यह तो तय है कि
यदि हिंदी को राजभाषा के सिंहासन पर स्थायी रूप से आरूढ़ देखे जाने की राष्ट्रीय इच्छा है तो, जो अब तक संभव नहीं हो सका है, उसे संभव करना होगा अर्थात इसे देश के हर भाग में एक सर्वप्रिय भाषा बनाया जाना होगा। विभिन्न प्रांतों में एकाधिक प्रांतीय भाषाएं जनमानस में अति प्राचीन काल से गहरी पैठ बनाए हुए हैं और उनसे उनका आत्मिक रिश्ता बना हुआ है। उनसे संबंधित प्रांतों की सांस्कृतिक विरासत मुखर होती है। ऐसे में एक सवाल उठना लाज़मी है कि क्या वहां की सांस्कृतिक विरासत हिंदी से मुखर हो सकती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि इससे उनकी भावनाएं आहत हो रही हैं! वैसे इस बात पर चर्चा की जा चुकी है और ज़्यादातर विद्वानों का मत है कि हिंदी की स्वीकार्यता-दर विशेषतया हिंदीतर क्षेत्रों में हिंदीभाषी क्षेत्रों से किसी भी मायने में कम नहीं है। अगर आप दक्षिण के कुछ हिस्सों अर्थात हैदराबाद, सिंकदराबाद, पांडिचेरी, कन्याकुमारी आदि में जाएं तो आप यह पाएंगे कि वहाँ हिंदी को पर्याप्त सम्मान दिया जा रहा है। वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर हिंदी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। वास्तव में, ज़्यादातर प्रांतीय भाषाओं में हिंदी एक कड़ी की तरह काम करती है।
यों तो आज़ादी के कोई तीन दशकों बाद तक दक्षिण भारतीयों में हिंदी के प्रति अरुचि रही है और इसके कई वज़ह रही हैं। इनके मनोवैज्ञानिक तह तक जाते हुए मैं कुछ वज़हों पर नज़र डाल रहा हूँ।
ग़ौरतलब है कि काफी लंबे समय से मुख्य हिंदीभाषी क्षेत्रों के नागरिक प्रायः दक्षिण भारत से कटे-कटे रहे हैं। यद्यपि उन्हें कभी रोज़ी-रोटी की फ़िराक़ में भी दक्षिण जाने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि उनके लिए उत्तर भारत ने रोज़ग़ार के जखीरे खोल रखे हैं तथापि उन्होंने दक्षिण भारत में अपनी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। जब हमने विशेषतया सात-आठ दशकों से वहाँ आना-जाना शुरू किया तो देखिए, तो कितनी आसानी से दक्षिण भारतीयों के गिले-शिकवे मिट गए! आप उत्तर भारत के हिंदीभाषी नागरिक के रूप में दक्षिण भारत में जाएं तो लोग आपकी भाषाई, सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को बड़ा सम्मान देते हैं। मैसूर जैसे शहर में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में स्तुत्य कार्य किया जा रहा है। हैदराबाद में भी यही आलम है। हिंदी की गंध तो केरल तक में सर्वत्र मिलती है। दक्षिण मूल के कई हिंदी विद्वान उल्लेखनीय हिंदी-सेवा कर रहे हैं। हाँ, वे हमारे अन्य पक्षों की नुक्ताचीनी करते अवश्य सुने जाते हैं।
यह सब चमत्कार कोई आधी सदी की संक्षिप्त अवधि में ही हुआ है। अर्थात आज़ादी के बाद। अब तो वहाँ हमारे उत्तर भारत के इंजीनियर, डाक्टर, वैज्ञानिक, प्रोफ़ेसर आदि बहुतायत में जाकर बसने लगे हैं और वहाँ से भी ऐसी प्रतिभाओं का उत्तर भारत में आगमन हो रहा है--न केवल रोज़ी रोटी और बेहतर जीवन की तलाश में अपितु राष्ट्रीयता की भावना से राष्ट्र-निर्माण में अपना अमूल्य योगदान करने के लिए। इन देशवासियों के परस्पर भौतिक सामीप्य और सामंजस्य ने इन क्षेत्रों में राष्ट्रीयता का संचार किया है। हमारी सांस्कृतिक विरासत पर शुद्ध भारतीयता का मुलम्मा चढ़ाया है। हम एक-दूसरे की जुबान में शौक से बोलना चाहते हैं ताकि आपसी समझ में अभिवृद्धि हो और भ्रातृत्व एवं प्रेम बढ़े। किसी संस्थागत शिक्षण-प्रशिक्षण के बिना हम तमिल और कन्नड़ सीख रहे हैं और वे हिंदी। दिल्ली के दक्षिण भारतीयों को हिंदी माध्यम से वाकपटुता में जो महारत हासिल है, उसे सुनकर तो बेहद ताज़्ज़ुब होने लगता है। यह सब साबित करता है कि वहाँ बेशक! किसी भाषाई वज़ह से ऐसा हो रहा है जिसमें पारस्परिक वैमनष्यता लेशमात्र भी नहीं है।
