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 पता नहीं किस खब्त में आकर मैने अपने योग-केंद्र के सदस्यों एवँ धर्मपत्नी के साथ जाड़े में नैनीताल, जागेश्वर एवँ बिनसर की यात्रा का टिकट क्रय कर लिया था। यात्रा प्रारम्भ करने के लिये अभी एक सप्ताह शेष है, परंतु जाड़ा सामान्य से अधिक हो गया है और नैनीताल की ठंड की कल्पना से ही बदन में फुरहरी छूटने लगती है। तेज़ी से बदलते मौसम के कारण मेरे घर के आस-पास ज्वर-पीड़ित लोगों की बाढ़ आई हुई है जिन्हें देखकर हम दोनो का दिल भी कपकपाने लगता है। इस कपकपी का कारण हमारे बदन की हरारत के बजाय ज्वर लग जाने का भय अधिक है। मेरी पत्नी ऊपर से हंसते हुए परंतु दिल से काँपते हुए दो-एक बार कह चुकी है,

“लगता है इस बार पहाड़ों से हमारी कुल्फी बनकर ही लौटेगी।”

कुल्फी का नाम सुनकर मुझे हंसी आती है और मन में विचार आता है कि इतनी कुल्फी तो अच्छे मूल्य पर बिक सकती है और विरासत में पर्याप्त धन छोड़ा जा सकता है। फिर मुझे भी लगने लगता है कि इन दिनो उत्तराखंड जाना है तो ‘आ बैल मुझे मार’ वाली बात। लखनऊ में घर पर बैठकर कम्बल की गर्मी का सुख उठाने के बजाय ठंड में सिकुड़ने और फिर एम्बुलेंस में या टिकठी पर घर लौटना कहाँ की अक्लमंदी है?

पत्नी तो जाने से बचने हेतु कोई उपयुक्त बहाना रोज़-रोज़ ढूंढती ही रहती हैं। आज प्रातः गरम चाय की चुस्की के साथ समाचार-पत्र पढ़ते हुए उन्हें कुछ काम का मसाला मिल गया और वह मुस्करा कर बोलीं,

“देखिये आज के अखबार में एक बड़ी पते की खबर है!”

मैँ आश्चर्यचकित था क्योंकि सामान्यतः महिलाएं ‘पते की खबर’ - जैसे स्पोर्ट्स, राजनीति अथवा शेयर मार्केट - पर कम ही ध्यान देतीं हैं। अतः मै उनकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगा।

तब वह बताने लगीं,

“हमारी उत्तराखंड की प्रस्तावित यात्रा के दौरान यहां लखनऊ महोत्सव आयोजित हो रहा है, जिसमें बड़े आकर्षक ऐडवेंचर स्पोर्ट्स आ रहे हैं। इनमें प्रत्येक का टिकट भी केवल पचास से सौ रुपये के बीच ही होगा। खूब ऊंचाई पर रस्सियों से बने ‘बर्मा ब्रिज’ पर चलकर जान की बाज़ी लगानी हो, तो पचास के टिकट में काम चल जायेगा। यदि हड्डीतोड़ कमांडो ट्रेनिंग लेने के लिये ‘कमांडो नेट’ से गुज़रना हो तो भी पचास के टिकट से काम चलेगा। यदि इस नश्वर शरीर को जीवित जलाने का खतरा मोल लेना हो, तो टायर क्रौसिंग का टिकट भी पचास का ही मिलेगा। यदि अपने शरीर का भुरकुस बनवाने का जोखिम उठाना हो, तो पचास रुपये में ट्रैम्पलिंग का मज़ा लिया जा सकता है।”

इस समाचार को इतने मनोयोग से सुनाने का आशय भांपकर मैंने पूछा,

‘क्या तुम यह समझती हो कि उत्तराखंड में पांडवों की भांति बर्फ में गलने के बजाय ये जोखिम उठाने के बाद अस्पताल के वातानुकूलित आईसी यू का आनंद उठाना श्रेयस्कर होगा?’

पत्नी सच में उत्तराखंड की ठंड से घबराई हुई थीं। उन्होने मुझे घूरकर देखा और फिर स्वर में पूर्ण गम्भीरता भरकर बोलीं,

“हाँ। मैँ यही समझती हूं। मुझे लगता है कि इन सभी ऐडवेंचर्स का टिकट भी इसीलिये इतना कम रखा गया है कि प्रतिभागियों के घायल होने के उपरांत उनके पास आई। सी। यू। में इलाज कराने के लिये पर्याप्त मुद्रा बची रहे।”

कुछ देर पश्चात पुनः अखबार में आंख गड़ाकर बोलीं,

“अरे असली आइटम तो रह ही गया – ‘केवल सौ रुपये के टिकट पर गैस के गुब्बारे में लटके खटोले पर बैठकर पूरे लखनऊ का वायुमार्ग से दर्शन’।”

मैं आश्चर्य से दीदे फाड़े पत्नी की ओर देखता रह गया। मेरे मुँह से निकला कि यह नहीं हो सकता है क्योंकि पांच वर्ष पहले जब हम दोनो अमेरिका के कालामज़ू नगर में थे, तब ऐसा गुब्बारा उड़ते देखकर मैंने अपने मेज़बान से उस पर उड़कर कालामाज़ू देखने की इच्छा प्रकट की थी, परंतु उनके यह बताने पर कि डेढ़ सौ डालर में एक घंटे का चक्कर लगाते हैं, मैं बगलें झांकने लगा था।

इस पर पत्नी बोलीं कि यह भारत है, यहां सब कुछ सम्भव है। हां यहां की और अमेरिका की गुब्बारा-उड़ान में अंतर केवल इतना होगा कि अगर यहां किराया नब्बे गुना कम है, तो गुब्बारे के फट जाने, भस्मीभूत हो जाने, धरती पर औंधे मुंह गिर जाने अथवा अपने नीचे लटके खटोले को झटककर गिरा देने का चांस कम से कम नब्बे गुना अधिक होगा।

फिर कुछ सोचकर पत्नी आगे कहने लगीं,

“पर मेरी समझ में यह उत्तराखंड जाकर कुलफी बन जाने अथवा वहां किसी ऐडवेंचर में घायल होकर अपंग हो जाने से बेहतर है, क्योंकि इसमें बचने का चांस लगभग शून्य है- अर्थात बिना दर्द से चीखे-चिल्लाये सीधे स्वर्गारोहण। इसके अतिरिक्त एक और लाभ हो सकता है- चूंकि भारी-भरकम यम को धरती पर उतरना नहीं पड़ेगा और ऊपरी वायुमंडल से हमें उठा ले जाने में कम श्रम करना पड़ेगा, अतः सम्भव है कि इस बात का खयाल रखकर वह हमें बोरे की तरह पीठ पर फेंकने के बजाय आहिस्ता-आहिस्ता प्रेम से पीठ पर बिठाल कर ले जाये। इससे स्वर्ग के रास्ते में उसकी खुरदरी पीठ कम चुभेगी।”

आज पत्नी ने गुब्बारा-उड़ान के इतने आश्वस्तकारी लाभ बता दिये हैँ कि मैं भी इस दुविधा में पड़ गया हूं कि काठगोदाम का रेल का टिकट रखूं या उसे वापस कर गुब्बारा-स्वर्गाभियान का टिकट खरीद लूं।