डॉ. कुमार विमल को हार्दिक श्रद्धांजलि
विगत 26 नवंबर, 2011 के दिन कुमार विमल जी के स्वर्ग सिधारने की खबर सुनकर मुझे अतीव दुःख का अनुभव हुआ, कुछ पल के लिए मैं निश्चेष्ट रह गया था । इसी बीच उनके कुशल-मंगल की जानकारी लेने की इच्छा हुई थी, उनके कुछ पूर्व-प्रेषित पत्र और एकाध पुस्तकें मैंने अपनी मेज़ पर रखी थी । इस बीच मेरी चिट्टी जाने वाली थी, मगर उधर महिला लेखन पर पुदुच्चेरी में राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन की तैयारियों में व्यस्ततावश चाहकर भी नहीं लिख पाया । इसी बीच यह खबर सुनकर मैं अवाक रह गया कि कुमार विमल जी नहीं रहे । अनायास ही मेरी आंखों से आँसू टपकने लगे ।
जब मैंने ‘युग मानस’ का प्रकाशन आरंभ किया था, लगभग उन्हीं दिनों में कुमार विमल जी का मुझे परिचय प्राप्त हो गया था और आशीर्वाद स्वरूप उनके पत्र मुझे समय-समय पर मिलते रहें । ‘युग मानस’ के विभिन्न आयोजनों के अवसर पर प्रतिक्रियास्वरूप वे जरूर पत्र लिखते थे और कहीं मेरे लेख छपा मिल जाए तो पढ़कर प्रतिक्रियास्वरूप अवश्य ही मुझे पत्र लिखा करते थे । हिंदीतर प्रदेश के एक युवक के साथ ऐसी श्रद्धा पकट करना विमल जी के विराट लेखकीय व्यक्तित्व की विशिष्ट शोभा थी । सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन के जाने माने विशेषज्ञ पितामह जैसे विराट साहित्यकार, कवि, आलोचक डॉ. कुमार विमल जी के साहित्यिक प्रदेयों से कई साहित्य-प्रेमी सुपरिचित हैं । कुमार विमल जी के अपने पाठक व हितैषियों के प्रति अति विशिष्ट आत्मीयतापूर्ण संबंधों के सबूत के रूप में उनके पत्र मेरे लिए धरोहर बन गए हैं । कई विशिष्ट शैक्षिक, प्रशासनिक, साहित्यिक पदों पर रहते हुए भी वे अपनी से आयु व स्तर में बिल्कुल छोटे मेरे जैसे इन्सानों के प्रति जो आत्मीयता वे प्रकट करते थे उसका मैं हमेशा श्रद्धापूर्ण स्मरण करता रहता हूँ ।
डॉ. कुमार विमल जी पटना और मगध विश्वविद्यालय में अध्यापन के अलावा बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक के पद सुशोभित थे । पद और प्रतिष्ठा उनके पीछे लगा हुआ था । कई पदों की उन्होंने शोभा बढ़ाई थी । नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में, बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में, कई प्रतिष्ठित साहित्यिक समितियों में सदस्य के रूप में और भी कई महत्वपूर्ण पदों और जिम्मेदारियों को वे पूरी कुशलता व निष्ठा से निभा चुके हैं ।
विमल जी की विराट साहित्यिक यात्रा का आकलन चंद पंक्तियों में प्रस्तुत करना दुस्साहस ही होगा । फिर भी विमल जी जैसे विशिष्ट साधक के प्रदेयों से नई पीढ़ी को अवगत कराने के बहाने दुःख के इन क्षणों में कुछ पंक्तियां जरूर लिखने के लिए मेरा मन कर रहा है । कुमार विमल जी की कई काव्यात्मक पंक्तियाँ इस समय मेरे मनोपटल पर प्रकट होती और ओजल होती जा रही हैं । मगर इन पंक्तियों को भूलना तो उनके विराट लेखन को ही विस्मृत करने के समान होगा,
“तम में जीकर मीत
ज्योति के गीत लिखे हैं मैंने।
विष पीकर सुर में गाये हैं
गीत अमृत के मैंने।”
