पप्पू : वेबसाईट क्या भाव लगाया ?
दुकान 1 : 10000 में एक।
पप्पू : पागल समझा है क्या ?
दुकान 2 : 8000 में एक।
पप्पू : हुँह।
दुकान 3 : 8000 में पाँच ले जाऔ साहब।
पप्पू : 6000 लगा यार वो पहले वाला तो दे रहा है।
दुकान 3 : 7000 से कम नही पडेगा।
पप्पू : चल दे दे गिफ़्ट पैक में लपेटकर।
पप्पू ने गर्लफ्रेन्ड को गिफ़्ट थमाया जन्मदिन का गर्लफ्रेन्ड ने बडे चाव से गिफ़्ट खोला और पप्पू से पूछा “कितने में लिया?”
पप्पू : छोड़ो भी।
गर्लफ्रेन्ड : बताओ न मेरे स्मार्ट जानू।
स्मार्ट जानू सुन कर पप्पू फुला नहीं समाया।
पप्पू ने गर्व से बताया : 7000 मे पाँच वेबसाइट खरीदा है दुकान नं 3 से। वो दुकान नं 1 तो 10000 मे एक वेबसाइट दे रहा था।
गर्लफ्रेन्ड : एक बार मुझे पूछ तो लिया होता पप्पूऽऽऽऽऽऽऽऽऽ मुझे विंडोज 2008 का चाहिए था ये वाला तो विंडोज 2000 का है तुमने 3000 के चक्कर में 7000 डुबा दिये।
गर्लफ्रेन्ड : ओ पप्पू तुम कब पास होगे?
अगर आप पप्पू नही बनना चाहते हैं तो स्क्राल करें
पहले जानें कि वेबसाइट है क्या?
इंटरनेट ने दुनिया को एक छोटे से गाँव/शहर मे तब्दील कर दिया है। इंटरनेट पर विभिन्न व्यक्तियों, सरकारों, कम्पनियों और संस्थाओं की दुकान या कार्यालय या शोरूम ही वेबसाइट कहलाती है। यही वेबसाइट इंटरनेट रूपी ग्लोबल शहर में आपके विचारों का स्पष्ट दर्पण है, जहाँ आपको जाने बगैर केवल आपकी विशेषता या विचारों के कारण पूरी दुनिया से ग्राहक आपके पास आ सकते हैं। जो आपको मौका देता है विस्तार करने का, उन्नति करने का। हर प्रकार के दुकान या शोरूम की जरुरत अलग होती है किसी का काम 1000 मे हो जाता है और किसी को 1 लाख भी कम पड़ता है।
अरे जब मुफ्त में सब कुछ मिल रहा है तो पैसे क्यों खर्चें। अपनी वेबसाइट क्यों बनाएं जब ढेर सारे मुफ्त के जुगाड़ उपलब्ध है, अरे भाई ब्लॉग बना लेंगे = क्या ठेले वाला शोरुम ????
जब वास्तविक दुनिया में इस दुकान या कार्यालय या शोरूम पर जो मासिक खर्च करते है प्रचार प्रसार पर खर्च करते हैं, उसकी तुलना कीजिए वेबसाइट चलाने के वार्षिक खर्च से और उसके प्रचार प्रसार से।
सीधी बात यही है कि कोई भी इस प्रकार तुलनात्मक पारदर्शी भावना से नहीं सोचता। आप और आपका परिवार जितना खर्च मोबाइल और टेलिफोन पर हर माह करता है लगभग उतना ही मासिक खर्चा एक अच्छे वेबसाइट का भी है। तब इस सुअवसर के लिए तुच्छ बजट व सोच क्यों? छोटा सा उदाहरण- डॉमिनोज़, पिज्ज़ा हट जैसे कई रेस्टारेंट पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी हैं पर भारत का कोई रेस्टारेंट शायद ही विदेशों में मिले।
लेकिन भैया, अपना सर्वर अपना होता है, चाहे ब्लॉगस्पॉट हो या वर्डप्रेस डाट काम, सभी में लिमिटेशन्स तो हैं ही न। इसलिये यदि आप सक्षम है तो अपनी साइट जरुर बनाइये।
- अपनी साइट आपको एक अलग पहचान देती है।
- आपको अपने साइट के संचालन का पूरा पूरा अधिकार होता है।
- तकनीकी ज्ञान बढता है, जिसका आप व्यवसायिक प्रयोग भी कर सकते है।
सॉफ्टवेयर/वेबसाइट सेवा प्रदाता आपके व्यापार या विचार को नए आयाम तक पहुँचाने में, उसे विस्तार प्रदान करने में सहायक होता है एक पार्टनर की तरह। पर बदले में उसे उचित सम्मान एवं पारिश्रमिक मिलना चाहिए। उससे ज्यादा वह कुछ नहीं चाहता। सॉफ्टवेयर डेवलपर या वेबसाइट डेवलपर भी एक डॉक्टर/एंजिनीअर/आर्किटेक्ट ही है या उससे कहीं अधिक सहायक है।
आज से केवल 9 साल पहले वेब सेवा प्रदाता कंपनीयाँ केवल वही दावा करती थी जो वे प्रदान करती थी। सीधे साधे वाक्य जो सेवा की गुणवत्ता बयान कर देते थे। मतलब सबसे पारदर्शी और साफ-सुथरी सेवा प्रणाली उचित दामों पर। सबसे अच्छा पारदर्शी व्यापार।
