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णिपुर के चुनाव में वहां के 8 अखबारों और भाजपा नेताओं के खिलाफ चुनाव आयोग ने पुलिस रिपोर्ट का आदेश दिया है, क्योंकि उन्होंने आयोग की इजाजत के बिना मतदान के ठीक पहले विज्ञापन छापे हैं। इसके कुछ हफ्ते पहले उत्तर प्रदेश के एक सबसे बड़े अखबार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई, और उसके ऑनलाइन संपादक को गिरफ्तार किया गया, क्योंकि इसने एक ऐसा सर्वे प्रकाशित किया जो कि चुनाव आयोग के नियमों के ठीक खिलाफ था, और वह जाहिर तौर पर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की नीयत वाला दिख रहा था।

इन दोनों ही मामलों में यह बात साफ है कि ये मतदान को प्रभावित करने की नीयत से सोच-समझकर आयोग के निर्देशों के खिलाफ किए गए काम थे, और इनमें राजनीतिक दल और उनके नेता तो शामिल थे ही, इनमें मीडिया भी खुलकर साजिश में हिस्सेदार था।

लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के पक्ष में माहौल बनाने के लिए वहां के बहुत से प्रमुख अखबारों में अशोक पर्व नाम से कई-कई पेज की प्रायोजित रिपोर्ट छापी थी और यह मामला चुनाव आयोग से होते हुए, प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया से होते हुए कचरे की टोकरी में पहुंच गया, जबकि इसकी जांच रिपोर्ट में यह बात खुलकर सामने आई थी कि इन सारे बड़े-बड़े अखबारों ने भारी भ्रष्टाचार के तहत ऐसी रिपोर्ट छापी थीं। जब उस पूरे मामले में जांच के बाद भी कुछ नहीं हो पाया, तो अब चुनाव आयोग ने खुद पुलिस रिपोर्ट लिखवाना शुरू किया है, और भारतीय न्याय व्यवस्था में अगले बरस में जाकर यह पता लगेगा कि इस पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं।

अब सवाल यह उठता है कि भारत के मीडिया को भ्रष्ट करना तो राजनीतिक दलों के लिए एक मामूली बात हो सकती है, क्योंकि राजनीति और चुनाव, दोनों ही भ्रष्टाचार से लदे हुए हैं, लेकिन जो मीडिया अपने आप को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते हुए थकता नहीं है, वह चौथा स्तंभ अपनी आत्मा को बड़ी आसानी से बेचने पर उतारू रहता है।

जिस तरह कोई चुनावी उम्मीदवार चुनावी भ्रष्टाचार करने के लिए नियम-कानून में छेद ढूंढ-ढूंढकर अपना काम करते रहते हैं, ठीक उसी तरह का भ्रष्ट काम भारत का मीडिया भी करने लगा है, बल्कि लंबे समय से करते आया है, और इसीलिए इस मीडिया को कोई लोकतांत्रिक दर्जा देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

बड़े राजनीतिक दलों को अपने बड़े खजाने के साथ यह बात आसान पड़ती है कि वे मीडिया को खरीद लें। और भारत में अब धीरे-धीरे मीडिया जिस तरह से एक महंगा कारोबार बन गया है, उसमें अपना खर्च निकालने के लिए, और दूसरों के मुकाबले टिके रहने के लिए यह जरूरी भी हो गया है कि वह अपनी आत्मा नियमित रूप से बेचता चले। यह सब चुनाव आयोग और अदालतों से लुका-छिपी का खेल है, और इस खेल में बदनाम हो चुके मीडिया को एक तबके के रूप में भी अब लोकतंत्र के किसी स्तंभ का दर्जा पाने का दावा खुद छोड़ देना चाहिए।