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ध्यप्रदेश में किसानों का आंदोलन जिस खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है, उससे राज्य सरकार का हड़बड़ाना तो स्वाभाविक है, देश के बाकी राज्यों को भी इससे एक सबक लेना चाहिए, और केन्द्र सरकार के साथ बैठकर किसानों और किसानी की दिक्कतों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। आज भी हिन्दुस्तान में आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती और उससे जुड़ी हुई गतिविधियों पर जिंदा है, और यह एक ऐसा तबका है जो कि देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाकर चल रहा है, वरना वह पीढ़ी तो अभी जिंदा है ही जिसने अमरीका से आए हुए पीएल-480 गेहूं की लाल-काली रोटियों को खाने की मशक्कत की थी। किसानों का मुद्दा नया नहीं है, यह मुद्दा बरसों से चले आ रहा है, और महाराष्ट्र, आन्ध्र, तेलंगाना जैसे कई राज्य हैं जिन्होंने हजारों की संख्या में किसानों की आत्महत्या दर्ज की है।

छत्तीसगढ़ भी किसानों की आत्महत्याएं देखते आया है, यह एक अलग बात है कि सरकार और पुलिस का नजरिया यह रहता है कि हर किसान आत्महत्या किसानी-आत्महत्या नहीं होती है। लेकिन हमारा यह मानना है कि आत्महत्या की नौबत तो बहुत बाद में जाकर आती है, और उसके पहले किसान का पूरा परिवार टूट जाता है, खानपान छूट जाता है, इलाज और पढ़ाई का खर्च उठाने की ताकत नहीं बचती है, और तब जाकर कोई खुदकुशी करता है।

लेकिन किसानों की आत्महत्या को महज कर्ज से जोड़कर देखना ठीक नहीं है, और न ही केवल कर्जमाफी से ऐसी आत्महत्या रूकेगी, या कि किसानों का उग्र आंदोलन थमेगा। किसानी से जुड़ी हुई बहुत सी और बातें हैं जिनमें सोचना जरूरी है, और फसल से परे का एक मामला इन दिनों खबरों में वैसे भी बना हुआ था, और उस बीच मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर सरकारी गोलियों से पांच किसानों की मौत भी हो गई है, और हड़बड़ाई सरकार का एक-एक करोड़ रूपए का अभूतपूर्व रिकॉर्ड मुआवजा देने की घोषणा की है। इस घोषणा और ऐसे मुआवजे से बाद में देश भर में आंदोलनों में होने वाली मौतों को लेकर बाकी राज्य सरकारों को क्या-क्या परेशानी झेलनी पड़ेगी, वह एक अलग बहस का मुद्दा है, लेकिन आज की बात किसानों की दिक्कत तक रहना जरूरी है।

पूरे देश में किसानों की अर्थव्यवस्था उनके जानवरों से जुड़ी रहती है। मध्यप्रदेश में अभी चल रहे किसान आंदोलन में तो किसान दूध बहाते दिख ही रहे हैं। पिछले दो हफ्तों से देश भर में इस बात का विरोध चल रहा है कि केन्द्र सरकार ने जानवरों की खरीद-बिक्री पर रोक के जो नए नियम लागू किए हैं, उनके चलते पूरे देश में जगह-जगह अपराध कहलाने वाले काम होंगे, कहीं पर लोग जानवरों को न बेच पाने की वजह से मरने के लिए खुला छोड़ देंगे, तो कहीं किसी के खरीदे-बेचे जानवरों को लेकर झगड़े होंगे। कुल मिलाकर किसान अगर अपने बेकार हो चुके जानवरों को बेच नहीं पाएंगे, तो न उन जानवरों को कुछ खिला पाएंगे, और न खुद कुछ खा पाएंगे।

यह बात महाराष्ट्र में पिछले बरसों में लगातार सामने आई जहां पर राज्य सरकार ने खुद के बनाए हुए बहुत कड़े कानून आतंक की तरह लागू किए थे, और किसान मरने की नौबत में आ गए थे, मर रहे थे, और उनका मरना जारी ही है। पिछले चौबीस घंटों में ही महाराष्ट्र में पांच किसानों ने आत्महत्या की है। जानवरों को लेकर एक भावनात्मक कानून और अभियान, आंदोलन और हिंसा से सबसे बड़ा नुकसान सबसे गरीब लोगों का हो रहा है, और जिन लोगों की भावनाएं, जिन लोगों का अहंकार इससे संतुष्ट हो रहा है, उनके पेट पहले से भरे हुए हैं।

अब सवाल यह है कि इस देश में किसानों और किसानी को बचाना है, या कि सरकारों के लिए एक पसंदीदा काम को आगे बढ़ाना है जो कि अनाज आयात करने का होता है। जब हजारों करोड़ का अनाज खरीदा जाता है, तो सबको मोटी रकम बचती है। अगर भारत की खेती धीरे-धीरे बदहाल होकर घाटे का काम रह जाएगी, तो किसान किसानी छोड़ देंगे, और सरकार के पास दूसरे देशों का मोहताज रहने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहेगा। इसलिए किसानों की दिक्कतों के बारे में व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत है, और इसकी शुरुआत जानवरों की खरीद-बिक्री, और उनके कटने पर लगे हुए नए ताजा प्रतिबंधों को खत्म करने से होनी चाहिए।