रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रेल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कविता

 

 

घर पर दो कविताएँ

घर

 

बनाने की कोशिश में एक घर

आखिर हो गया मैं भी बेघर

 

कॉक्रीटों से बने मेरे शहर में

मिलना मुश्किल है एक घर

 

तबदील कर दिए हैं सरायों में

जाने कब से, हमने अपने घर

 

पुकारते हो मंदिरों मस्जिदों में

उसे, जो आसीन है सबके घर

 

उस घर की फिक्र में रवि तो

बिसार चुका है अपना यह घ

 

oरविशंकर श्रीवास्तव

पराया घर

क्यों कर मुझसे

सवाल जवाब करती हो,

 

कभी प्रकृति ने

सूर्य से पूछा है

तू इतनी दूर क्यों है,

 

माना कि सूर्य

अपना धर्म निभाना जानता है।

 

अचानक देखता हूँ

एक नारी-चिड़िया पर

कुछ पुरुष पंछी

अपना अधिकार जताना चाहते हैं

लेकिन

नारी चिड़िया ने

पुरुष पंछियों को

उनकी औकात बता दी

मुँह की खाना इसी को कहते हैं।

 

मिस्त्री ईंट पर ईंट रख रहा हैं

बीच-बीच में सीमेन्ट भी डालता जाता है

ओढ़नी और दुपट्टे का गठजोड़

हल्दी, सुपारी और चांवल से बनता है,

 

नींव के नीचे क्या है

कल कौन जानेगा

मेरा मिस्त्री सब जानता है

और

नीले आकाश से सब देखता है

मुझे तो मुकम्मल मकान चाहिए

एक पत्नि, एक बेटा, एक पोता और कुछ धन।

 

सिन्दूर की डोरी ने

हाथ में लगी मेंहदी को

पीला कर दिया है 

शादी के खम्भ को

दीपक की लौ आलोकित करती है,

 

सूरज के सातों रंगों को

फेरों का नाम दे दिया है

कोई छः एक का गणित जानता है

तो कोई तीन चार का

मुझे तो सातों का याद है

सभी तो उनकानाम प्रेम है

प्रिया नहीं।

 

दीवर पर टंगी टोपी

जिसमें कई मुखौटों पर

सवार होने की आदत है

लम्बे ऊँचे खम्भों वाली

गोल इमारत में

कई बार

चलता है षड्यंत्र

देश को खोखला करने का

मैं  ही तो उन्हें भेजता हूँ

अपने अन्य साथियों के साथ 

मेरे हाथ कट चुके हैं

नये हाथों का इन्तजार है।

           

 o नवल जायसवाल

प्रेमन, बी 201, सर्वधर्म

कोलार रोड, भोपाल(मध्यप्रदेश) 462042

 

 

 

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 सत्य अमर है - महात्मा गाँधी

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