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 न्ना हजारे ने पिछले हफ्ते भर में बहुत अरसे बाद मुंह खोला। अपने ही चेले रहे हुए अरविंद केजरीवाल पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तो आरोपों की जांच की बात कहते हुए अन्ना ने केजरीवाल के खिलाफ सब कुछ कह दिया, मानो कि आरोप सही हों, और इस्तीफे का वक्त आ गया हो। कुछ इसी तरह का हाल रामदेव के बर्ताव में देखने मिलता है। योग-आयुर्वेद के दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी बन गए स्वघोषित बाबा, रामदेव को पिछले बरसों में लगातार यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर हमले के लिए सुर्खियां मिलीं, और फिर उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त खुलकर मोदी को वोट दिलवाए। ऐसे ही एक और व्यक्ति अपने आपको श्रीश्री कहने वाले रविशंकर हैं जो कि यूपीए सरकार के दिल्ली के भ्रष्टाचार से लेकर दूसरी कांग्रेस सरकारों के भ्रष्टाचार के खिलाफ घूम-घूमकर पिछले बरसों में बहुत बोलते रहे।

लेकिन इन तीनों में एक बात एक सरीखी है, कि इनके निशाने चुने हुए हैं, और इनकी बंदूक या तोप उन्हीं चुनिंदा निशानों को निपटाने के लिए निकलती हैं। जिस वक्त रविशंकर कर्नाटक में बैठे हुए येदियुरप्पा की भाजपा सरकार के भयानक और ऐतिहासिक भ्रष्टाचार को देख रहे थे, और उस मंत्रालय से महज कुछ मील की दूरी पर रविशंकर का आश्रम था, तब भी उस भ्रष्टाचार के खिलाफ रविशंकर का मुंह नहीं खुला।

आज उत्तरप्रदेश में लगातार तरह-तरह की हिंसा चल रही है, साम्प्रदायिक तनाव चल रहा है, और योगी राज में बड़े-बड़े जुर्म भी हो रहे हैं, लेकिन भगवा भाईचारे के चलते हुए रामदेव का मुंह भी नहीं खुलता है, और आज भी उनके निशाने पर अपनी प्रतिद्वंदी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अलावा गैरभाजपा लोग ही रहते हैं। कमोबेश यही हाल अन्ना हजारे का है जिनके बारे में आज सोशल मीडिया पर लगातार यह पूछा जा रहा है कि जिस लोकपाल आंदोलन को लेकर वे दिल्ली में अपनी जान भी देने पर उतारू हो गए थे, आज मोदी सरकार के तीन बरस होने पर भी उनके मुंह से लोकपाल शब्द क्यों नहीं निकल रहा है? यूपीए सरकार के रहते तो अन्ना को यह लगता था कि लोकपाल एक ऐसी रामबाण दवा है जिससे कि भारतीय लोकतंत्र की सारी बीमारियां दूर हो जाएंगी, लेकिन अब अन्ना नाम का यह हकीम इस लोकपाल नाम की दवा की पर्ची लिखना ही भूल गया है।

और यह सब अनायास नहीं होता है, न ही अन्ना की उम्र उनकी याददाश्त पर हावी हो रही है, यह सब कुछ सोचा-समझा है, एकाएक ऐसे कुछ किरदार भारतीय राजनीति में आकर खड़े हो जाते हैं, और अपनी पसंदीदा, चुनिंदा सरकार पर हमले करना शुरू कर देते हैं। लेकिन उनके हमले उतनी ही भ्रष्ट, या उससे भी अधिक भ्रष्ट दूसरी सरकारों की तरफ कभी नहीं मुड़ते। यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए बहुत घातक है जहां पर जनता के प्रति जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त लोग जनमत को मोडऩे का काम एक योजना, या बेहतर यह कहना होगा कि एक साजिश, के तहत करते हैं, और किसी पार्टी को जिताने का, किसी को हराने का काम करते हैं।

ऐसा न होता तो जब देश का सुप्रीम कोर्ट केन्द्र की मोदी सरकार को इस बात के लिए फटकार लगा रहा है कि वह लोकपाल नियुक्त क्यों नहीं कर रही है, और यह हुक्म दे रहा है कि तुरंत लोकपाल नियुक्त किया जाए, तब भी अन्ना हजारे अपनी जिंदगी के इस सबसे बड़े मकसद के बारे में मुंह भी नहीं खोल रहे हैं, उस तरफ देख भी नहीं रहे हैं। लेकिन वे दिल्ली को बड़ी बारीकी से देख रहे हैं, और यह घोषणा कर रहे हैं कि अगर केजरीवाल का भ्रष्टाचार साबित होता है तो वे दिल्ली आकर धरना देंगे। ऐसे गैरराजनीतिक नेताओं के, सामाजिक और धार्मिक नेताओं के, कुकुरमुत्तों की तरह उग आने वाले चुनावी-राजनीतिक मकसद के मुद्दे जनता को समझने चाहिए।