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अनुवाद के नियम-अनियम

प्रकाशन :रविवार, 1 अगस्त 2010
अमृत मेहता

नुवाद के अनेकों पहलू होते हैं। हर अनुवाद अपनी नयी समस्याएँ ले कर आता है, अनगिनत समस्याएँ। इस हल्क़े-फुल्क़े आलेख में मैं स्वयं के अनुभवों पर आधरित कुछ समस्याओं पर अपने विचार प्रस्तुत करूँगा। हर समस्या को इस आलेख में नहीं समेट पाऊँगा, लेकिन कोशिश करूँगा कि कुछ मुख्य समस्याओं पर प्रकाश डाल सकूँ।

मेरी दो मातृभाषाएँ हैं, पंजाबी मेरी मातृभाषा है, हिंदी मेरी मातृभाषा है। भाषाविज्ञान में भाषा1, भाषा2 अर्थात L1 और L2 की जो परिभाषा है, उसने मुझे सोचने के लिए मजबूर किया है कि मेरी L1कौन सी है, और L2कौन सी है। पंजाबी मैं बचपन से घर में, पड़ोस में, स्कूल में बोलता रहा था। हिंदी मेरी स्कूल की भाषा1थी, जहाँ मैं इस भाषा में अपने अध्यापकों से बात करता था। फिर अँगरेज़ी आ गयी, जिसे अधिकाँश शिक्षित भारतीय अपनी भाषा2मानते हैं; महानगरों में इस भाषा को L1मानने वालों की भी कमी नहीं है। खैर, अनुवादक के रूप में अँगरेज़ी से अथवा अँगरेज़ी में अनुवादों के सन्दर्भ में मेरा गाहे-बगाहे अँगरेज़ी से सरोकार रहा है। भारतीय सन्दर्भ में यह सरोकार सरकारी नीतियों द्वारा हम पर थोपी गयी मजबूरियों की वजह से अधिक रहा है, तथापि मेरे लिए अँगरेज़ी L4अर्थात भाषा4रही है।

मैं बात भाषा1की कर रहा था। सामान्यतः किसी व्यक्ति द्वारा घर में माँ से सीखी गयी और गली-मोहल्ले में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा L1होती है। लेकिन मुझे यह मालूम होते-होते बहुत समय लगा कि मेरे मामले में यह सिद्धांत सही नहीं बैठता। जीवन के प्रारम्भिक १०-१२ वर्षों में मेरी लगभग एकमात्र भाषा पंजाबी ही थी। लेकिन एक दौर ऐसा आया, जब मैनें पाया कि पंजाबी मेरी मातृभाषा तो ज़रूर है, लेकिन L1 अर्थात भाषाविज्ञान की दृष्टि से भाषा1नहीं है। यह सच्चाई मुझ पर ‘अनुवाद’ ने प्रकट की।

अनुवाद के क्षेत्र में, जहाँ मेरी मुख्य धारा जर्मन-हिंदी अनुवाद है, मैनें कई बार, यूं ही, अपनी दो मातृभाषाओं से और में अनुवाद करने की कोशश की, और मैने पाया कि मैं हिंदी से पंजाबी में अनुवाद उतनी आसानी से नहीं कर पाता, जितनी आसानी से पंजाबी से हिंदी में कर लेता हूँ, यह मामूली सा अनुभव अनुवाद के शाश्वत सिद्धांत की पुष्टि करता है कि ”मातृभाषा ही अनुवाद की लक्ष्य भाषा हो सकती है।” और चूँकि मुझे जिस लक्ष्य भाषा में अनुवाद करने में सहजता अनुभव होती है, वही मेरी मातृभाषा है, और चूँकि मेरी दो मातृभाषाएँ हैं, तो मैं अपने “सहज-अनुवाद-अनुभव” के आधार पर कह सकता हूँ कि हिंदी मेरी भाषा1और पंजाबी मेरी भाषा2है।

