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।। अंतरजाल से वैश्विक होते हिंदी गीत ।।
तो मेरा जबाब गीत के पक्ष में होगा । क्योंकि जीवन का राग सर्जक के मन में पहले उत्पन्न हुआ होगा तत्पश्चात वह दुनिया को रचने के महाउद्यम में संलग्न हुआ होगा । यदि दुनिया सचमुच किसी अलौकिक शक्ति के हाथों गढ़ी गयी है तो वह दुनिया को रचने के नवीन और अतिरिक्त उमंग-आनंद में जरूर गुनगुनायी होगी । जिनके लिए हम – सत् चित्त आनंद – की बात करते हैं । क्या वह अपनी अनुभूतियों के नवोन्मेष पर छंदमय नहीं हुआ होगा ? अवश्य हुआ होगा ।
यदि इस चराचर विश्व को प्रकृति और पुरूष के सम्मिलन का परिणाम माने तब भी यह सम्भव है कि पुरूष से भेंट के पूर्व प्रकृति जड़वत् नहीं रही होगी । वहाँ झरनों की खिलखिलाहट में, समुद्र तरंगों की टकराहट में, चिड़ियों की चहचहाहट में, भौरों की गुनगुनाहट में, एक लयात्मक ध्वनि जरूर बहती रही होगी । वही प्रकृति का गीत है । यानी प्रकृति और गीत सहोदर हैं । दोनों को बिलगाकर देखना अप्राकृतिक, असंभव और अतार्किक होकर संसार के इतिहास और भूगोल को देखना होगा ।
गीत शाश्वत है । वह अमर है । वह जन्म में है । वह मरण में भी है । वह शिशु के रूदन में है तो युवा के प्रफूल्लन में भी । गीतविहीन मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती । वह मनुष्य के मन की भाव-मणि है । गीत सृजन के मूल में – वाक्यम् रसात्मकम् काव्यम् – ही है । अक्षरों के पहले भी गीत अपने अदृश्य स्वरूप में अंतर्गुफिंत था । यह बात अलग है कि तब हम उसे गीत नामक संज्ञा से नहीं जान पाये होंगे।
प्रागैतिहासिक कालीन गुफाओं और कंदराओं की जो मानव लिपियाँ है वे गवाही देती हैं कि मनुष्य शुरू से ही जीवन में ताल, छंद, लय और रस की फ़िराक में था । जब उसे लिपि या अक्षरों का वरदान मिल गया तब ताड़-पत्रों, ताम्र-पत्रों आदि माध्यमों में उसकी अभिव्यक्ति संपन्न होने लगी । और जब मनुष्य को कागज़ का उपहार मिला तो वह अपनी अनुभूतियों की कोमलतम् और सूक्ष्मतम् अभिव्यक्ति करने लगा । तब से आज तक गीत की धारा सतत् प्रवहमान है । कभी किताबों में, कभी पत्र-पत्रिकाओं में । कभी आडियो सीड़ी में तो कभी वीडियो या वीसीड़ी में ।
पीछे मुड़कर जब हम देखते हैं तो बीसवीं शताब्दी में अभिव्यक्ति की प्रौद्योगिकी के टेक्स्चर और स्ट्रक्चर दोनों में निरंतर बदलाव आता चला गया है पर गीत ऐसी अमर और समन्वयशील विधा है जो हर तकनीकी में पानी की तरह घुलमिल जाता रहा है । गीत दरअसल ध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति मात्र नहीं वह समन्वयात्मक गति भी है जो स्वयं अभिव्यक्ति की अब तक खोजे गये माध्यम और भविष्य की सभी संभावित माध्यमों में स्वयं की प्रतिष्ठा बरकरार रखने में सक्षम है । यदि ऐसा नहीं होता तो वर्तमान समय में अभिव्यक्ति, संचार और व्यापकता की सर्वाधिक आकर्षक और गतिमान माध्यम अंतरजाल यानी इंटरनेट पर गीतों की हरी-भरी गूँज नहीं सुनाई-दिखाई देती ।
