की नींव रख दी है..

 

मन्दिर -२

 

मन्दिरों के शंख बुलाते हैं

और "" सारी सृष्टि चीर कर

मेरी छाती में समा जाता है

और मैं एक अनसमझा प्रश्न हो जाता हूँ

मैं फिर फिर अनवरत करता हूँ तलाश

तुम्हें..

 

मन्दिर -३

 

तुम अगर मन्दिर की वही मूरत नहीं हो

तो प्रिय

मुझे तुम्हें देख कर वही आस्था क्यों होती है..

 

मन्दिर -४

मेरे भीतर के सारे दीपक बुझा दो

यदि बुझा सको

तुम जाना ही चाहते हो मेरे जीवन से दूर

तो इस मन्दिर में अर्चना क्यों हो?

 

मन्दिर -५

 

और भी लोग है

जिन्हे तुमसे मुहब्बत होगी

और भी दिल है,

जिन्हे तेरा दर्द भाता है

और भी आह

तेरे ज़ख्म से उभरती है

और भी टीस तुझे देख कर उतरती है...

 

मै फिर भी ईस बियाबां मे

पत्थर तराशता फिरता हूं

मुझे सिर्फ मुझे ही आस्था है तुम पर..

कि मन्दिर बना कर ही दम लूंगा

जिसमे तुम्हारा एक बुत रख

प्राण-प्रतिष्ठा कर दूंगा उसमें..

 

बोलो क्या तब तुम सारी दुनिया से सिमट कर

एक पत्थर की मूरत नहीं हो जाओगी....

 

कुछ तो बोलो

 

अधकच्ची अधपक्की

भाषा कैसी भी हो

कुछ तो बोलो..

 

खामोशी की भाषा में

कुछ बातें ठहरी रह जाती हैं

आँखों के भीतर गुमसुम हो

गहरी गहरी रह जाती हैं

मैं कब कहता हूँ मेरे जीवन में उपवन बन जाओ

मैं कब कहता हूँ तुम मेरे

सपनों का सच बन ही जाओ

लेकिन अपने मन के भीतर

की दीवारों की कैद तोड कर

शिकवे कर लो, लड लो

या रुसवा हो लो

कुछ तो बोलो..

 

मैनें अपने सपनों में तुमको

अपनों से अपना माना है

तुम भूल कहो

मैने बस अंधों की तरह

मन की हर तसवीर

बताओ सही मान ली

देखो मन अंधों का हाथी

हँस लो मुझ पर..

 

मैने केवल देखा है

ताजे गुलाब से गूंथ गूथ कर

बना हुआ एक नन्हा सा घर

तुम उसे तोड दो

लेकिन प्रिय

यह खामोशी खा जायेगी

मेरी बला से, मरो जियो

यह ही बोलो

कुछ तो बोलो..

 

ठहरी ठहरी बातों में चाहे

कोई बेबूझ पहेली हो

या मेरे सपनों का सच हो

या मेरे दिल पर नश्तर हो

जो कुछ भी हो बातें होंगी

तो पल पल तिल तिल मरनें का

मेरा टूटेगा चक्रव्यूह

या मन को आँख मिलेगी प्रिय

या आँखों को एक आसमान

 

तुम मत सोचो मेरे मन पर

बिजली गिर कर

क्या खो जायेगा

तुम बोलो प्रिय

कुछ तो बोलो

अधकच्ची अधपक्की

भाषा कैसी भी हो..

 

क्यों नहीं..

 

तुम्हारा खत पढा

फिर पढा..

कितने ही टुकडे चाक कलेजे के

मुँह को आ पडे

थामा ज़िगर को

और बिलकुल बन चुका मोती भी चूने न दिया

फिर पढा तुमहारा खत

और शनैः-शनैः होम होता रहा स्वयमेव

 

एक एक शब्द होते रहे गुंजायित

व्योम में प्रतिध्वनि स्वाहा!

नेह स्वाहा!

भावुकता स्वाहा!

तुम स्वाहा!

मैं स्वाहा!

और हमारे बीच जो कुछ भी था....स्वाहा!

 

आँखों को धुवाँ छील गया

गालों पर एक लम्बी लकीर खिंच पडी

जाने भीतर के वे कौन से तंतु

आर्तनाद कर उठे..शांतिः शांतिः शांतिः

 

अपनी ही हथेली पर सर रख कर

पलकें मूंद ली

ठहरे हुए पानी पर हल्की सी आहट नें

भवरें बो दीं

झिलमिलाता रहा पानी

सिमट कर तुम्हारा चेहरा हो गया

 

लगा चीख कर उठूं और एक एक खत

चीर चीर कर इतने इतने टुकडे कर दूं

जितनें इस दिल के हैं.....हिम्मत क्यों नहीं होती मुझमे?

 

मछलीः चार कविताएँ

 

मछली -१

मुझे पानीं से निकाल कर
यूं हथेली पर न रखो
जानम तुममें डूबा हुआ ही ज़िन्दा हूं मैं..

मछली -२

मेरी सोन मछली मेरी जल परी
यूं डुबक पानी में उतर
अनगिनत भँवरें गिनता मुझे छोड
हर पल डूबती उतराती हुई तुम
बार बार करीब आ कर जाती हुई तुम
क्यों चाहती हो कि
जाल फेंक तुम्हें उलझा लाऊं

मछली -३

हर बार सोचता हूँ
उस एक मछली को
जिसनें सारा तालाब उथल पुथल कर रखा है
काँच के मर्तबान में कैद कर दूं
और अपनी आँखों में
पार्थ का चिंतन..

मछली -४

उस चटुल मछरिया नें
मेरी आँखों में डूब कर कहा
तुम बहुत गहरे हो..

o राजीव रंजन प्रसाद

सहायक प्रबंधक

राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (पर्यावरण)

फरीदाबाद, हरियाणा

 

 

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 सत्य अमर है - महात्मा गाँधी

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