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हाराष्ट्र में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के विधायक बेटे की शादी में बड़े शाही इंतजाम को लेकर खबरें आ रही हैं। लेकिन यह पहला मौका नहीं है कि महाराष्ट्र में ऐसा हुआ हो, या कि किसी और राज्य में ऐसा न हुआ हो। बहुत से बड़े नेताओं के परिवारों में शादियां इसी अंदाज में करोड़ों के खर्च से की जाती हैं, और उनकी खबरें बनती ही हैं। लेकिन इसी बीच एक महिला सांसद ने संसद में एक निजी विधेयक पेश करने की घोषणा की है कि शादियों पर बेतहाशा खर्च पर रोक लगाया जाए। अभी यह पेश नहीं हुआ है, और इस पर चर्चा बाद में होगी, लेकिन देश में जगह-जगह सतह पर ऐसी कुछ चर्चा शुरू हो रही है।

इस बीच जम्मू-कश्मीर की चर्चा जरूरी है जहां सरकार ने एक आदेश निकालकर शादियों में मेहमानों की संख्या, और ऐसी दावतों में खिलाए जाने वाले सामानों की संख्या सीमित कर दी है।

लोगों को याद होगा कि बहुत पहले भी एक गेस्ट कंट्रोल एक्ट हुआ करता था, जो कि शादी के मेहमानों को सीमित करना था, बाद में आर्थिक उदारीकरण की आंधी में उस एक्ट के पन्ने कहां गए, यह भी लोगों को याद नहीं है। लेकिन आज इस पर चर्चा की फिर से जरूरत है क्योंकि देश में आर्थिक असमानता इतनी बढ़ रही है कि बड़े लोगों की देखा-देखी मध्यम वर्ग भी अपनी ताकत से बाहर का खर्च करने लगा है, और दिखावे में देश की उत्पादकता तो खत्म हो ही रही है, सार्वजनिक जगहों पर ऐसे आयोजनों से दूसरे लोगों का जीना भी हराम हो रहा है।

अभी महाराष्ट्र से जो खबर आई है, उसका एक दूसरा पहलू भी है। जब सत्ता में बैठे हुए नेता या अफसर इतना बड़ा खर्च करते हैं, तो वे समाज की गरीबी को भी अनदेखा करते हैं, और लोगों को यह भी लगता है कि यह सत्ता से जुटाई गई काली कमाई है जिसके चलते इस दर्जे का खर्च हो रहा है। इससे एक तरफ तो नेताओं की समाज के प्रति संवेदनशून्यता दिखाई पड़ती है, और दूसरी तरफ सार्वजनिक जीवन की साख भी चौपट होती है।

हम इसे एक बड़ी बेशर्मी का काम मानते हैं कि जहां कुपोषण से देश-प्रदेश का बुरा हाल हो, वहां पर एक-एक शादी के लिए दर्जनों विमान उतरें, और हजारों मेहमान आएं, महलों से सजावट हो, और संपन्नता के ऐसे टापू आसपास के विपन्नता के समंदर से अछूते रहे। सार्वजनिक जीवन में लोगों को इतनी बेशर्मी नहीं करनी चाहिए, इसके साथ-साथ अगर लोकतंत्र में किसी तरह की कानूनी गुंजाइश बनती है, तो किसी भी दावत में मेहमानों की गिनती, और उस पर खर्च की सीमा तय करनी चाहिए, और सरकार को देश में आर्थिक असमानताओं के चलते हुए जो बेचैनी बढ़ रही है, उसको और बढऩे देने से रोकना चाहिए।