इन दोनों क्षेत्रों के बीच जो कटुता पैदा हो रही है, उसका कारण मुख्य रूप से राजनीतिक है। या तो राज्यीय सीमाओं का विवाद है या नदी-जल के बँटवारे का ज्वलंत प्रश्न या कोई अन्य मुद्दा जिनका समाधान राजनीतिक लाभ पाने के लिए नहीं किया जाता। इन समस्याओं को आश्वासनों का आक्सीजन देकर जिलाए रखने की कोशिश की जाती है ताकि समय आने पर जनता को राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ बरगलाया जा सके और राजनेताओं द्वारा वोटबैंक को पुख़्ता बनाया जा सके।
वहाँ आंग्लसत्ता के दौरान अंग्रेज़ी का कुछ सौ सालों से बोल-बाला होने के कारण भी हिंदी को आज़ादी के दिन तक स्वीकार्यता नहीं मिल पाई थी। अंग्रेज़ी माध्यम से वे उत्तर भारत के आगंतुकों के साथ भी संवाद-संपर्क स्थापित कर लेते थे। लेकिन, जब संविधान द्वारा हिंदी को राजभाषा के रूप में क्रियान्वित करने की कोशिश की गई तो यह बात उन्हें बिल्कुल अलपटप-सी लगी क्योंकि अंग्रेज़ी माध्यम से वे अपने सारे कार्यालयीन कार्य करने में समर्थ थे। किंतु आज़ादी के बाद आए संक्रमणशील दौर के कारण जब उन्होंने आसानी से हिंदी सीख ली तो उन्हें अंग्रेज़ी को छोड़ने में कोई शिकायत नहीं रही। कुछेक दृष्टांतों में यदि वे अंग्रेज़ी छोड़ नहीं सके तो उन्होंने हिंदी को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं की। इसके बाद भाषाई विरोध के दौर का धीरे-धीरे पटाक्षेप होता गया। आज लोग वहाँ भाषाई सौहार्द के मैत्रीपूर्ण वातावरण में जी रहे हैं।
देश में अधिकतर राज्यों का विभाजन भाषाई आधार पर हुआ है और इसे सभी ने अर्थात केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के साथ-साथ जनता ने भी मूक स्वीकृति दी है। आज तक किसी भी स्तर पर यह चर्चा नहीं हुई है कि ऐसा क्यों किया गया है यानी भाषा को आधार बनाकर राज्यों को क्यों विभाजित किया गया है; किसी और आधार पर भी तो राज्यों को बाँटा जा सकता था। इसके चलते दक्षिण के राज्यों में सरकारी कामकाज प्राथमिक तौर पर अंग्रेज़ी में होता है। कभी-कभी वहाँ के स्थानीय प्रशासनों में राज्यीय भाषाओं का प्रयोग होता है। चूँकि हमारी नीति प्रांतीय और क्षेत्रीय भाषाओं को भी उतना ही प्रोत्साहन देना है जितना कि हिंदी को, इसलिए हम वहाँ हिंदी को बढ़ावा देने की नीति को जारी रखते हुए उनकी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ इसके साथ तालमेल बैठाने पर बल दे सकते हैं। वास्तव में, लोकसंस्कृति को लोकभाषा में, क्षेत्रीय संस्कृति को क्षेत्रीय भाषा में और प्रांतीय संस्कृति को प्रांतीय भाषा में मुखर किया जा सकता है। इस महत्त्वपूर्ण कार्य में हिंदी को एक कड़ी के रूप में तैनात किया जाना चाहिए।
राज्यों की बहुभाषिता के कारण भाषाई खाइयों को पाटने के लिए हिंदी विद्वानों ने सदैव उदार दृष्टिकोण अपनाया। हिंदी-प्रेमियों का यह गुण श्लाघ्य है। पंडित रामविलास शर्मा तो राजभाषा के रूप में चार भाषाओं को लाने की वकालत करते हैं। उनके ही शब्दों में:
राजभाषा में एक दक्षिण की भाषा, एक उत्तर की भाषा, एक-एक पूर्व और पश्चिम की भाषा। इन सबको समान रूप से राजकाज की भाषा बनाया जा सकता है। हिंदी बोलने और समझने वालों की संख्या अन्य भाषाभाषियों से बहुत ज़्यादा है। इसलिए उत्तर से यह भाषा ले सकते हैं। दक्षिण में तमिल साहित्य सबसे प्राचीन है और समृद्ध भी है। दक्षिण से उसे ले सकते हैं। पश्चिम में मराठी, अंग्रेज़ी राज से पहले महाराष्ट्र की राजभाषा रह चुकी है। पश्चिम से उसे ले सकते हैं और पूर्व से इसी तरह बांग्ला भाषा ले सकते हैं। चार भाषाएं समान रूप से सरकारी कामकाज में इस्तेमाल की जाएं तो किसी को यह शिकायत न हो कि हिंदी के राजभाषा बनने से हिंदी वालों को विशेष लाभ होगा और दूसरे पीछे रह जाएंगे।