आज अंतरजाल और खासकर हिंदी अंतरजाल में गीतों की आमदगी इस बात का विश्वास दिलाती है कि चाहे विज्ञान मानव की मौलिकता को छीनने-झपटके का जितना भी छद्म प्रयास कर ले मन में संवेदना जब तक बची रहेगी गीत बचे रहेंगे । दरअसल वे गीत ही हैं जो आज के नीरस जटिलता, एकाकीपन, और कृत्रिमता वाले प्रौद्योगिक समय में भी उसे मनुष्य होने का अहसास करा रहे हैं ।
यूँ तो अंतरजाल पर हिंदी के आज सैकड़ों जाल स्थल यानी कि वेबसाइट हैं और वहाँ प्राचीन-अर्वाचीन सभी नामचीन गीतकारों की आमदगी देखी जा सकती है । यह बताना मेरे लिए सुखद प्रसंग है कि विश्व के 3 कारगर और सर्वाधिक प्रसिद्ध सर्च इंजन में जब आप हिंदी देवनागिरी में – गीत – शब्द लिखकर खोजेंगे तो चकित हो उठेंगे । सर्च इंजन में गूगल में आपको 94100 पेज, एमएसएन में 9439 पेज, और याहू में 39400 पेजों की सूची दिखाई देती है । यानी कि अंतरजाल पर इतने वेब-पृष्ठों में हिंदी गीत हैं या गीत का जिक्र वहाँ हो चुका है । यह केवल गीत की व्यापकता और समृद्धि का ही नहीं, हिंदी की वैश्विक साख का भी परिचायक है ।
www.bharatdashan.com - न्यूजीलैंड़ से संचालित इस वेब पोर्टल पर मैथिलीशरण गुप्त (भारत की दुर्दशा), महादेवी वर्मा, (मैं नीर भरी दुख की बदली, जो तुम आ जाते एक बार, वे मुस्कुराते फूल नहीं मेरे दीपक), निराला (वर दे, वीणा वादिनी, वर दे), दिनकर जी (वीर), सुभद्राकुमारी चौहान (मुरझाया फूल, कोयल), हरिऔध जी (फूल और काँटा), गोपाल सिंह नेपाली (स्वतंत्रता का दीपक), नीरज (आदमी पत्ता है ताश का) आदि प्राप्य हैं।
www.jagran.com - जागरण विश्व का सबसे बड़ा हिंदी पोर्टल है । यूँ तो यह साहित्य केंद्रित जाल-स्थल नहीं है तथापि यहाँ भी प्रत्येक सप्ताह कोई न कोई गीत अवश्य प्रकाशित किया जाता है ।
www.geetmanjusha.com - इंटरनेट पर आडियो फार्म में हिंदी गीतों के कई चैनल हैं पर यह जाल-स्थल ऐसा है जहाँ हम उन हिंदी गीतों को देवनागिरी या रोमन लिपि में भी बाँच सकते हैं जिन्होंने भारतीय सीनेमा में अपना लोहा मनवाया है । इस जाल-स्थल का लोगो देखकर ही समझा जा सकता है कि यह गीत केंद्रित वैश्विक मंच है जिसमें कहा गया है कि
गीतो ने हमे जीना सिखाया । गजलों ने मोहब्बत सिखायी है ॥
हर गीत हमारी कहानी है ॥
www.anubhuti-hindi.org - अभिव्यक्ति और अनुभूति हिंदी साहित्य पर केंद्रित एक मात्र ऐसा संयुक्त वेबसाइट हैं जो संयुक्त राज्य अमीरात से एक प्रवासी साहित्यकार के संपादन में विगत 7-8 साल से संचालित हो रहा है । यहाँ न केवल प्रतिष्ठित अपितु नवोदित गीतकारों, नवगीत कारों को नियमित रूप से प्रकाशित किया जाता रहा है । इतना ही नहीं यहाँ समय-समय पर एक ही विषय पर आधारित गीतों का संकलन भी तैयार किया गया है जो ऋतुओं या खास प्रसंगों पर अभिकेंद्रित हैं ।
