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गिरगिट का फ्यूचर ब्राइट

प्रकाशन :रविवार, 5 फरवरी 2012
सूर्यकान्त त्रिपाठी

गिरगिट जी बेहद परेशान है। हैरान है। आखिर नेताजी से उनकी किस जन्म की दुश्मनी थी, जो उसका बदला इस तरह निकाल रहे हैं। उनका नाम तक डूबा दिया। सब कलियुग महाराज की माया है। यहां लोकतंत्र का साया है। और कुछ-कुछ खादी का कारनामा है। यही सब सोचकर खुद को समझा रहे हैं गिरगिट जी। बेचारे सोच रहे हैं कि भला नेताजी से वह क्या खाकर बराबरी कर सकते हैं। नेताजी हर मामले में उनके चार हाथ आगे ही है। वह ठहरे शुद्ध रुप से चौपाया। एक सीधे-साधे जीव है और किसी पेड़ की डाल में दुबक कर दो चार मक्खियां मार ले यही ऊपर वाले की बड़ी कृपा है, वरना कई बार भारतीय जनता की तरह उनको भी भूखों मरने की नौबत आ ही जाती है। आपूर्ति के बावजूद मक्खियां कहां चली जाती है, इसका गणित उनको ठीक वैसे ही नहीं समझ में आ रहा है, जैसे भारतीय जनता को अनाज की आपूर्ति के बावजूद महंगाई की।

नेताजी उधर ढोल पीट रहे है। महंगाई के रंग में रंगी रे चदरिया। मैं क्या करूं राम। वह ठहरे सामिष। लेकिन अपने नेताजी तो पूरे सर्वभक्षी है। चारा से लेकर दूरसंचार के केबल और बालू से लेकर नदियों का कीचड़ तक चट कर जाते हैं। गिरगिट जी को मजबूरी न हो तो अपने असली रंग में ही रहते हैं। खूबसूरत से मटमैले रंग में। मिट्टी के रंग से मिलता-जुलता धूल-धूसरित। गिरगिट जी रंग तभी बदलते है जब उनको जान के लाले पड़ जाते हैं। लेकिन अपने नेताजी के पास कितने पाएं है, इसका पता उनको खुद नहीं रहता। तुलसी बाबा की चौपाई की तरह बहु मुख और बहु पद बाहू। खुदा खैर करे लोकतंत्र का। वरना मायावी नेताजी की पौध का पता ही नहीं चलता। वैसे जहां तक रंग बदलने की बात है। इस मामले में वह गिरगिट जी के दादा गुरु के भी गुरु है जी।

दिन में कितनी बार रंग बदल दे उनकी घरवाली को भी पता नहीं चलता है जी। बेचारी मुंह बाए आएं-बाएं करती रह जाती है। अभी गिरगिट जी इसी सोच में पड़े थे कि कुछ बाबा जी लोगों को भी रंग बदलते देख चौक पड़े। यही हाल रहा फिर धर्म धुरंधरों व धुंधकारियों में अंतर खोजना मुश्किल हो जाएगा जी। जनता बेचारी रंगत ही देखती रह जाती है और नेताजी ये जा और वह जा। रंग बदलने में अपने नेताजी का कोई जोड़ नहीं जी। गिरगिट जी मुस्कराते हैं। यह सब चलता रहा तो कम से उनके बाल बच्चों का फ्यूचर ब्राइट रहेगा। बाल बच्चे नेताजी को देखकर रंग बदलने की कला में इजाफा करते जाएंगे। नेता नहीं मिले कोई बात नहीं अपने बाबा जी लोग तो इधर-उधर डोलते मिल ही जाएंगे जी। अपुन को रंग बदलने की कला सीखने से मतलब है। बाबा हो या नेता।


  सूर्यकान्त त्रिपाठी
उप समाचार संपादक
दैनिक प्रभात
मेरठ
yesh.tripathi11@gmail.co
 
         
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