रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रैल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कविता

 

दुष्यंत के लिए

(कौन कहता है आसमान पर सुराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो )

सुधीर समग्र

 

आसमान की ओर देखकर

हाथ पर पत्थर लिए

मै सोचता रहा

दुष्यंत की प्रेरणा

और अपनी हिम्मत

के बीच का द्वंद्व

कहाँ, किस ओर से

आसमान में है

सुऱाख की गुजांइश

 

आसमान के बदलते तेवर

और उसे ओढ़े अनेक

रक्षा कवचों का मायाजाल

सुराख के लिए नहीं

बचाता किसी कोने में

कोई छोटी-सी जगह

 

डिस्टलरियों के धुएँ की मोटी परतों ने

उसे बना दिया है

आवारा, मदमस्त और कठोर

वह तो धूल की परतों से

हो गया है चट्टान

फिर भी उछालकर देखा

मैंने एक दुष्यंतनुमा पत्थर

टकराकर लौट आया

वह मेरी ओर और मैंने

अपनी ही बचने के लिए

खुद बनाई अपने आसपास

सुराख कर उसके लिए जगह

 

वैसे भी अब आसमान पर

कहाँ जगह बची है

आम-आदमी के लिए

देशी-विदेशी हवाई-सड़कों ने

बना ली है अपनी जगह

चील, कौव्वों और गिद्धों से भी खतरा उन्हें

एक-दूसरे से भी टकराने का

जिन्होंने आसमान को

बना लिया है आम रास्ता

ज़मीन पर रहने वाले

से ऊँचा उड़ने के लिए

उन्हें ऊपर से

कीड़ों-मकोड़े की तरह

देखने के लिए

 

अब तो ये पत्थर भी उठाये नहीं जाते दुष्यंत

आसमान से जमीं पर रहने वालों को खतरा है

क्योंकि कोशिश के लिए

जगह नहीं बची

कामयाबी के सटे-सटाये आसमान में

इसलिए ज़मीन पर रह कर ही

हौसले का पत्थर उछालते हैं

कि एक न एक दिन

सुराख होकर रहेगा आसमान में ।

0 सुधीर समग्र

वैभव प्रकाशन

पुरानी बस्ती, रायपुर

 

 

आपकी प्रतिक्रिया

 सत्य अमर है - महात्मा गाँधी

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