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खेल और खिलवाड़ : कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स है पैसे का पहाड़

प्रकाशन :शुक्रवार, 24 सितम्बर 2010
अविनाश वाचस्पति

खेल ख़त्म पैसा हजम वाली कहावतें अब पुरानी पड़ चकी हैं। अब कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स को ही लो,  अभी खेल शुरू भी नहीं हुए हैं और पैसे हजम किए जा चुके हैं। वैसे खेल नहीं, खिलवाड़ पुकारा जा रहा है।   इंतज़ार क्‍यों करे और कौन करे, क्‍या भरोसा खेल ख़त्म होने से पहले पैसे ही ख़त्म हो जाएँ।

पुराने जमाने में जाँच नहीं हुआ करती थीं और आंच का भय नहीं होता था, राम-सीता वाला आँच का मामला इसका अपवाद है। तब घपले-घोटाले करने की रफ़्तार भी धीमी ही हुआ करती थीं। भरोसा रहता था कि जो भी थोड़ा बहुत हिस्‍सा अगर होगा, तो मिलेगा। सिर्फ़ चुपड़ी-चुपड़ी चार से चालीस रोटियां तक खाने का रिवाज था। आजकल सबके लिए पिज्‍जा, बर्गर, पैटीज इत्‍यादि का जुगाड़ किया जाता है।

जितनी भी बेईमानी थी, कम थी और बेईमानी पूरी ईमानदारी से की जाती थी।  ‘जय बोलो बेईमान की’ जैसे गाने फ़िल्‍मों में ख़ूब धड़ल्‍ले से बजाये-सुनाये जाते थे। आजकल बेईमानी के डंके और डंक का वर्चस्‍व है। बेईमानी में भी बेईमानी एक नया मंत्र फूंका जा रहा है – ईमानदारी का कोई काम नहीं,  कोई नामलेवा नहीं। ईमानदारी की जान लेने के सबके सम्मिलित प्रयास ज़ोर-शोर से जारी हैं। न ईमानदारी के काम से और न बेईमानी के नाम से, जो कुछ भी हासिल होगा,  वो बेईमानी करने से ही मिल सकता है।

पहले पैसे हजम कर लो, खेल शुरू होंगे, तो देर सवेर ख़त्म हो जायेंगे। जोख़िम है तो वो भी लुभावना है, पैसे हजम करने का मौक़ा मिल रहा है, इसलिए मन आनंदित है और आनंदित मन सब कुछ हजम करने की सामर्थ्‍य रखता है और रोज़ाना यही हो रहा है, मैं कोई झूठ बोल्‍या ?

बेईमानी के गुणगान के बाद अब बारी आई है, खेलने-कूदने की और पढ़ने-लिखने में तुलना करने की। जी हाँ, पढ़ने लिखने वाले नए-नए नवाब बने हैं। नवाबी वही जो बेहिसाब अकूत धन का स्‍वामी बनाए, बेईमानी से यही हासिल हो रहा है। यह नवाबी हर जगह बदनामी के संग-साथ मौज़ूद है। खिलाडि़यों को सुविधाएँ देने का ज़िम्‍मा इनका है इसलिए आजकल उनकी लेन में चलकर उनके मजे ख़ूब तेज़ी से दौड़ रहे हैं।

जो खेल रहे हैं, आजकल वे नवाब से कम नहीं हैं। वे खेलते-कूदते हैं इसलिए पढ़े लिखे उनके बल पर नोटों से खिलवाड़ करते हैं। इधर नोटों से खिलवाड़ अच्‍छा, मैडल मिले ना मिले, कोई फ़रक नहीं पड़ता। अलबत्‍ता, फिक्सिंग, स्‍पाट फिक्सिंग में क़िस्‍मत आज़मा लेते हैं और इसमें नवाबियत देने की संपूर्ण क्षमताएँ मौजूद हैं।

आजकल खेल-कूद कर और उछा-उछला कर, खिला-कुदा कर नवाब बनने-बनाने की मुहिम ज़ोरों पर हैं। नाम किसी एक का क्‍या लेना, सबकी क़िस्‍मत के सितारे बुलंदी पर हैं। कभी आई पी एल जरिया होता है और अब कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स मज़बूत सरिया बना हुआ है।


  अविनाश वाचस्पति
साहित्‍यकार सदन
पहली मंजिल, 195 सन्‍त नगर
नई दिल्‍ली 110065
मो.-9868166586
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