यहाँ हिंदी-प्रेमियों और हिंदी-विद्वानों के उस लिजलिजे मनोविज्ञान की ओर ध्यान आकृष्ट करना उचित होगा जिसे शिष्ट शब्दों में भाषागत विनम्रता तो कह सकते हैं; किंतु, इसे हिंदी के लिए अच्छा कभी नहीं मान सकते हैं। उनकी भाषागत विनम्रता की मानवीय दृष्टि से भले ही प्रशंसा की जाए, यह राजभाषा के लिए कभी सेहतमंद साबित नहीं हुई है। संविधान-निर्माण के समय से ही राजभाषा की दीर्घजीविता और सुस्वास्थ्य के लिए एक सख़्त नीति अपनाई जा सकती थी; लेकिन, वैसा नहीं किया गया। संभवतः हिंदी-प्रेमियों का यह भाषागत लचीलापन संविधान-निर्माताओं की आत्मा में भी अंतरित हो गई थी। तभी तो अंग्रेज़ी को बार-बार सह-राजभाषा के रूप में अध्यादेशित किया गया। इस बात का एहसास सभी हिंदी-विद्वानों को रहा है। किंतु, उनमें भाषागत आंदोलन चलाने की दमखम का पूर्ण अभाव रहा है। संभवतः अपनी इसी कमजोरी के कारण वे अपने आंग्ल शासकों का स्तुति-गान भी करते रहे हैं। हिंदी के भारतेंदु युग में महारानी विक्टोरिया, लार्ड रिपन, लार्ड मैयो, प्रिंस आफ़ वेल्स आदि की खुलकर प्रशंसा की गई थी। खुद भारतेंदु हरिशचंद्र भारतीय शिक्षा पर अंग्रेज़ी के नियंत्रण की तहेदिल से प्रशंसा करते हैं। यह सब आख़िर क्या था? शायद हमारी भाषाई हताशा थी। हमारी हीनभावना थी। क्योंकि हम सदियों से अंग्रेज़ी के प्रति नतमस्तक रहे थे और हिंदी पर अंग्रेज़ी के वर्चस्व को स्वीकार करते थे।
दक्षिण भारतीयों ने उत्तर भारतीयों के अंग्रेज़ी के प्रति इस आकर्षण को ग़ुलामी के दौर में ही भाँप लिया था। ऐसे में उनका झुकाव भी अंग्रेज़ी की ओर होना स्वाभाविक था। अन्यथा, वे हिंदी को समय रहते अपनी प्रांतीय भाषा के साथ व्यवहार में लाने लगे होते और इस तरह देश की विभिन्न प्रांतीय भाषाओं के बीच हिंदी संपर्कभाषा की भूमिका भलीभाँति निभा रही होती! किंतु, उनके मनोविज्ञान में अज़ीबोग़रीब बदलाव आया। वे यह समझने लगे कि चूँकि स्वयं उत्तर भारत के लोग अंग्रेज़ी को अपना रहे हैं, इसलिए हिंदी एक अशक्त-सी भाषा है जिसे वे अपने साथ लंबे समय तक नहीं रख सकते हैं; इससे उनका भविष्य अंधकारपूर्ण हो जाएगा। प्रकारांतर से, वे अंग्रेज़ी पर ज़्यादा निर्भर रह सकते हैं और इस पर भरोसा करना उनकी एक मनोवैज्ञानिक दुर्बलता बन गई। इस संबंध में, यह बेबाक टिप्पणी की जा सकती है कि दक्षिण भारतीयों द्वारा काफी लंबे समय तक हिंदी को दरकिनार करने से संबंधित मनोविज्ञान को अनुकूल हवा देने में खुद हिंदीभाषियों ने अहम भूमिका निभाई है।
ख़ैर, सह-अस्तित्त्व के हमारे काल-परीक्षित प्राचीन आदर्श के अनुसरण में हिंदी को प्रांतीय भाषाओं के साथ रहना सीखना होगा। उसे विभिन्न राज्यों के बहुभाषी नागरिकों की सभी आमचर्या में अपनी अभिव्यक्तियों को न केवल लोकप्रिय बनाना होगा अपितु उनकी जुबान पर स्वाभाविक रूप से कुछ इस तरह विराजमान होना होगा कि उनकी भाषाओं को कोई क्षति पहुँचने के बजाए उन्हें अपने पास इसकी उपस्थिति से फ़ायदा पहुँचे। उनमें सुरक्षा की भावना का विकास हो। इसके अपने भविष्य के लिए भी यह आवश्यक है। यह न केवल प्रांतीय भाषाओं में अपनी पैठ बनाए बल्कि प्रांतीय भाषाओं की सुगंध को खुद में समोने की कोशिश करे। यह कोशिश अवश्य सफल होगी क्योंकि भाषाई संदर्भ में हम सभी अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी भलीभाँति समझने लगे हैं।
डॉ. मनोज श्रीवास्तव
नई पंचवटी, जी.टी.रोड,
गाजियाबाद, उ.प्र.--201001,
मो. नं.09910360249
drmanojs5@gmail.com


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