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भाजपा-एनडीए ने अपने राष्ट्रपति पद प्रत्याशी का नाम घोषित किया तो लोग उनकी जाति की चर्चा पर उतर आए। और इसमें कुछ अस्वाभाविक भी नहीं था क्योंकि ऐसे किसी फैसले और चुनाव के पीछे धर्म या जाति या क्षेत्रीयता का पैमाना तो रहता ही है। इसलिए अगर रामनाथ कोविंद एक दलित हैं, तो उनका दलित होना भारत की राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा में अनदेखा नहीं रह सकता। लेकिन कोई अगर यह समझे कि महज उनके दलित होने की वजह से ही उन्हें प्रत्याशी बनाया गया है, तो उन्हें यह भी देख लेना चाहिए कि राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में कोविंद का लंबा इतिहास है। वह अच्छा है या बुरा है, यह एक विश्लेषण का मुद्दा हो सकता है, लेकिन उन्हें महज दलित होने की वजह से राष्ट्रपति बनाया जा रहा है, ऐसे नतीजे पर पहुंचना थोड़ी ज्यादती होगी। लेकिन मीडिया लोगों की सोच को एक अतिसरलीकरण की तरफ धकेलता है। कोविंद के बारे में पहले ही घंटे से यह बात कही जाने लगी कि वे भाजपा-एनडीए के प्रतिभा पाटिल हैं।

दरअसल जब मीडिया ने प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बनाया था तो उनके खिलाफ बड़ी आक्रामक जुबान में यह कहा जाता था कि उनकी योग्यता महज इंदिरा गांधी के घर खाना बनाने जितनी थी। और उसी अपमानजनक मिसाल को लोग आज कोविंद पर फिट कर रहे हैं।

दरअसल हिन्दुस्तान में अब टीवी चैनल लोगों की सोच को तय करते हैं। और टीवी की अपनी मजबूरी यह है कि दर्शकों की सीमित संख्या को झपटकर अपने कब्जे में करने के लिए उसे सबसे सनसनीखेज, फिर चाहे झूठी ही क्यों न हो, सुर्खियों को दिखाना पड़ता है और लोगों को बांधकर रखना पड़ता है। अब टीवी को देख-देखकर प्रभावित हो चुके दर्शकों के सामने जब अखबारों को आना पड़ता है, तो वे भी टीवी की सनसनी से अछूते नहीं रह पाते, और उनके सामने भी प्रसार संख्या को बढ़ाने का गलाकाट मुकाबला रहता ही है। ऐसे माहौल में जब अच्छे-भले गंभीर और बड़े अखबारों की वेबसाइटों को देखें तो दिखाई पड़ता है कि सबसे सेक्सी, सबसे बुरे स्कैंडल वाली, सबसे अधिक नंगेपन वाली सुर्खियों के लिंक डाल-डालकर ये वेबसाइटें इंटरनेट-ग्राहकों को अपनी ओर खींचती हैं, और जिस तरह टीवी टीआरपी के पीछे भागते हैं, अखबार प्रसार संख्या के पीछे भागते हैं, उसी तरह इंटरनेट के पेज हिट्स की तरफ भागते हैं। यह सिलसिला गैरजिम्मेदारी को बढ़ाते चलता है, और लोग तथ्यों के बजाय विशेषणों की बैसाखियों पर दौडऩे की कोशिश करने लगते हैं, कर रहे हैं।

अब ऐसे में सनसनी की आग में घी या मिट्टीतेल डालने के लिए सोशल मीडिया पहुंच गया है, और इसमें गैरजिम्मेदार, भड़काऊ लोगों की भीड़ तो है ही, बड़ी-बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता भी पूरी गैरजिम्मेदारी से भड़काऊ झूठ को बढ़ावा देते रहते हैं। इसकी ताजा मिसाल उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का फेसबुक पेज है जहां पर असम की एक पुरानी तस्वीर को बंगाल की ताजा तस्वीर बताते हुए पोस्ट किया गया है, और इसमें एक आदिवासी महिला के कपड़े फाड़े हुए दिख रहे हैं, और अभी खबर आई है कि इसे लेकर योगी के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई है कि उन्होंने एक आदिवासी महिला की नग्नता को इस तरह उजागर किया, और झूठ के साथ उजागर किया।

दरअसल आज का वक्त सूचना के सैलाब का, बल्कि सूचना की सुनामी का है, और इसके थपेड़ों में लोगों की आंखों में रेत भी जा रही है, और नमकीन पानी भी जा रहा है। लोगों को सच दिखना बंद हो रहा है, और इन लहरों में उतराते-चढ़ते लोग सैलाब के साथ कहीं के कहीं पहुंच जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि अखबारों में जो कुछ लोग अब तक गंभीर बचे हुए हैं, उन्हें जब तक रोजी-रोटी चलती रहे, तब तक गंभीर बने रहना चाहिए, ईमानदार बने रहना चाहिए, हालांकि यह बात दिन-ब-दिन अधिक और अधिक मुश्किल होती जा रही है। सनसनीखेज और चटपटे झूठ के बाजार में खालिस तपाए हुए सच की पूछ-परख बड़ी कम है, और लोकतंत्र में लोग इस नौबत के लंबे दाम चुका रहे हैं।