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दुनिया किस तरह एक चक्कर लगाकर सफर पूरा करती है यह देखना हो तो भारत की सरकारी विमान सेवा एयर इंडिया को देखना चाहिए। आज केन्द्र सरकार एयर इंडिया के दसियों हजार या लाखों करोड़ के अब तक हो चुके घाटे को देखते हुए उसे बेचने की फिराक में है, और सरकार के लोगों को यह डर भी है कि इसके लिए पता नहीं सही दाम और सही ग्राहक मिलेंगे या नहीं। सरकारी संरक्षण और भारी तरफदारी के बावजूद एयर इंडिया की हालत बहुत खराब है, और इस खराबी की चर्चा करते हुए वह पुरानी सीएजी रिपोर्ट याद आती है जिसमें कहा गया था कि एयर इंडिया ने मुसाफिरों को मुफ्त दी जाने वाली पिपरमेंट की खपत छह सौ प्रति मुसाफिर बताई थी, जो कि चोरी-डकैती से कम कुछ नहीं हो सकता। खैर, एयर इंडिया उतनी ही भ्रष्ट होगी जितनी कि सरकार की बहुत सी और संस्थाएं होंगी। आज चर्चा के लायक बात यह है कि ऐसी खबरें हैं कि एयर इंडिया के आधे से अधिक शेयर खरीदने में टाटा ने दिलचस्पी दिखाई है।

अब यह याद करने का मौका है कि 1932 में टाटा ने ही यह एयर लाईंस शुरू की थी, और आजादी के तुरंत बाद सरकार ने निजी कंपनियों के राष्ट्रीयकरण की सोच के चलते इस कंपनी के आधे शेयर खरीद लिए थे, और फिर कुछ बरस बाद इस पूरी कंपनी को ही अधिग्रहित कर लिया था। नेहरू के वक्त के सार्वजनिक उपक्रम के उस दौर में एयर इंडिया को एक सार्वजनिक उपक्रम बना दिया गया था, और बाद में सरकार के हर तबके ने इसे अपने-अपने तरीके से चूसा और दुहा। नतीजा यह निकला कि एकाधिकारवादी सरकारी कारोबार को भी सरकार ने डुबाकर रख दिया, और अब आज इस कारोबार को बचाने के लिए एक बार फिर टाटा से उम्मीद दिख रही है। करीब एक सदी बाद अब एयर इंडिया फिर घूम-फिरकर अपने संस्थापक के चरणों में जाकर लेट सकती है।

मौजूदा सरकार की सोच बहुत साफ है कि सरकार को कारोबार नहीं करना चाहिए, और कारोबार को नियंत्रित करके उसकी कमाई से तीस फीसदी टैक्स वसूल करना चाहिए। यह सोच मोदी सरकार की अपनी नहीं है, कांग्रेस की सरकार ने 90 के दशक में ही आर्थिक उदारीकरण का सिलसिला शुरू कर दिया था, और आरबीआई गवर्नर से लेकर वित्तमंत्री, और फिर प्रधानमंत्री के पद तक सम्हालते हुए मनमोहन सिंह ने इस उदारीकरण को लगातार बढ़ाया था। बहुत से सार्वजनिक उपक्रमों से सरकार ने उस वक्त घाटे के चलते हुए हाथ धो लिए थे, और अब एयर इंडिया शोकेस में रखा हुआ अगला सार्वजनिक उपक्रम दिख रहा है।

हम निजीकरण के खिलाफ नहीं हैं क्योंकि अब खुली बाजार व्यवस्था में अगर सरकार अपने संस्थानों को बहुत ही खूबी और काबिलीयत से नहीं चला सकेगी, तो वह कारोबार से बाहर भी हो जाएगी, और ऐसे पब्लिक सेक्टर का दाम भी मिट्टी में मिल जाएगा। ऐसे में अगर सरकार काबिल कारोबारियों को सार्वजनिक उपक्रम के शेयर बेचती है, और वे ऐसे उपक्रमों को नियंत्रित करते हैं, तो सरकार वहां पर बेईमानी और चोरी-डकैती करने के लायक तो नहीं रहेगी, लेकिन सरकार के पास बचे हुए आधे से कम शेयरों के दाम भी आज के सौ फीसदी शेयरों के मुकाबले कई सौ फीसदी बढ़ जाएंगे, और सरकार फायदे में रहेगी। जब सत्ता का मिजाज ही अपने संस्थानों को लूटने का हो जाता है, तो उसे कारोबार से बाहर हो जाना चाहिए। लेकिन इसके लिए दो बातों का बहुत ख्याल रखना चाहिए, पहली तो यह कि केवल ऐसे उपक्रम बेचे जाएं जो कि घाटे में चल रहे हैं, या कि जिनसे बहुत अधिक फायदा होने की संभावना है। सार्वजनिक उपक्रमों में काम करने वाले कर्मचारियों को यह नहीं सुहाता है कि संस्थानों का निजीकरण हो, क्योंकि इससे बहुत सी नौकरियां खत्म होती हैं, और निजी कारोबारी कम लोगों से बेहतर काम लेने का काम करते हैं।

लेकिन नौकरियां बचाने के लिए सरकारी उपक्रमों को घाटे में चलाना ठीक नहीं है, क्योंकि यह पूरे देश का घाटा रहता है, महज सरकारी खजाने का घाटा नहीं रहता। इस देश के औद्योगिक ढांचे का बेहतर इस्तेमाल अगर निजी कारोबारी कर सकते हैं, तो दुनिया भर में खुले मुकाबले के आज के इस दौर में सरकार को ऐसा करना भी चाहिए। करीब एक सदी बाद टाटा को अपना शुरू किया हुआ कारोबार अगर फिर से फायदे में चलाने की चुनौती मिल रही है, तो यह देश के सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के मामले में एक बड़ी मिसाल बन सकती है। फिलहाल ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार टाटा को यह कंपनी बेचकर कह रही हो, तेरा तुझको अर्पण, लाखों करोड़ डूबा मेरा...।