लक्ष्यभाषा मातृभाषा होने के उसूल को मद्दे नज़र रखते हुए अनुवादक की पहली समस्या का समाधान तो यहीं हो जाता है कि मातृभाषा को ही लक्ष्यभाषा बनाना है, दूसरी भाषा को नहीं, अगर दूसरी भाषा को लक्ष्यभाषा बनाना ही है तो दूसरी भाषा जिस की मातृभाषा है, उसकी मदद लेनी है।

इसी सन्दर्भ में मैं हर भारतीय भाषा से अँगरेज़ी में हो रहे साहित्यिक अनुवादों पर टिपण्णी करना चाहूँगा कि अपनी L1अँगरेज़ी बताने वाले भारतीय भी कभी किसी विदेशी भाषा से अँगरेज़ी में साहित्य का अनुवाद करने का साहस नहीं जुटा पाए, क्योंकि इन अनुवादों पर नज़र रखने वाले अँगरेज़ी भाषा-भाषी उनमें हज़ारों ख़ामियाँ ढूँढ लेंगे। ऐसे कई आलोचनात्मक लेख मैं पढ़ भी चुका हूँ, जिनमें अँगरेज़ भारतीय भाषाओं से भारतीयों द्वारा किये गए अँगरेज़ी अनुवादों की बखिया उधेड़ चुके हैं। अँगरेज़ी में मूल लेखन और बात है, जो काम अनेकों इन्डो-एन्ग्लियन लेखक अंजाम दे चुके हैं, और बुकर तथा नोबेल पुरस्कारों से सम्मानित भी हो चुके हैं, लेकिन अनुवाद स्वयं की कल्पना की उड़ान नहीं होती, जिसे जहाँ चाहे मोड़ लिया जाए, अतः यह प्रमाणित सत्य है कि कोई भी भारतीय अपने सर पर विदेशी साहित्य का अँगरेज़ी या किसी अन्य विदेशी भाषा में अनुवाद नहीं करता। जहाँ तक भारतीय भाषा साहित्य के अँगरेज़ी में अनुवाद का प्रश्न है, वे अनुवाद भारत में एक विशेष वर्ग के लिए किये जाते हैं, अँगरेज़ों-अमरीकनों के लिए नहीं। यह सत्य है कि अँगरेज़ी में किये गए ऐसे अनुवाद विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य के मध्य सेतु का काम भी करते हैं, लेकिन यही काम हिंदी बख़ूबी अंजाम दे सकती है, परन्तु असंगत सरकारी नीतियों के कारण भारत में साहित्यिक अनुवाद की भाषा के रूप में अँगरेज़ी का वर्चस्व बना हुआ है।

यह अनुवाद कि समस्या नंबर २ है, जो सिर्फ़ भारत पर लागू होती लहै, खास कर भारतीय भाषाओं से और में अनुवाद करने वालों पर।

यह कहते हुए मैं स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि मैं साहित्यिक अनुवादों की बात कर रहा हूँ। वैज्ञानिक तथा तकनीकी अनुवादों में समस्याएँ ना के बराबर होती हैं, हालाँकि सफल वैज्ञानिक और तकनीकी अनुवादकों के लिए ऐसे अनुवाद नितांत अर्थकारी सिद्ध हो रहे हैं। इन अनुवादों के लिए मुख्यतः मूल भाषा की व्याकरण का ज्ञान ही पर्याप्त है। 90 % यूरोपीय भाषाओं की 90% तकनीकी एवं वैज्ञानिक शब्दावली लातिन तथा ग्रीक से है, अर्थात लगभग हर यूरोपीय भाषा में वह सामान रूप से पाई जाती है। शेष बची 10% शब्दावली के अर्थ तकनीकी शब्दकोशों में खोजे जा सकते हैं।

