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इनके आगे हम नतमस्तक हैं

प्रकाशन :गुरूवार, 1 अप्रेल 2010
श्री विश्वजीत सेन

दंतेवाड़ा की घटना कोई मामूली घटना नहीं,जो किसी रण/संघर्ष में आयी-गई घटित हुआ करती है। इस घटना ने बांगलादेश युद्ध के बाद पहली बार सम्पूर्ण राजनीतिक क्षितिज को एक रंग में रंग दिया है। क्या माकपा के बुद्वदेव भट्टाचार्य, क्या भाजपा के रविशंकर प्रसाद, सबों ने एक स्वर से माओवादियों के विरूद्ध मुहिम को आगे बढ़ाने के पक्ष में अपनी राय व्यक्त की है। जो आज भी माओवादियों की रणनीति को उचित ठहराने में लगे हैं, उनके लिए सोचने का वक़्त आ गया है कि सरकारी दमन के निकृष्टतम दौर में भी वे इस क़दर अलग-थलग हुए थे या नहीं। जो काम सरकारी एजेन्सियाँ नही कर सकी, वह काम उनके कामरेडों ने कर दिया।

जिनकी जानें गई, वे सभी मेहनतक़श परिवारों के बाल-बच्चे थे। वे उस सामाजिक पृष्ठभूमि से आए थे, जहाँ दो वक़्त की रोटी के महत्व की कल्पना नहीं की जा सकती। इसका अन्दाज़ा केवल पैसों से नहीं लगाया जा सकता, जीवन के स्थायी होने की गारंटी है वह ऐसी स्थिति में आप किसी से यह नहीं कह सकते, तुम फ़लां नौकरी मत करो, फ़लां नौकरी करो। उसकी भूख उसे जहाँ भी ले जाएगी, उसे जाना होगा। कथित रूप से जिनके हित की रक्षा करने के लिए माओवादियों ने बन्दूक उठाया है, ये उन्हीं के सगे संबंधी हैं।

इसीलिए हर उस देश की कम्युनिस्ट पार्टी, जहाँ क्रांति हुई, शासक वर्ग की सेना या अर्द्धसैनिक बल को अपने पक्ष में करने को अपना कर्त्तव्य समझती रही। केवल भारत के नक्सलपंथियों के एजेण्डे से हर हमेशा यह आइटम गायब रहा। 70 से दशक में जब चारू मजूमदार का दौर अपनी पराकाष्ठा पर था, तब पुलिस कांस्टेबलों को दुश्मन न.1 समझा जाता रहा। अगर वे इस नीति पर नहीं चले होते, तब शायद सिद्धार्थ शंकर राय के लिए इतना आसान न होता कि सम्पूर्ण पुलिस बल की ऊर्जा को नक्सलियों के ख़िलाफ़ मोड़ दें। नक्सलियों ने मानो जान-बूझकर शासक पार्टी द्वारा बिछाए गए फंदे में पैर डाल लिया। उसके बाद नर-संहार का जो दौर चला, वह अब इतिहास बन चुका है। उस दौर पर उपन्यास लिखे गए, फ़िल्में बनीं। हज़ारों नवयुवक घर से निकले और घर नहीं लौटे। वे अब कभी घर नहीं लौटेंगे। क्रांति देवी उन्हें लील गई।

इतने त्याग, इतनी शहादतें, इतने आँसू-इन सबों के पार अगर कोई सुनहली सुबह दिखाई पड़ती, तब हमें अफ़सोस न होता। लेकिन रात उतनी ही गहरी है, सुबह उतनी ही दूर है, मेहनतक़शों की स्थिति पहले से अधिक बदतर ही हुई है। नामित तौर पर पूर्व-सोवियत संघ ने समाजवाद शब्द से ही दामन छुड़ा लिया है। चीन वाले प्रयोग में दामन छुड़ाने के क्रम में हैं। इराक़ की छाती पर अमरिका बैठा है। उसके हटने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। सम्पूर्ण विश्व के मेहनतक़शों में अब इतनी कूवत नहीं रह गई है कि अमरिकी साम्राज्यवाद को उसकी औक़ात बता दे। और एक वह ज़माना याद कीजिए जब रुस में हस्तक्षेप नहीं के नारे के तहत यूरोप के तमाम बन्दरगाहों पर मजदूर वर्ग ने साम्राज्यवादियों के हथियार लदे जहाजों को बन्दरगाहों पर ही रह जाने को विवश कर दिया था। विश्व मजदूर आन्दोलन में कितनी गिरावट आ चुकी है, इस पर गौर कीजिए। बहरहाल, हमारे माओवादी भाई इसी पर खुश हैं कि सी.आर.पी.एफ के 76 जवान मारे गए, जो थके-मांदे अपने शिविर को लौट रहे थे। क्रांति की राह में एक अत्यावश्यक क़दम उठाया गया। जिस बात को वे नहीं समझ रहे हैं, वह यह कि सरकार को उन्होंने एक महत्वपूर्ण हथियार मुहैया करा दिया। चेहरे पर मैं माओवादी हूँ लिख कर तो कोई चलता नहीं है। अब सरकार के लिए किसी को भी परेशान करना अधिक आसान हो जाएगा (वैसे पहले से ही उनकी कार्यशैली दक्षिणपंथियों को ही सहायता पहुँचाती आई है) और उस आदमी के पक्ष में बोलनेवाला कोई न होगा। चूँकि पक्षधर के मन में भी यह भय बना रहेगा कि कहीं उस पर भी माओवादी होने का ठप्पा न लग जाए। किसी भी जनवादी आन्दोलन को माओवादी बताकर हाशिए पर डाल दिया जाएगा। वे लाख तर्कसंगत बात करें, उनकी एक न सुनी जाएगी। 70 के दशक में प. बंगाल के माँ-बाप तक ख़ुद को बचाने के लिए बेटों को पुलिस के हवाले कर देते थे। वे भली-भांति जानते थे कि पुलिस उनके बेटों के साथ क्या करेगी, लेकिन वे मजबूर थे। आतंक जिसे कहते हैं, वह चीज ही कुछ ऐसी होती है।