इनमें से कुछ प्रमुख संकलन हैं - बसंती हवा, धूप के पाँव, गुच्छे भर अमलताल, वर्षा मंगल, ज्योति पर्व, गाँव में अलाव, मेरा भारत, फागून के रंग, मौसम, प्रेम गीत । जिन संकलनों में हिंदी के सैंकड़ों गीत समादृत हैं । हम वसंती गीतों के संग्रह- वसंती हवा का ही उदाहरण लेते हैं – यहाँ महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्रा कुमारी चौहान, सोहन लाल द्विवेदी, प्रभाकर माचवे से लेकर समकालीन गीतकार जैसे सुरेश चंद्र शुक्ल, इंदिरा परमार, अनूप अशेष, हरीश निगम, माहेश्वर तिवारी, रामानुज त्रिपाठी, शिवप्रसाद कमल, सरस्वती माथुर, केशरी नाथ त्रिपाठी, शिवनारायण सिंह, अजय पाठक, डॉ. शीला मिश्रा, गोविंद अनुज आदि के गीत उल्लेखनीय हैं ।
गौरव ग्रंथ अनुभूति का ऐसा प्रभाग है जहाँ हिंदी की अनुपम और महत्वपूर्ण किताबों को पूरी तरह ऑनलाइन रखा गया है इनमें हम तुलसी दास की कवितावली, सुभद्रा कुमारी चौहान की झांसी की रानी, हरिवंशराय बच्चन की मधुशाला, निराला जी की राम की शक्तिपूजा, श्यामनारायण पांडेय की हल्दीघाटी को कभी भी विश्व के किसी भी स्थल से पढ़ सकते हैं । उद्धृत कर सकते हैं ।
अनुभूति जैसे जाल स्थल का प्रयास इस लिए भी अभिनंदनीय है कि वहाँ शिशुगीतों को भी प्रमुखता के साथ जगह दी गई है । जग का मेला ऐसा ही संगह है जहाँ हिंदी के लगभग सभी प्रमुख बाल गीतकारों के गीत ऑनलाइन रखे गये हैं ।
www.hindinest.com - हिंदी नेस्ट अमेरिकन सहयोग से संचालित हिंदी साहित्य का एक प्रमुख जाल-स्थल है जहाँ हिंदी के अनेक गीतकारों की चर्चित रचनाएं पढ़ने को मिल जाती हैं । इनमें धर्मवीर भारती, दिविक रमेश भी हैं । यह जाल स्थल इस लिए भी अंतरजाल पर चर्चित रहा है क्योंकि यहाँ विदेश में रह रहे प्रवासी हिंदी गीतकारों को लगातार प्रकाशित किया जा रहा है । जिन्हें बहुधा गीत के समीक्षक भूला देना चाहते हैं – ये हैं कनाड़ा से सुमन कुमार घेई, लावण्या शाह, लक्ष्मीनारायण गुप्त, उषा राजे सक्सेना(इंग्लैंड) आदि ।
www.webduniya.com - यह सभी जानते हैं कि इंदौर की वेबदुनिया विश्व का पहला हिंदी वेबपोर्टल है और जिसका अंतरजाल जैसी मीडिया में हिंदी के प्रवेश और विकास में भी ऐतिहासिक योगदान रेखांकित हैं और जहाँ हिंदी संस्कृति की तमाम विधाओं के साथ साहित्य का भी एक खास प्रभाग है पर दुख का विषय है कि यहाँ भी गीतों के लिए कोई विशेष कॉलम नहीं रखा गया है । इसके बावजूद यहाँ – शताब्दी की कविताएं – नामक प्रखंड में जहाँ पिछले 100 वर्षों की हिदीं कविता को रखा गया है, हरिऔध, रामनरेश त्रिपाठी, गुप्त, जयशंकर प्रसाद, गोपालशरण सिंह, मुकुटधर पांडेय, नागार्जुन, शमशेर बहादूर सिंह, गिरिजा कुमार माथुर, राम दरश मिश्र, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, वीरेन्द्र मिश्र,चन्द्रदेव सिंह, उमाकांत मालवीय, नरेश सक्सेना, रमानाथ अवस्थी, नईम, जानकी वल्लभ शास्त्री, रामावतार त्यागी, भारत भूषण अग्रवाल, गोपाल सिंह नेपाली, श्यामनंदन किशोर, रवीन्द्र भ्रमर, जगदीश चतुर्वेदी, केदार नाथ सिंह, बालकवि बैरागी, बालस्वरूप राही, कीर्ति चौधरी, नीरज, कैलाश गौतम आदि की 2-2, 3-3 गीतों को उनके परिचय के साथ प्रतिष्ठित किया गया है जिन्हें हिंदी गीतों की यात्रा में बिसारना नामुनकीन होगा ।