अनुवाद की समस्याओं में कुछ मुख्य मुद्दों पर विवेचन करें। यह सर्वविदित है कि साहित्यिक अनुवादों में दो तरह की समस्याएँ पेश आती है, (क) भाषिक, और (ख) ग़ैर-भाषिक, अर्थात सांस्कृतिक। वास्तव में किसी विदेशी भाषा से साहित्य का अनुवाद करना एक संस्कृति का अनुवाद करना होता है। कई बार यह भी होता है कि भाषिक समस्या के साथ ही सांस्कृतिक समस्या भी जुड़ी होती है, लेकिन साहित्यिक अनुवादों में वास्तविक समस्या एक इतर संस्कृति का मातृभाषा में अनुवाद ही है। इस सन्दर्भ में एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में अथवा एक यूरोपीय भाषा से दूसरी यूरोपीय भाषा में साहित्यिक अनुवाद इतने कठिन नहीं माने जायेंगे। भाषिक स्तर पर भारतीय आर्य-भाषाओं में परस्पर अनुवाद अपेक्षाकृत अत्यंत सरल बन पड़ते हैं, क्योंकि उनके व्याकरण तथा वाक्य-विन्यास लगभग सामान होते हैं; और सांस्कृतिक स्तर पर – चाहे विघटनवादी कुछ भी कहते रहें – भारतीय संस्कृति कहीं न कहीं एक सूत्र में पिरोई हुई है, और राष्ट्रीय स्तर पर जनमानस में भावात्मक एकता की प्रबल प्रत्याशा के कारण एक दूसरे की संस्कृति को प्रादेशिक स्तर पर समझना एक सहज प्राकृतिक प्रक्रिया बन चुकी है। इस निबंध में मैं ‘परायी’ संस्कृतियों के अनुवाद में समस्याओं के बारे में कुछ कहूँगा। ‘परदेसी’ या ‘विदेशी’ संस्कृति कहने से अर्थदोष की संभावना रहेगी, क्योंकि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, अफ़गानिस्तान जैसे देशों की संस्कृति विदेशी होते हुए भी पूर्णरूपेण परायी नहीं है।

इन परायी संस्कृतियों के अनुवाद में भाषिक स्तर पर भी कठिनाइयाँ बहुत अधिक हैं, लेकिन एक बार भाषा पर अधिकार प्राप्त कर चुकने के बाद यह मुश्किल तो आसान हो जाती है, मगर संस्कृति के अनुवाद में अनुभवी से अनुभवी अनुवादक को भी नित नयी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, और हर बार कोई नया समाधान खोजना पड़ता है।

अनुवाद में मेरी मुख्य स्रोत भाषा जर्मन रही है, और मूल भाषा हिंदी रही है, अतः मैं अपने निज के अनुभवों के आधार पर इन से जुड़ी समस्याओं का कुछ हद तक विश्लेषण करने की कोशिश करूँगा। और चूँकि पीटर न्यूमार्क की तरह मैं इस सिद्धांत में विश्वास रखता हूँ कि अनुवाद पर लिखते या चर्चा करते हुए बिना उदाहरणों के सैद्धांतिक प्रतिपादन निरर्थक रहता है, अतः मैं अपने कथनों की पुष्टि के लिए उदाहरणों का सहारा लूँगा, जिनमें स्रोत भाषा जर्मन का भी समावेश होगा। कोशिश रहेगी कि कहीं अर्थ के साथ, और कहीं बिना अर्थ बताए, या अँगरेज़ी के माध्यम से, आप मेरे कथन का तत्व समझें।

