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 त्तरप्रदेश में एक योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसा लगा था कि सरकार के कामकाज में कुछ सादगी भी आ सकती है। अपने शुरुआती हफ्तों में योगी आदित्यनाथ ने कुछ ऐसे फैसले लिए भी, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फैसले के पहले ही राज्य सरकार की गाडिय़ों से लालबत्तियां हटवा दी थीं। इसके अलावा उन्होंने छुट्टियां घटा दीं, काम के घंटे तय करने को कहा, और सरकारी दफ्तरों में गंदगी के खिलाफ मुहिम छेड़ी। लेकिन दूसरी तरफ अपनी पार्टी से परे के उनके अपने निजी, और घोर साम्प्रदायिक संगठन, हिन्दूवाहिनी, द्वारा उत्तरप्रदेश में कानून हाथ में लेकर हमला करना जारी रहा, और योगी के ऐसे भाषणों का कोई मतलब नहीं रहा कि उनकी सरकार सभी धर्मों को बराबर मानकर चलेगी। उनके खुद के इस आक्रामक और हिंसक संगठन ने एक किस्म से स्थानीय स्तर पर सरकार अपने हाथ में ले ली, और अफसरों से, खासकर पुलिस से, बदसलूकी में भाजपा के नेता भी शामिल रहे, और योगी की हिन्दूवाहिनी के लोग भी।

अब एक नई खबर सामने आई कि कश्मीर के मोर्चे पर तैनात सेना के एक जवान के शहीद होने के बाद जब योगी उसके घर मिलने गए, तो एक दिन पहले से अफसरों ने इस मामूली घर में जुगाड़ लगाकर, बांस-बल्ली से टांगकर एसी लगवा दिया, और घर के भीतर सोफा और कालीन सजा दिया। अगले दिन योगी आकर गए, और आधे घंटे बाद सारा सामान हटा दिया गया और एसी भी निकाल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि अगर एक योगी के भी मुख्यमंत्री बनने पर सादगी नहीं आ सकती, तो कब आएगी? बहुत से नेता सत्ता पर आते ही ऐसा बर्ताव करने लगते हैं कि उनके पुरखे मानो बादशाह रहे हों। और यह बात सही है कि सत्ता से हटने तक ये तमाम नेता अपनी बादशाहत बनाए रखने के लिए कालेधन का अंबार जुटा लेते हैं। इस तरह सत्ता का मतलब सत्तासुख और सुखी भविष्य दोनों ही हो जाता है।

यह सिलसिला लोकतंत्र को खोखला करते चलता है, और जनता की लोकतंत्र पर आस्था को खाते चलता है। जिस देश में गरीबों को महीनों तक सरकारी योजनाओं की मजदूरी नहीं मिल पाती है, जहां पर कुछ सौ रूपए की वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए बुजुर्गों को दर्जनों मील चलकर पहुंचना पड़ता है, और खाली हाथ लौटना पड़ता है, वहां पर अगर कुछ मिनटों के लिए भी मुख्यमंत्री बिना कालीन और बिना एसी न बैठ सकें, तो यह लोकतंत्र की शिकस्त है, भाजपा की शिकस्त है, और योगी-जीवन को लेकर जितने किस्म की जनधारणाएं हैं, उनकी भी शिकस्त है। यही काम अगर उत्तरप्रदेश के दलित परिवारों में खाने या सोने वाले राहुल गांधी के लिए किया गया होता, तो नेहरू-गांधी परिवार का राजकुमार कहकर उनका मखौल हफ्तों चला होता।

हमारा ख्याल है कि पूरे देश में अदालती दखल से सरकारी फिजूलखर्ची, और ऐशोआराम को खत्म करना चाहिए। सरकार हांकने वाले लोग खुद तो ऐसा नहीं करेंगे, लेकिन हो सकता है कि अदालत में कोई ऐसे फक्कड़ जज बैठे हों जो कि किफायत के लिए हुक्म दे सकें, न सिर्फ सरकार में बैठे लोगों के लिए, बल्कि खुद अदालत में बैठे बड़े जजों के लिए भी। देश भर में जनता के पैसों पर जिस किसी को सहूलियत देने का इंतजाम रहता है, वे लोग ऐशोआराम जुटाने में जुट जाते हैं। धीरे-धीरे एक-एक करके सभी पार्टियों का जब यह हाल हो जाता है, तो फिर लोगों की शर्म भी खत्म हो जाती है।

दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल जैसे राज्य को एक मिसाल की तरह देखना चाहिए जहां दशकों के वामपंथी राज के बाद भी जिस तरह की सादगी और किफायत की परंपरा जारी रही, उसका एक नैतिक दबाव था कि उन्हें हराकर सत्ता में आने वाली ममता बैनर्जी के सामने भी सादगी और किफायत की एक बेबसी थी, और उन्हें अपनी सरकार को इस रास्ते पर ही चलाना पड़ा। हो सकता है कि वे खुद होकर भी ऐसा करतीं, लेकिन अगर वो ऐसा करना न भी चाहतीं, तो भी वामपंथी मिसाल के सामने जनता उनकी फिजूलखर्ची को खारिज कर देती। आज हाल यह है कि बाकी प्रदेशों में सत्ता तो सत्ता, विपक्ष में बैठे हुए लोग भी जनता के पैसों पर हर किस्म की फिजूलखर्ची जारी रखते हैं, और जनता यह देख-देखकर राजनीति के लिए ऐसी हिकारत मन में पाल लेती है कि वह लोकतंत्र से हिकारत में बदल जाती है।