यहाँ नीरज के कई गीत संग्रहित हैं। इनमें - मुस्कुराकर चल मुसाफिर, दिया जलता रहा, तब मेरी पीड़ा अकुलाई, अभी न जाओ प्राण, निभाना ही कठिन है, नयन तुम्हारे, परायजय भी फिर जब है, यदि मैं होता घन सावन का, अब न आऊँगा ऐसे गीत हैं जिन्हें विश्व भर के हिंदी पाठक, शोधकर्ता, हिंदी प्रेमी बार-बार बाँचते हैं ।
भूल न जाना की एक कड़ी लेते हैं-
भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना साथ देखा था कभी जो एक तारा आज भी अपनी डगर का वह सहारा आज भी हैं देखते हम-तुम उसे पर है हमारे बीच गहरी अश्रु-धारा नाव चिर जर्जर नहीं पतवार कर में किस तरह फिर हो तुम्हारा पास आना ।
http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/vp020.htm - जिन्हें मैथिल कोकिल विद्यापति के समस्त छंदों का मुफ़्त पढ़ना है वे भारत सरकार द्वारा संचालित जाल-स्थल का भ्रमण कर सकते हैं । यहाँ मात्र विद्यापति की पदावली के साथ-साथ उनकी अन्य गीत रचनाएं ही नहीं है बल्कि उनके कृतित्व और जीवन, उनके योगदान, नेपाल एव मिथिला में प्राप्त पाण्डुलियाँ एवं संकलन, बंगाल के भजनों में विद्यापति के पद, जार्ज ग्रियर्सन का संकलन, मित्र-मजुमदार का संकलन, बारहमासा , बटगमनी, भगबान गीत , भगबती गीत , भगता गीत , गीत , विद्यापति गीत आदि शोधपूर्ण सामग्री भी हैं जो किसी शोधार्धी के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं । रस लेते हैं उनके एक गीत का - भूइयां के गीत
कोने लोक आहे भूईयां लकड़ी चुनै छी आहे
राम
www.srijangatha.com - सृजनगाथा जैसा कि आपको ज्ञात ही है – हिंदी साहित्य, भाषा और संस्कृति की मासिक आनलाइन पत्रिका है जिसके 10 अंक लगातार प्रकाशित हो चुके हैं । यहाँ हिंदी की समस्त लोकप्रिय विधाओं के साथ गीत को समांतर स्थान दिया गया है । ऐसा नहीं कि उन्हें किसी अन्य वेबजाल पत्रिका की तरह कविता श्रेणी में । यहाँ माह के छंदकार नामक कॉलम में प्रतिष्ठित गीतकार की रचनाएं प्रकाशित की जाती हैं । यहाँ अब तक जिन प्रमुख गीतकारों की रचनाएं उपलब्ध करायी जा सकी हैं उनमें हैं-
जेलों में बंद करो
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डॉ. इसाक अश्क
,
एकलव्य हम
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रामस्नेहीलाल शर्मा,
बहुत दिनों के बाद
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वेदव्यास
,
मंत्र आँसू के
-
देवदत्त देव
,
पक्की सड़क
-
सुधांशु उपाध्याय
,
आँख डबडबाई है
-
माधवी कपूर,
मार्च
माह के छंदकार
-
मनोज सोनकर,
बीती रात का सपना
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लावण्य शाह
जब से तुम मनमीत बने हो,
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सचिन शर्मा
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