भाषिक समस्याओं पर अब बात नहीं करूँगा, उन्हें सुलझाने के लिए अभ्यास तथा सहज प्रतिक्रिया कि आवश्यकता है, लेकिन जर्मन सर्वनामों से जुड़ी एक-दो ऐसी भाषिक समस्याओं का ज़िक्र करूँगा, जहाँ भाषा और संस्कृति परस्परव्यापी हैं, जैसे जर्मन सर्वनामों Sie और Du के मामले में। “Sie“ का हिंदी समानार्थ है “आप” तथा „Du“ का हिंदी समानार्थ है “तू” अथवा “तुम”। अँगरेज़ी में इसके लिए एक ही शब्द है: you। अँगरेज़ी में सभी के लिए एक जैसा संबोधन होने से अँगरेज़ी से अनुवाद का काम आसान हो जाता है, लेकिन हिंदी के लिए और मेरे विचार से भारत की अधिकांश भाषाओं में इस सर्वनाम तथा इसके रूपांतरों जैसे तेरा, आपको, तुमसे इत्यादि का अनुवाद एक कठिन समस्या बन जाती है। जर्मन में “आप” और “तू” अर्थात „Sie“ तथा „Du“ में भेद सम्बोधानकर्ता की मध्यम पुरुष से अन्तरँगता पर निर्भर करता है। भारत में बच्चे अपने माता-पिता तथा अध्यापक को “तू” कह कर संबोधित नहीं करते, नौकर अपने मालिक को, मातहत अपने अफ़सर को “आप” ही कहता है इत्यादि। जर्मन में “तू” और “आप” कहने के भिन्न मापदंड हैं: वहाँ माता-पिता और बच्चे, अध्यापक और छात्र, मातहत और अफ़सर सभी एक दूसरे को “तू” कह कर संबोधित कर सकते हैं, अगर घनिष्ठता हो, और “आप” भी कहते है, अगर घनिष्ठता ना हो। वहीँ भारतीय भाषाओं में “तुम” की इन तीन श्रेणियों के आधार प्रभुत्व, विशेषाधिकार, निरंकुशता तथा संस्कृतिमूलक आदर जैसे प्रतिमान हैं। जर्मन से „Sie“ या „Du“ का अनुवाद करने के लिए अनुवादक को कथानक के साथ-साथ पात्रों के परस्पर संबंधों की, उनके मानस की, थाह लेनी पड़ती है, और तभी वह जा कर इस छोटी सी दिखने वाली बड़ी समस्या का समाधान कर सकता है। इसी तरह सर्वनाम “मैं” को लें। “मैं” के लिए जर्मन शब्द है “ich“। यह समस्या जर्मन के साथ भी वैसे ही है, जैसे अँगरेज़ी के साथ है। सिर्फ़ “I” से उत्तम पुरुष का लिंग पता नहीं चलता। कई बार क़िस्सा ख़त्म हो जाता है, तब भी नहीं। हिंदी में “मैं” से लिंग पता नहीं चलता, लेकिन क्रिया के रूपांतर से स्पष्ट हो जाता है। उदाहरण के लिए हम एक वाक्य लेते है, “I lived in a small city।” इसके हिंदी अनुवाद में तो आपको लिखना ही पड़ेगा कि “मैं एक कस्बे में रहता था” या “रहती थी””। निर्णय लेना ज़रूरी है। लेकिन जर्मन या अँगरेज़ी में आगे कहीं संकेत हो तो तभी मालूम पड़ता है कि पात्र पुल्लिंग अथवा स्त्रीलिंग है। लेकिन कई बार मालूम नहीं पड़ता। इन्गेबोर्ग बाख्मन कि एक कथा है „Jugend in einer österreichischen Stadt“ (एक आस्ट्रियाई नगर में बचपन), निकोल म्युलर की एक कथा है, „Nasenbluten“, जिनमें कथक उत्तम पुरुष है, और अंत तक कहीं कोई संकेत नहीं है कि पात्र पुरुष है या स्त्री। अब चूँकि कथाएँ महिला कथाकारों द्वारा लिखी गयी है, अतः अनुवादक ने (मैंने) स्वेच्छा से मुख्य पत्र को नारी माना है, अर्थात समस्या का समुचित समाधान फिर भी नहीं हुआ।

2.