6 अप्रैल के माओवादी हमले के बाद शोध का बाज़ार गर्म है। सी.आर.पी.एफ के जवानों की लापरवाही कहाँ तक उनके मारे जाने के लिए ज़िम्मेदार है, कहाँ तक ख़ुफ़िया विभाग ज़िम्मेदार है, पुलिस की जबाबदेही कहाँ तक जाती है आदि। लेकिन एक बात कोई नहीं कहता है कि कुछ जबाबदेही हमारी भी बनती है। हमने इस विष-वृक्ष को फलने-फूलने का मौक़ा दिया। समाज में, संगठनों में, इनकी उपस्थिति को हमने देखी-अनदेखी कर दी। कभी इनका पुरजोर विरोध नहीं किया। आज भी, मानवाधिकार संगठनों में, एन.जी.ओ समूहों में माओवादी खुले तौर पर काम कर रहे हैं। उन्हें चुनौती देनेवाला कोई नहीं है। राजनीतिज्ञ, चुनावों में इनसे मदद ले रहे हैं, शायद आगे भी मदद लेने में सकुचाएँगे नहीं। एक रट जो वे लगाते रहे हैं और आगे भी लगाते रहेंगे, इस प्रकार है- इस समस्या का समाधान बल प्रयोग के जरिए नहीं निकल सकता है। बल प्रयोग अच्छी बात नहीं है, इसे कौन नहीं जानता बल प्रयोग से हमारे सामाजिक मूल्यों का अंग-भंग होता है, हम अपनी नज़रों में गिर जाते हैं। लेकिन जो लोग आराम कुर्सी पर बैठे-बैठे इस क़दर रट लगा रहे हैं, वह क्यों नहीं आगे बढ़कर जनता को एकजुट करते हैं, ताकि माओवादी हिंसा पर रोक लगाई जा सके कुछ जबाबदेही तो उनकी भी निश्चित ही बनती है। और माओवादियों के विरूद्ध बल प्रयोग न भी हो, तो उन माँगों का आप क्या करेंगे, जो अचानक सुनी हो गईं उन बच्चों का आप क्या करेंगे, जिन्होंने हठात् यह पाया कि उनके सर पर से पिता का साया हट गया, उन घरों का आप क्या करेंगे, जिन्हें सहेजनेवाला अब कोई नहीं रहा। और यह सब कुछ हुआ एक बांझ राजनीति के कारण जिसे माओवाद के नाम से जाना जाता है। इस वाद को ख़ुद माओ के मुल्क़ ने ठुकरा दिया है।

उत्तर प्रदेश का दलितपुर गाँव। सी.आर.पी.एफ के शहीद जवान रंजीत यादव। उनकी लाश के पास बिलखती एक महिला की तस्वीर अख़बारों में आई है। मेहनतक़श परिवार की महिलाएँ कब से इस प्रकार बिलख रही हैं स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से या उसके भी पहले से 1857 से या उसके भी पहले से कहीं कोई लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है। लेखा-जोखा ढूँढ़ने का प्रयास भी व्यर्थ ही माना जाएगा। इतनी लम्बी है, इतनी मर्मभेदी है उनकी रूलाई, उनकी कलप।

इनके आगे हम नतमस्तक हैं।


 विश्वजीत सेन
दिवंगत डॉ.ए.के.सेन का निवास
रामकृष्ण एवेन्यु, पटना-80004
ई-मेल- wolvorine1802@gmail.com

  श्री विश्वजीत सेन

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