आमतौर पर कवि कल्पना लोक में विचरते हुए अपनी भावनाओं की सौंदर्यमय अभिव्यक्ति की कोशिश करता है, मगर विमल जी ने अपने अंतर्मन की पीड़ा को छिपाकर समाज के यथार्थ को प्रस्तुत करने, ज्योति पुंज प्रज्ज्वलित करने और क्रांति की चेतना फैलाने की भरपूर सार्थक कोशिश की है ।
सौंदर्यशास्त्र के अद्येता के रूप में उन्होंने कई कृतियाँ लिखी हैं । चौदह वर्ष की आयु में (1944-45 के बीच) लेखन आरंभ करने वाले डॉ. विमल जी का जन्म 12 अक्तूबर, 1931 को बिहार स्थित कालूचक-विश्वपुरिया नामक गाँव में हुआ था । आज़ादी आंदोलन के प्रबल होते दिनों में लेखन आरंभ करनेवाले विमल जी की कविता में सहज ही वह अंगार था, जो भारत छोड़ो आंदोलन (1942 ई.) के दौरान उत्पन्न क्रांति की चेतना से भरपूर था । नव-किशोर विमल जी की लेखनी से निसृत ये पंक्तियां उनकी आरंभिक काव्य-चेतना के विशिष्ट सबूत हैं,
“बढ़े यही अंगार निरंतर
फूँक शंख जग जाय कपाली,
तेरे पद की चाप-चाप पर
नाच जाय रे क्रांति-कराली।”
उनका पहला काव्य संग्रह, जिनमें उनकी प्रारंभिक 22 कविताएँ संकलित हैं, ‘अंगार’ के नाम से ही 1949 में भागलपुर से प्रकाशित हुआ था । सात दशकों की उनकी साहित्यिक-साधना के दौरान कई कृतियाँ सामने आई हैं, वे सब हिंदी साहित्य की धरोहर हैं । उनके लगभग एक दर्जन काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं, उनमें प्रमुख हैं, अंगार (1949), ये संपुट सीपी के (1972), ये शीरीं, ये तुर्श (1972), ये अभंग अनुभव अमृत (1975), सर्जना के स्वर (1986), युग-मानव बापू (1986), एक राष्ट्र है, एक देश है (1986), कविताएँ कुमार विमल की (1994), सागरमाथा (2002) आदि । विमल जी की कई आलोचनात्मक कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं, उनमें प्रमुख हैं, मूल्य और मीमांसा (1956), महादेवी वर्मा : एक मूल्यांकन (1962), नई कविता, नई आलोचना और कला (1963), आधुनिक हिंदी काव्य (1964), सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (1966), कला-विवेचन (1968), छायावाद का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन (1970), काव्यानुशीलन : आधनिक- अत्याधुनिक (1970), महादेवी का काव्य-सौष्ठव (1983), साहित्य-चिंतन और मूल्यांकन (1977), तीन शिखर कृतियाँ (2000), उत्तमा (2002), साहित्य-विवेक (2004), आलोचना और अनुशीलन (2006) आदि । अंग्रेजी में उनकी एकाध कृतियाँ प्रकाशित हैं । उनकी प्रकाशित, संपादित कृतियों की सूची इतनी लंबी है तमाम रचनाओं का उल्लेख इस छोटे-से संस्मरण में संभव नहीं है ।
विमल जी जैसे सक्रिय, सचेत, आत्मीयतापूर्ण मनीषी साहित्यकार का निधन साहित्यिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है । उनके श्रद्धालुओं के लिए तो ये अनंत दुःख के क्षण हैं । उनका विचार संसार व्यापक रहा है और उनकी असंख्य आलोचनात्मक कृतियों से वे हमेशा अपने पाठकों के दिलों-दिमाग में बसे रहेंगे । सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन को उनके प्रदेयों को हिंदी साहित्य कभी विस्मृत नहीं कर सकता है । डॉ. कुमार विमल जी की दिवंगत आत्मा को असीम शांति मिले । उनकी आत्मीय स्मृतियों के लिए अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि सहित...।


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