भाषिक समस्याओं पर बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन जैसा कहा गया है, भाषा पर अधिकार पा लेने के बाद उन पर सहजता से पार पाया जा सकता है। मगर संस्कृति से सम्बन्धित समस्याओं का कोई अंत नहीं होता। सांस्कृतिक भेद दो भिन्न संस्कृतियों के इत्तिहास, पौराणिकी, धर्मं, जलवायु, राजनीतिक परिदृश्य, सामजिक आचरण, आर्थिक स्थिति इत्यादि भिन्न होने की वजह से होते हैं। अनुवाद-विज्ञानी यूजीन नाईडा ने अनुवाद की दृष्टि से संस्कृति को ५ भागों में वर्गीकृत किया है। ये हैं: 1. पारिस्थतिक संस्कृति, 2. भौतिक संस्कृति, 3.सामाजिक संस्कृति, 4.धार्मिक संस्कृति, और 5.। भाषिक संस्कृति। किसी भी अनुवादक के लिए यह आवश्यक है की वह मूल संस्कृति के इन तत्वों तथा इतिहास इत्यादि से भली-भाँति परिचित हो, वर्ना अनुवाद में हमेशा कहीं ना कहीं ग़लतफ़हमी होने का डर रहता है। सबसे पहले मैं नाईडा के वर्गीकरण को आधार बना कर एक-एक उदहारण पारिस्थितिक, भौतिक, सामाजिक तथा धार्मिक संस्कृतियों से दूँगा। भाषिक संस्कृति पर विस्तार से कुछ कहूँगा।

पारिस्थतिक संस्कृति: Ein sonniger Tag heute! (A sunny day today!) इस एक वाक्य का हिंदी में अनुवाद करने के लिए जर्मनी तथा भारत की जलवायु में विषमता को दृष्टिगत रखना होता। यूरोप में लोग धूप के लिए तरसते हैं तो भारत में बादल को और बरखा को! जर्मनी तथा भारत में अलग-अलग बोले जाने पर इस वाक्य के अर्थ भी अलग-अलग होंगे, एक सकारात्मक और एक नकारात्मक। मूल भाषा जर्मन से अनुवाद करते हुए भारतीय अनुवादक को जर्मनी के ठन्डे मौसम को मद्दे नज़र रखते हुए इसका अर्थ उसी दृष्टि से निकालना है, जैसे कि एक जर्मन पाठक निकालेगा, अर्थात “कितनी प्यारी धूप खिली हुई है!”। हाँ, अगर कथानक में पृष्ठभूमि काश्मीर अथवा हिमाचल जैसे पर्वतीय स्थलों की है तो फिर शब्दशः अनुवाद किया जा सकता है।

भौतिक संस्कृति के लिए मैं क्रिस्टीने फिशर के उपन्यास “Die lange Zeit“ से एक वाक्य लूँगा: „Im RTL Plus ‘Reich und schön’”। यहाँ अनुवादक के लिए जर्मनी की भौतिक संस्कृति का ज्ञान अत्यावश्यक है, वर्ना अनुवाद एक भारी समस्या बन सकती है। पहले तो उसके लिए यह जानना आवश्यक है कि “RTL Plus” एक जर्मन टीवी चैनल है। “Reich und schön”एक सीरियल का नाम है, जिसका शाब्दिक अनुवाद होगा “संपन्न एवं सुन्दर”। वास्तव में यह एक अमरीकी सीरियल है, जिसे डब करके जर्मनी में “Reich und schön” के नाम से दिखाया गया था। अनुवादक को मालूम होना चाहिए कि यह वास्तव में वही “Bold and beautiful” है, जिसका जर्मन नाम कुछ और है, जो भारत में भी स्टार टीवी पर “Bold and beautiful” के नाम से दिखाया जा चुका, और फिर इसका अनुवाद अँगरेज़ी में ही किया जा सकता है, क्योंकि अँगरेज़ी सीरियल देखने वाले भारतीय दर्शक इसके “Bold and beautiful” नाम से परिचित हैं।

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  अमृत मेहता

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