यह एक विरोधाभास है कि जिस इंटरनेट पर हम गंभीर पठन-पाठन का
विरोधी होने का तोहमत लगाते हैं, वही इंटरनेट आज हिंदी साहित्य के नये उत्थान में अपनी भूमिका निभा रहा है। इंटरनेट ने हिंदी साहित्य को आज चर्चा का व्यापक दायरा दिया है।
प्रिंटिंग प्रेस से निकलकर चंद गंभीर पाठकों और पुस्तकालय की अलमारियों तक सिमटकर रह जाने वाली किताबें या उनके अंश आज इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। एक तरफ़ कविता कोश जैसे वेब इंसाइक्लोपीडिया ने दुर्लभ कविताओं तक हर पाठक की पहुंच को संभव बना दिया है, दूसरी ओर ब्लॉग लेखन ने एक साहित्यिक माहौल का निर्माण करने में अहम भूमिका निभाई है। इंटरनेट पर बन और फ़ैल रहे साहित्य के संसार पर निगाह डालता यह आलेख।
ऐसे समय में जब बदलाव की आहट आपकी हर धड़कन में शामिल होती होती जा रही है, साहित्य का परंपरागत चेहरा भी बदलाव के रंगों से रंगता नजर आ रहा है। अकाल मृत्यु की तमाम घोषणाओं के बीच हिंदी साहित्य न सिर्फ़ चुपचाप नयी जमीन पर उग रहा है, बल्कि अपने पंख भी पसार रहा है। साहित्य अब किताबों-पत्रिकाओं के ठोस पन्नों के साथ इंटरनेट के व्यापक दायरे में समा चुका है।
लोग फ़ेसबुक के अपने वॉल पर फ़ैज के नज्मों को, सर्वेश्वर, शमशेर और मुक्तिबोध की कविताओं को शेयर कर रहे हैं, जी-मेल के स्टेटस मैसेज में किसी कविता के अंश को चस्पां कर रहे हैं। साहित्य को समर्पित ऐसे कई वेबसाइट, ब्लॉग ओद हैं जो दुनिया भर में खासे लोकप्रिय हो रहे हैं। इंटरनेट- कविता, कहानी, साहित्य केंद्रित बहसों के साथ ही साहित्यिक गॉसिपों के भी जीवंत माध्यम के रूप में उभरा है। आज कई साहित्यकार छपे हुए शब्दों के अलावा अपने ब्लॉगों के सहारे भी सक्रिय हैं।
कुमार अंबुज, उदय प्रकाश, गीत चतुर्वेदी, प्रभात रंजन जैसे साहित्यकार ब्लॉग के सहारे अपने पाठकों के साथ लगातार जुड़े हुए हैं। आज से दस वर्ष पहले तक साहित्यिक बहसों का मुख्य माध्यम लघु पत्रिकाएं हुआ करती थीं। अब वेबसाइटों और ब्लॉगों ने साहित्यिक पत्रिकाओं के साथ ही साहित्यिक स्पेस रचने में अपनी भूमिका निभानी शुरू कर दी है।
साहित्य का जनतांत्रीकण करने और इसे हर किसी के लिए सुलभ बनाने में जिन वेबसाइटों ने अपनी भूमिका निभायी है उनमें कविता कोश की भूमिका खास तौर से गौर करने लायक है। करीब पांच साल पहले शुरू किये गये इस वेब कविता इंसाइक्लोपीडिया ने कविता पढ़ने का पुराना तरीका ही बदल दिया है। करीब दो साल पहले जब मैं आलोक धन्वा के कविता संग्रह-दुनिया रोज बनती है को बेतरह खोज रहा था, तब कविता कोश के साथ मेरा उस तरह का याराना नहीं था।
बाद में एक दिन यूं ही कविता कोश पर संग्रह की सारी कविताएं मेरे सामने प्रकट हो गयीं। ब्रूनो की बेटी, भागी हुई लड़कियां, छत पर लड़कियां, गोली दागो पोस्टर जैसी कविताओं को कविता कोश पर देखकर कविता की दुनिया के बदल जाने का एहसास मुझे पहली बार हुआ था। कविता कोश ने कविता की दुनिया को आम लोगों के पास लाने का क्रांतिकारी काम किया है।
जुलाई 2006 में महज ढाई सौ कविताओं से शुरू हुए इस कोश में आज पैंतालीस हजार से ज्यादा पन्नों हैं। इस वेब इंसाइक्लोपीडिया पर आज हिंदी के अलावा अन्य देशी और विदेशी भाषाओं से अनुवाद की गयीं 42 हजार से ज्यादा कविताएं हैं। तकरीबन 1500 कवियों के पेज हैं। दिलचस्प यह है कि हिंदी कविताओं के इस वेब संकलन को तैयार करने का काम किसी साहित्यकार ने नहीं किया, न ही इसे साहित्य को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी निभाने वाली संस्था ने किया है।
