श्रेणियाँ

आओ सवाल-सवाल खेलें

प्रकाशन :सोमवार, 28 नवम्बर 2011
डॉ. पुष्पेंद्र दुबे

ज देश में हर कोई सवाल-सवाल खेल रहा है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां कोई सवाल मुंह बाये न खड़ा हो। देश की संसद और सांसद सवालों के घेर में है। प्रधानमंत्री पर सवालों के गोले दागे जा रहे हैं। वे पूरे अहिंसा भाव से इन गोलों को फूलों की तरह स्वीकार कर रहे हैं। उनके मंत्री सवालों के चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं। सवालों का जवाब देते-देते उनकी सांसें फूल गयी हैं, पर तोंद बढ़ती जा रही है। प्रदेशों के मुख्यमंत्री सवालों के फरे में पड़कर अपनी कुर्सी गंवा रहे हैं। उन पर सवालों की बौछार की जा रही है, वे उसका उत्तर अपनी जिंदादिल मुस्कान से दे रहे हैं। बड़ी अजीब तरह की मुस्कान है। उसका इतना ही अर्थ लगाया जा सकता है ‘उल्लू बनाया,.........’। आगे भी बनाता रहूंगा और तुम ऐसे हो कि बनते रहोगे। प्रदेश के सामंती मंत्रियों पर इन सवालों का कोई असर होता नहीं दीख रहा है। इन्हीं के दम पर मुख्यमंत्री अपनी सत्ता की नाव खे रहे हैं। सवालों के समंदर में उठने वाले तूफानों से वे तनिक भी विचलित नहीं हैं। सिर्फ हमारी विधायिका ही सवालों से जूझ रही हो, ऐसी बात नहीं है। न्यायपालिका ने जब भी इन सवालों का जवाब मांगने की कोशिश की, पता चला अगले दिन खुद सवालों के जवाब देते फिर रही है। और कार्यपालिका के तो कहने ही क्या हैं ? उसकी तरफ कोई सवाल उछाल कर तो देखे, क्या मजाल उसे अपने सवाल का जवाब जीते जी मिल जाए। उलटे सवाल पूछने वाला ही जीवन भर जवाब देते-देते थक जाए।

आजादी के बाद आज यदि किसी के पास कुछ है तो ढेर सारे चुभते सवाल, जिसका उत्तर किसी के पास नहीं है। शिक्षक दिवस पर हर विद्वान वक्ता यह बात दोहराता पाया जाता है कि आज की शिक्षा व्यवस्था अनेक सवालों से दबी हुई है। जिससे सारे सवालों का हल मिलना चाहिए, उसकी हालत ऐसी है तो इस देश का क्या हो सकता है ? देश के गोदाम अनाज से भरे हुए हैं, परंतु लोगों के सामने पेट भरने का सवाल मौजूद है। देश की मिलें लाखों मीटर कपड़ा बना रही हैं, लेकिन लोगों के पास तन ढकने को लत्ता तक नहीं है। विकास के दौर में बड़ी-बड़ी टाउनशिप बन रही है, लोगों के पास एक अदद छत नहीं है। सरकार कागजों में प्रतिवर्ष करोड़ों रोजगार पैदा कर रही है, लेकिन करोड़ों लोग आज भी बेरोजगार हैं। अन्न देवता किसान देश को अनाज खिलाने के बाद आत्महत्या करने पर मजबूर है। ये ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर कोई नहीं देना चाहता। साहित्यकारों के लेखन पर सवाल है। प्राध्यापकों, शिक्षकों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, उद्योगपतियों पर सवाल ही सवाल हैं।

पिछले दिनों एक पूरी सवाल टीम ही उभरकर सामने आयी। उसने खूब जोर-शोर से सवाल करना शुरू किए। मीडिया ने उसके सवालों को आम जनता तक पहुंचाया और पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया। थोड़े दिन बीते और पूरी सवाल टीम पर सवालिया निशान खड़े हो गए। अगर-मगर के बाद भी मुकम्मल उत्तर आज तक नहीं आ पाया है। जब पूरा देश ही सवालों से घिरा हुआ है तो इसका उत्तर विदेशी ही ठीक से दे सकते हैं। आजादी के दौर में जो देश सवालों के उत्तर नहीं खोज पाता, उसके गुलाम होने की आशंका बढ़ जाती है। मैं यही सोचकर खुश हूं कि आजादी के छठी लड़ाई का मैं स्वतंत्रता सेनानी बनूंगा। छठी इसलिए कि पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी और पांचवी तो हो चुकी हैं।

पूरा देश सवालों के मजे लूट रहा है। सवालों को सुन-सुनकर ही लोग दोहरे हुए जा रहे हैं। जब करने को कुछ न हो, तो सवाल करो। इस बात को एक विवाहित, एक शिक्षक से बेहतर कौन समझ सकता है। जिन लोगों के सामने वोट का सवाल है तो उसका उत्तर यही है कि वोट न दिया जाए तो कैसा रहे !!

  डॉ. पुष्पेंद्र दुबे
डी-37 सुदामा नगर, इन्दौर 452009
मो. 97542-20781
prof.pushpendra@gmail.com
 
         
Bookmark and Share
टिप्पणी लिखें
 
वाक्यांश खोजें




Bing


Site Search Site Search
लेखागार (Archive)

RoboForm: Learn more...