रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रैल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 
 
कविता

 

 

//मुरली मनोहर श्रीवास्तव की दो लंबी कविताएँ//

 

जिंदगी का दर्द व कविता

हे प्रभु
अब मुझे जिंदगी मत देना
क्योंकि जिंदगी जीने का दर्द
मेरे बर्दाश्त से बाहर है
रही मौत तो
वह मैं तुमसे मांगने का अधिकार खो चुका हूँ
अपनी वजह से नहीं
उन नेत्रों में बसी अभिलाषा के कारण
अनजाने ही जिनका आशादीप हूँ मैं
सुनो
तुम केवल पैदा करना जानते हो
पैदा होंना नहीं
तुम्हें एहसास है
जब जब तुम पैदा हुये हो
यह दर्द तुम्हारे भी बर्दाश्त के बाहर रहा है
और इसीलिये अब तुमने
इंसानों के बीच न पैदा होंने का फ़ैसला कर लिया है
कभी कभी सोचता हूँ
जिंदगी देने के लिये शुक्रिया अदा करूँ तुम्हारा
या इसका दर्द भोगने के लिये लानत दूँ
यदि दो हाथ पैर नाक कान को
तुम जिंदगी कहते हो
तो वाकई तुम शुक्रिया के काबिल हो
और इसके अलावा
जिंदगी कुछ और है
तो वह मैंने देखी नहीं
हकीकत ने
वक्त से पहले होश में ला दिया था मुझे
और तब से इस तथाकथित शरीर की
निम्नतम आवश्यकताओं
पूरा करने संघर्ष को
देखा है मैने जिंदगी के रूप में
ठहरो
मेरी बातों में कविता मत तलाशना
कविता बहुत कोमल होती है और
मेरी मिट्टी का धरातल बहुत कठोर
क्षुद्र भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु
अपनी अंतरात्मा के पतन का तर्क नहीं
ढूँढ पाता हे प्रभु
और तब तुम्हें लानत भेजने को
जी चाहता है ।
कभी कभी मुझे अपनी शक्ल
कोल्हू के बैल से मिलती हुई लगती है
जो मात्र अपने उदर पूर्ति हेतु
झूठ बेईमानी फ़रेब नफ़रत मक्कारी की खल फ़ैलाता जा रहा है
अपने चारों ओर ।
मैने बचपन और यौवन को देखा है
बहुत करीब से
गहराई में डूब कर देखा है
प्यार और दुश्मनीं को
अपने और परायों के रिश्ते भी देखे हैं
वक्त के साथ इन सब जख्मों को टीसते देखा है
और कुल मिला कर पाया है
इन सबसे
अपने सीने में बसे हुये दर्द को
बेतहाशा बढते हुये
हे प्रभु
क्या तुम्हारे इस जहान में
इस सब के बाहर भी कुछ है
रहने दो
मुझसे गौरवशाली इतिहास और संस्कृति की बात मत करना
आदर्श और उपदेश की भाषा भी मत बोलना
सपनों की दुनियां में जीने से
हकीकत का दर्द कभी बदलता नहीं है
बल्कि सपने टूटने के बाद
यह और गहरा हो कर
सामने आता है
जब जिंदगी की सारी ताकत जुटा कर भी
नहीं पूरी कर सकूंगा निम्नतम आवश्यकता
तो कहां से महसूस करूंगा
खूबसूरती चाँद की
पंछियों की चहचहाअट
सूर्य की प्रथम किरण
झरनों का कलरव ।
तुम्हारी रचना में
रास रंग कला साहित्य कहाँ नजर आयेगा मुझको
जब जिंदगी जीने का दर्द ही
बर्दाश्त के बाहर हो मेरे
-----------------------------

बस बक चुके
बहुत कवि बनते हो
शर्म नहीं आती
भूख बेबसी जिल्लत और गरीबी का
व्यवसाय करते
बस प्रभु
मैं तुमसे कुछ मांग नहीं रहा हूँ
मैं तो बस कविता और कवि की जिंदगी के बीच
पर्दे को तोड रहा हूँ
बस इतना करना
मेरे मरने के बाद
जिंदगी के दर्द को
कविता का जामा मत पहना
मत पहनान

 

 

कहाँ से कहाँ तक

 

कहाँ से कहाँ तक
दर्द वह नहीं है
जो सीने में पलता है
दर्द वह है जो मष्तिष्क में जन्म लेता है
जिगर का दर्द हल्का करता है आदमीं को
वह दवा है , मर्सिया है
और कई बार इलाज भी
मष्तिष्क का दर्द कीडा है
जो कुरेदता है खोखला करता है
चाट जाता है दींमक की तरह आदमीं को ।
जब तक पता लगता है दर्द का
वह रेंग कर ,
यहाँ से वहाँ पहुंच जाता है
दर्द हिलोरें मारता है
नख से शिख तक
कोई महसूस कर लेता है
कोई तडप कर मर जाता है
जो तडपता है वह मुक्त हो जाता है
जो महसूस करता है , वह छटपटाता है ,
अकुलाता है न जीता है न मरता
वह उस दर्द को जीता है
दर्द को जीना
बहुत कुछ सिखाता है ।
एक तरफ़ खोखला करता है दर्द
दूसरी तरफ़ फ़ूटता है फ़ौवारा
दर्द के चरम पर
उस खोखली नली को भरने के लिये
तब उस नाली में भरा हुआ दर्द
नहीं टिकने देता सांसारिकता को
या तो वह उसे जब्ज कर लेता है
या परे ढकेल देता है
दर्द बहुत गहरा एहसास दिलाता है
खोखली है दुनिया , बहुत खोखली
जो अपना है , वह अपना नहीं
हाँ दोस्त तुम खुद अपने नहीं हो
खुद को दिया हुआ धोखा ही तो
वह दर्द है जो
चीर जाता है
मष्तिष्क को
बिना नश्तर , कैची या छेनीं हथौडी के
इसे पालने या छोडने का दौर
हाथ से जा चुका
और अब यह नियति है
नियति के माथे पर लिखा हुआ आलेख
दर्द
तुम्हारी खोज दर्द
मेरे हाथ से फ़िसला हुआ दर्द
मेरे भीतर सब कुछ चीर कर पैदा होता दर्द
अपनी जमींन तलाशता
फ़ूट कर बाहर निकलता दर्द

लडखडा कर चलने की कोशिश करता

उसे सहारा नहीं चाहिये

वह तो बनेगा सहारा

यदि मजबूत हुआ

कहीं भयानक सच है

कहीं उतरा हुआ कपडा

कोई पालने या झूले पर पालेगा इसे

इतना घबराते क्यों हो

जिंदगी का हिस्सा है

खा जायेगा तो क्या हुआ

इसका भी उतना ही हक है आदमीं पर

जितना खुशी का

पाल कर देखो

प्यार मांगता है यह भी

कुछ दे कर जायेगा

बस धीरे धीरे एक बार उतर आये

सिर से पांव तक ।

 

oमुरली मनोहर श्रीवास्तव

एन टी पी सी औरैया

E mail – murlimanohars@gmail.com

 

 

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 सत्य अमर है - महात्मा गाँधी

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