कविताकोश की शुरुआत करने वाले ललित कुमार पेशे से आइटी प्रोफ़ेशनल हैं। विदेशों में रहे ललित ने कभी अपने शौक के कारण इंटरनेट पर बिखरी कविताओं को निजी साइट पर संकलित करना शुरू किया था। ललित कुमार बताते हैं, ‘मुझे कविताएं पढ़ने का काफ़ी शौक है। जब मैं इंटरनेट पर किसी कविता को खोजता था तब कई बार मुझे वे मिल भी जाती थीं, कई बार मुझे निराशा का सामना करना पड़ता था। कई बार ऐसा भी हुआ कि जो कविता मैं खोजकर थक चुका होता था, वे अचानक मेरे सामने हाजिर हो जाती थीं। तब मैंने नेट पर उपलब्ध कविताओं का संकलन करना शुरू किया।’
यह सब निजी शौक की तरह चलता रहा। इस तरह ललित के निजी प्रयासों से नेट पर उपलब्ध कविताओं को पहली बार एक छतरी के नीचे लाया गया। जब काफ़ी कविताएं इकट्ठा हो गयीं तब कहीं जाकर हिंदी कविताओं के व्यापक वेब संकलन को तैयार करने का विचार आया। चूंकि यह काम अकेले नहीं किया जा सकता था, इसलिए एक कविता कोश टीम तैयार की गयी। इस टीम में पूर्णिमा वर्मन, अनिल जनविजय, जयप्रकाश मानस, जगदीश व्योम जैसे साहित्य के प्रति रुझान रखने वाले लोग थे। यह टीम इस मायने में अनोखी थी कि इसमें कोई इंग्लैंड में था, कोई अमेरिका में तो कोई मॉस्को में। ललित कुमार ने खुद इस प्रोजेक्ट का तकनीकी पहलू संभाला।
अनिल जनविजय ने कोश में सबसे ज्यादा योगदान दिया है। इस तरह से कविता कोश हिंदी कविताओं का विकिपीडिया बन गया है। आर्थिक दृष्टि से अभी तक कविता कोश टीम ने किसी से किसी किस्म का सहयोग नहीं लिया है। लेकिन इस मुकाम से कविता कोश को आगे ले जाने के लिए धन की जरूरत को ललित कुमार महसूस करते हैं। यही कारण है कि अब कविता कोश को रजिस्टर्ड करने की योजना बनायी जा रही है। ललित कुमार का कहना है कि अगले चरण में उन कविताओं को भी शामिल किया जायेगा जो प्रिंट रूप में शायद ही कहीं मिलते हैं।
साहित्य को इंटरनेट पर उपलब्ध कराने का ऐसा ही गंभीर प्रयास वर्धा में स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की तरफ़ से किया जा रहा है। सांस्थानिक सहयोग मिलने के कारण काफ़ी कम समय में विश्वविद्यालय की साइट हिंदीसमय.कॉम पर आज कहानी, उपन्यास कविता, निबंध, आलोचना और पत्र जैसी विधाओं की सामग्री का अच्छा खासा संकलन तैयार हो गया है। इस साइट पर कई रचना संचयन भी मौजूद हैं।
केदारनाथ अग्रवाल के सभी कविता संग्रह, अज्ञेय रचना संचयन, कबीर ग्रंथावली, मोहन राकेश संचयन, हरिऔध समग्र, प्रेमचंद समग्र, भारतेंदु समग्र, रामचंद्र शुक्ल समग्र जैसे रचना संचयन यहां एक ही जगह मौजूद हैं। यहां विभाजन पर लिखी गयी चुनिंदा कहानियों को पढ़ना भी एक सुखद एहसास हो सकता है। पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित 1950 से लेकर 2010 की चर्चित कहानियों का दशकवार संकलन भी इस साइट पर मौजूद है। साथ ही साइट पर आप कई ई-पुस्तकों को भी पढ़ सकते हैं।
कविताकोश.ऑर्ग और हिंदीसमय.कॉम के अलावा कई साहित्य से जुड़े ब्लॉग और वेब साइट हिंदी साहित्य को आम पाठक तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। अगर आपको अच्छा लिखा पढ़ने का शौक है तो इंटरनेट पर बीसियों ऐसे ठिकाने हैं जो आपके लिए सुकून भरे आरामगाह साबित हो सकते हैं।
इस मामले में उदय प्रकाश और कुमार अंबुज जैसे लेखकों के ब्लॉग के साथ ही कबाड़खाना, सबद, पढ़ते-पढ़ते, वैतागवाड़ी, जानकीपुल, जनपक्ष, एक जिद्दी धुन, नया जमाना, सृजनगाथा और कारवां जैसे ब्लाग्स को अपने कंटेंट के मामले में काबिलेतारीफ़ कहा जा सकता है। इन ब्लॉग ठिकानों में एक बार घुस जाने के बाद समय के सारे बंधन आपके लिए टूट जा सकते हैं। कुछ अच्छा पढ़ने और अच्छा लिखने की ओदम जिजीविषा को निश्चित ही इंटरनेट ने नया रूप दे दिया है। क्या आप आज तक इस दुनिया से दूर हैं? देर मत कीजिये ऊपर दिये गये किसी भी लिंक को चटकाइये और साहित्य की इस नयी दुनिया में शामिल हो जाइये।


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