श्रेणियाँ

नेताजी की वेलेंटाइन

प्रकाशन :मंगलवार, 14 फरवरी 2012
सूर्यकान्त त्रिपाठी

स चुनाव के मस्त मौसम में वेलेंटाइन डेज ने आग लगा दी है। इसको कहते हैं, पानी में आग लगाना जी। हर तरफ रहस्य-रोमांच का सीन क्रिएट हो गया है। यहां सब कुछ है। सस्पेंस, सनसनी और न जाने क्या-क्या। एक वेलेंटाइन और हजारों दीवाने। इतने दीवानों की भीड़ देखकर वह कोयल की तरह पंचम स्वर में गा रही है तुम जैसे इस शहर में दीवाने हजारों हैं’। सो लगे रहो मुन्ना भाई। ज्योतिषी धुरंधराचार्य बताते हैं कि ऐसा दुर्लभ संयोग सदियों में बस एक बार आता है जिसकी शुरुआत बंसत से हो, चरम वेलेंटाइन के मादक मौसम में दिखे और दी एंड होली में। यानी हर तरफ प्रेम की बयार ही बयार बह रही हो और हर दीवाना इस प्रेम में मर मिटने को तैयार हो। ज्योतिषी जी का कहना है कि अब यह संयोग कब आएगा, इसका पता ग्रह नक्षत्र भी नहीं बता रहे हैं। वह अपनी-अपनी वेलेंटाइन को रिझाने में जुट गए हैं, ताकि उनके हाथ से दुर्लभ मौका न निकल जाएं। सो इस बार किसके हाथ में प्यार का गुलाब और किसकी झोली में कांटे ही कांटे आएंगे इसका पता खुद वेलेंटाइन को नहीं है। हजारों दीवाने जब दिल को हाथ में लेकर आगे-पीछे घूम रहे हों तो मिस्टर परफेक्ट को ढूंढना वाकई राई के पहाड़ में सुई खोजने से कम नहीं होता जी।

मिस वेलेंटाइन इतने दीवानों को देखकर कनफ्युजिया गई हैं। समझ नहीं पा रही हैं कि किस प्रेमी के गले में हाथ डालकर प्रामिस करें और गा उठे ‘लो जी मैं हारी पिया’। लगता है इसी दुर्लभ संयोग में ही अपने एक दिलजले शायर ने लिख मारा था ‘यह इश्क नहीं आसां इतना समझ लीजै, इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है’। अब शायर महोदय को कौन समझाए। आपके जमाने में लोग इश्क को आग का दरिया समझते होंगे हम तो आग को आग समझते ही नहीं जी। फिर वह मर्द क्या जो आग से खेल न सके। यहां तो सभी आग के दरिया में डूबने को तैयार हैं। सबसे ज्यादा बेताब हैं अपने नेताजी। कुर्सी वाली वेलेंटाइन को रिझाने को हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। ऐसे-ऐसे हथकंडे की इतने में कोई आशिक एक दिन में कई वेलेंटाइनों के साथ किसी कैफे में आराम से बैठ कर आनंद के सागर में गोते लगा लें। इसको कहते हैं नसीब अपना-अपना भाग्य व अपनी-अपनी वेलेंटाइन। सो नेताजी कुर्सी वेलेंटाइन को रिझाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। कई तो जान देने पर आमादा हैं। बस एक बार कुर्सी वाली वेलेंटाइन इशारा भर कर दे। वह तो उसके इशारे पर फांसी के फंदे पर भी हंसते-हंसते लटकने को तैयार हैं। पूरे शहीदाना अंदाज में हंै। मौसम ही ऐसा है। सत्ता मद पाने का नशा होता ही ऐसा है। मदन मद इसके आगे पानी भरता है जी और प्रेम वह तो इसके आगे अपने जान की भीख मांगता है। सो लगे रहो नेताजी।

  सूर्यकान्त त्रिपाठी
उप समाचार संपादक
दैनिक प्रभात
मेरठ
yesh.tripathi11@gmail.co
 
         
Bookmark and Share
टिप्पणी लिखें
 
वाक्यांश खोजें




Bing


Site Search Site Search
लेखागार (Archive)

RoboForm: Learn more...