कहाँ जाना चाह रहे हैं हम?
यह एक ऐसा सवाल है जो हर व्यक्ति अपने से पूछता है किन्तु उसका जवाब स्वयं को ही नहीं देना चाहता है। सवाल उसका स्वयं अपने आपसे है और वो भी बिना किसी दूसरे व्यक्ति के दवाब के, इसके बाद भी व्यक्ति इस सवाल का उत्तर देने में ख़ुद को असहज महसूस करता है।
यदि इसके प्ररिप्रेक्ष्य में बात की जाये तो हमें ज्ञात होता है कि व्यक्ति ने स्वयं को संज्ञाशून्य-सा बना लिया है और इसी कारण से उसे स्वयं अपने अलावा और किसी दूसरी स्थिति का भान नहीं होता है। ऐसा नहीं है कि समाज में रहने वाले व्यक्ति के सामने से स्थितियों का गुज़रना होता नहीं है किन्तु वह जानबूझ कर उन स्थितियों की ओर देखना ही नहीं चाहता है। इस प्रकार की मानसिकता को संज्ञाशून्यता की स्थिति के अलावा और क्या कहेंगे?
यह भी संभव है कि वर्तमान में स्वयं को बुद्धिजीवी कहलाने का दंभ भरने वाला इंसान, जिसे हम बुद्धिभोगी के नाम से पुकारते हैं क्योंकि बुद्धि तो जानवरों के पास भी होती है, इस बात को मानने से इंकार कर दे कि वह संज्ञाशून्य नहीं है। यहाँ किसी तर्क के द्वारा अथवा किसी वैज्ञानिक उपायों के द्वारा यह कदापि सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया जाना है कि इंसान संज्ञाशून्य है अथवा नहीं। हम अपने क्रियाकलापों को स्वयं देखें और पहचाने तथा इसके बाद आकलन करें कि हम संज्ञाशून्य हैं अथवा नहीं।
हमारे देश में इस समय सभी राजनैतिक दलों और उनके नेताओं के द्वारा भ्रष्टाचार से लड़ने का प्रयास करते दिख रहा है। ऐसा होते सिर्फ़ दिख ही रहा है और असल में कहीं कुछ भी होते दिखा नहीं है। इसके अलावा कुछ और दूसरे प्रकार के समाजसेवी हैं जो किसी न किसी रूप में स्वयं को सुर्खियों में बनाये रखना पसंद करते हैं। ऐसे लोगों द्वारा देश के लुप्तप्राय होते जानवर को बचाने की मुहिम बड़े ही ज़ोर-शोर से चलायी जा रही है। ऐसे तमाम सारे कार्यक्रमों के बीच हम उन तमाम ज़रूरी मुद्दों से अपने आपको दूर कर बैठते हैं जो वाकई में समाज के लिए आवश्यक हैं या कहें कि अनिवार्यता की श्रेणी में आते हैं।
देश में भ्रष्टाचार का जो मुद्दा आज उठाया जा रहा है उसकी आड़ में क़ानून व्यवस्था को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी गई है। आये दिन हमारे आसपास ही छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार की घटनाएँ घटित होती आ रही हैं और हम हैं कि इन घटनाओं को मात्र एक समाचार की तरह देख-सुन कर दूसरी ओर मुँह फेर लेते हैं। गैंग रेप की घटनाओं में इस तरह से बढ़ोत्तरी हो रही है मानो देश के विकास हेतु यह भी एक आवश्यक कदम हो। बलात्कार की घटनाओं के अलावा दिनदहाड़े लूटपाट की घटनाएँ, खुलेआम घरों में घुसकर चोरी-डकैती-हत्या करने जैसे जघन्य अपराधों का होना आदि वे अपराध हैं जिनको जनहित में रोका जाना चाहिए। सरकार-शासन-प्रशासन तो इस ओर से आँखें मूँद कर बैठे हैं और हम नागरिक हैं कि ख़ुद को संज्ञाशून्य करके देश का ज़िम्मेदार नागरिक मान रहे हैं।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि देश में, समाज में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने का कार्य सरकार का, शासन-प्रशासन का होता है किन्तु एक नागरिक होने के नाते हमारे भी कुछ दायित्व बनते हैं। हम एक नागरिक के रूप में भले ही समग्र समाज के लिए अपनी सेवाओं को न दे सकें किन्तु एक पारिपारिक व्यक्ति होने के नाते कम से कम अपने परिवार के बीच तो अपनी ज़िम्मेवारी को निभा सकते हैं। देखने में यह आ रहा है कि वर्तमान की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में एक इंसान स्वयं को पारिवारिक ज़िम्मेवारियों से भी मुक्त मान ले रहा है। वह अपनी पारिवारिक ज़िम्मेवारियों में धन कमाना, घर के सदस्यों के लिए राशन की व्यवस्था करना, सदस्यों के लिए सुख-सुविधाओं की, भोजन आदि की व्यवस्था करना ही मान रहा है। इन कार्यों के बीच उसके पास परविार के सदस्यों के लिए समय ही नहीं है।
इस तरह की बनती असामाजिकता के कारण ही तमाम सारे उपद्रवी तत्व हमारे बीच ही अपराध करके स्वयं को निर्द्वन्द्व बनाये घूमते हैं। हमारे स्वयं के प्रति केन्द्रीय भाव रखने की मानसिकता के कारण हम अपने अलावा किसी और के प्रति, समाज के प्रति सकारात्मक धारणा को विकसित नहीं कर पाते हैं। यही धारणा हमारे संज्ञाशून्य होने का निर्धारण करती है तथा इसी से असामाजिक समाज की अवधारणा का विकास होता है। अच्छा हो कि हम आज बाघ बचाने जैसी मुहिम का हिस्सा बनने के साथ ही साथ समाज को बचाने की मुहिम का हिस्सा बनें क्योंकि यह तो तय है कि बाघ के बचाने के बाद भी हमें सामाजिकता के निर्वहन हेतु समाज की और इंसान की आवश्यकता पड़ेगी, विशेष रूप से सभ्य इंसान की, सभ्य समाज की। संज्ञाशून्यता से बाहर आकर हमें अपनी तन्द्रा को तोड़ना होगा और समाज के बेहतर निर्माण की दिशा में, बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में कार्य करना होगा।


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