मेरी बात पर शंका करने वाले खुद विभिन्न वेब सेवा प्रदाताओं की सेवा जाँच लें। कुछ पुराने सेवा प्रदाता आज भी वाजिब शुल्क पर सेवा प्रदान कर रही हैं। मै दावा करता हूँ कि जितनी शिकायतें मोबाइल उपभोक्ताओं को हैं उसी समानुपात में वेब सेवा प्राप्तकर्ताओं को नहीं है।
यदि आज कुछ सेवा प्रदाताओं की हरकतें अगर गलत हैं तो उसके लिए जिम्मेदार केवल मुफ्तखोर और सस्ते के पीछे पगलाए लोग ही हैं। जो सिर्फ लेना जानते हैं बदले में धन्यवाद भी नहीं बोलते। कोई भी चिढ़ जाएगा।
अब तो कुछ मिडिया वाले, समाचार पत्र या अपने आप को वेबपोर्टल कहने वाले; जिनकी खुद की साइट इन निःशुल्क वेब एप्लिकेशन पर आधारित होती हैं या फिर कॉलेज के छात्रों से लगभग निःशुल्क में बनवाया जाता है। जिनकी सुरक्षा और निजता हमेशा दाँव पर लगी रहती है(साइट हैक होते रहती है या तकनीकी रूप से रूक जाती है)। जिनकी शक्ति हैं कुछ बड़े डिग्रीधारी फारेन रिटर्रन विशेषज्ञ जिनका वास्तविकता और आवश्यकता से कोई लेनादेना नहीं; वो सस्ते में वेब सेवा का ऑफर दे रहे हैं। हँसी आती है।
यह बात 16 आने सच है कि सस्ता रोए बार-बार महंगा रोए एक बार। जरुरी नहीं है कि सभी कुछ आपको मुफ्त में मिल जाए। भारत देश का इतिहास साक्षात प्रमाण है कि बिना दिए कुछ भी नहीं मिलता है। ईश्वर भी बिना लिए कुछ नहीं देता है, उसे आपका विश्वास चाहिए।
क्या यह संभव है कि केवल 500 रू में साल भर आपको रिलायंस या टाटा या बीएसएनएल या अन्य कोई आपको श्रेष्ठ मोबाइल का सेट भी दे और असीमित बात करने की सुविधा, असीमित संदेश सुविधा तथा अन्य सुविधा प्रदान करे? आज आपको प्राप्त संचार सुविधा के लिए कितना बैकबोन इन्फ्रास्ट्रक्चर पर इन कम्पनियों ने खर्च किया हुआ है जरा सोचें। इस सच को जानते हुये भी ग्राहक असीमित वेबस्पेस तथा इ-मेल के लालच मे सस्ते पेकेज खरिदता है और छोटे शब्दो में लिखे हुए शर्तों को नजरअंदाज कर देता है।
अभी पिछले माह ही एक महान मीडिया हस्ती मुझसे टकराए। मैने अपना परिचय दिया तो उन्होंने फरमाइश सुना दी कि मुझे गूगल के नए सोशल साइट की तरह का पोर्टल चलाना है, क्या खर्च आएगा? तो मैने बेशर्मी से पूछ लिया कि आपका बजट क्या है? उन्होंने कहा कि 10000 से 15000 रू तक है। मैने कहा कि आप एक अच्छा सा साइट चला सकते हैं पर सोशल साइट इतने में नहीं चलेगा; तो उन्होंने कहा कि गूगल तो सब मुफ्त में करता है। मै तो आपको इतने पैसे दे रहा हूँ।
इन महाशय का शुक्रगुज़ार हूँ जिनके कारण मुझे यह लेख लिखना पड़ा।
जी हाँ हमारे देश के लगभग सभी पढ़े लिखे या बुद्धिजीवी यही समझते हैं कि डॉ. पानी का इंजेक्शन भी लगाए तो 500 रू दे दो बिना जानकारी लिए कि आपको हुआ क्या है। पर जब वेबसाइट बनवाने की बारी आती है तो 50 रू में 5 साल तक सुविधा चाहिए। जब चाहें तब वेब सेवा प्रदाता को बुलाकर या फोन करके फरमाइश सुना देते हैं।
इन्टरनेट की दुनिया में कितने ही तकनीक निःशुल्क या सस्ते में उपलब्ध हैं। क्योंकि दुनिया में बहुत से समझदार लोग हैं जिनमें सच्ची सहयोग और प्रोत्साहन भावना है जो अपनी इच्छा से अपनी हैसियत के हिसाब से धनराशि इसके लिए दान करते हैं। मै आप सभी मीडिया वालों, साहित्याकारों और ब्लॉगरों से पूछता हूँ, आपने लिनिक्स के किस समूह के समर्थन में या वेब एप्लिकेशन (Joomla, wordpress, blogspot) के किस समूह के समर्थन में बराबर लिखा या छापा है उनको बढ़ावा दिया है? आज तक मैने किसी भी अखबार चैनल या पत्रिका में नहीं देखा कि वो स्वेच्छा से इन तकनीकी कम्युनिटियों में से किसी एक का भी विज्ञापन निःशुल्क छाप दें और अपना समर्थन दें या उनके प्रयास को बढ़ावा देने के लिए कभी कोई धनराशि दान किया है।
यश ताम्रकार
yashtamrakar@yahoo.com


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