आज के आधुनिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में भी यह माना जा रहा है
कि हमारे भारत की जनता पर तीन चीजें सबसे ज्यादा प्रभावकारी हैं और वे हैं - राजनीति, क्रिकेट और फिल्म। इनमें क्रिकेट का जादू तो अभी पिछले दो-ढाई दशकों से लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है लेकिन फिल्मों का जादू तो पिछले सौ बरसों से हमारे मन में डोल रहा है। इस देश के जन-मानस ने अपने नायक या महानायक चुने तो ज्यादातर इस देश की राजनीति, खेलकूद या सेना से नहीं बल्कि फिल्मों से चुने। उन्हें ही अपना ’रोल-मॉडल’ माना और अपने पहनाव ओढ़ाव, बोल-चाल और चाल-चलन में इन्हीं नायकों से सबसे ज्यादा प्रेरणा ग्रहण की और कदम कदम पर उनका अनुसरण किया। हरदम ऐसे नायकों की एक तिकड़ी को देश के सिने प्रेमी दर्शकों ने अपनी चाहत से जनमा और उन्हें बरसों निभाया। फिल्मों के शुरुवाती दौर में पहली तिकड़ी बनी थी - पृथ्वीराज कपूर, मोतीलाल और अशोक कुमार की। उनके बाद दूसरी तिकड़ी - दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद की। फिर तीसरी तिकड़ी बनी धर्मेन्द्र, राजेशखन्ना और अमिताभ बच्चन की... और आज पिछले ढाई दशकों से खान बन्धुओं की चौथी तिकड़ी चल रही है - शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान की।
फिल्में कला की सबसे अधिक प्रभावकारी और लोकतांत्रिक माध्यम रही है। इन तिकड़ियों के बीच जो दूसरे नम्बर की तिकड़ी रही जिनमें - दिलीप, राज और देव साहब रहे, इस तिकड़ी की उपस्थिति व योगदान ने तो फिल्म जगत में आन्दोलन का रुप ले लिया था। ये तीनों ऐसे कलाकार हुए जिन्होंने अपने सुन्दर व्यक्तित्व और भाव-प्रवण अभिनय से जनता को ऐसे मोहा कि ये कलाकार किसी ईश्वरी शक्ति की तरह लोगों के दिलों में स्थापित हो गए। मसीहों की तरह ये पूजे जाने लगे। फिल्मों में इन तीनों महानायकों की उपस्थिति ने फिल्मी दुनिया की हर तकनीक को आधुनिक चेतना के साथ सामाजिकता की ओर मोड़ा। जनता में देशप्रेम व भाईचारे का जज़्बा भरा, उनमें राष्ट्रीयता व अंतर्राष्ट्रीयता जगाई और दुनियॉ में हो रहे परिवर्तनों की मुख्य धारा से उन्हें अवगत कराया। इन तीनों महानायकों ने अपने समय में अनेक संगीतकारों के साथ तीन पार्श्व गायकों को स्थापित कर दिया - तब दिलीपकुमार की आवाज के लिए मोहम्मद रफी, राजकपूर के लिए मुकेश और देव आनंद के लिए किशोर कुमार ने ऐसे गीत गाए जैसे वे अपने गले से नहीं नायकों के गले से गा रहे हों उन्हीं की आवाजों में। सुनने वाले गीत सुनकर ही जान जाते थे कि इस गायक को किस अभिनेता के लिए गवाया गया होगा।
इस तिकड़ी में राजकूपर को एक शो-मैन की तरह माना गया जो अपनी फिल्मों में कई स्तर के प्रयोग कर उनका ’शो’ किया करते थे। देव आनंद अपनी खूबसूरती, अपने ड्रेस और अंदाज के जरिये देखने वालों के दिलों में छा जाया करते थे। इन सबसे अलग दिलीप कुमार एक ऐसे नायक के रुप में उदित हुए जो अपने अभिनय और केवल अभिनय के बल पर दर्शकों के हृदय में ऐसी छाप छोड़ते थे कि कभी ट्रेजिडी किंग माने जाने वाले दिलीपकुमार अपनी बाद की फिल्मों में कॉमेडी किंग भी हो गए थे। दिलीप कुमार जब रोते थे तब दर्शक रोते थे, जब वे हँसते थे तो दर्शक हँसते थे। जब वे परदे पर प्रेम पीड़ित, संत्रास और घुटन भरी जिंदगी जीने वाले किसी किरदार की भूमिका कर रहे होते थे, तब फिल्म देखकर हॉल से बाहर निकलते दर्शक उनकी उस पीड़ा और घुटन को अपने साथ लेकर जा रहे होते थे। कहते हैं कि अपने ट्रैजिक रोल को हमेशा जीवन्त बनाते बनाते दिलीप के भीतर एक गहरी उदासी पसरने लग गई थी और वे कुंठा एवं विकार ग्रस्त होने लगे थे। ऐसे समय में वे जब अपनी जॉच कराने लन्दन पहुँचे तब वहाँ के मनोचिकित्सक ने उन्हें समझाया कि ’अब आप ट्रेजिडी भूमिकाएॅ छोड़िये और कॉमेडी शुरु कीजिए।’ तब स्वास्थ्य लाभ के लिए उन्होंने अपनी भूमिकाओं में यह परिवर्तन चाहा और प्रयोग के तौर पर लन्दन से आते ही ’कोहिनूर’ फिल्म में काम किया जो संभवतः उनकी पहली विनोद प्रधान फिल्म थी जिनमें एक हल्के मूड वाले तलवारबाज आशिक का रोल उन्होंने किया था। उसके बाद ’राम और श्याम’ व ’गोपी’ जैसी हास्य फिल्मों में तो उन्होंने अपनी ही पुरानी छवि को तोड़ा और एक नये दिलीपकुमार का विश्वासजनित चेहरा दर्शकों के सामने आया। इसी तरह से ’बैराग’ और ’सगीना’ बनीं जिसमें उनकी प्रतिभा के नये रचनात्मक और विनोदमय आयाम थे। उनके इस प्रयोग और परिवर्तन ने उन्हें सकारात्मक परिणाम दिए। तब के फिल्म समीक्षक ये मानते थे कि उस समय के हास्य अभिनेताओं ने भी अपने दर्शकों को जितना हॅसाया था उनसे ज्यादा दिलीपकुमार अपने अभिनय से हॅसाने लगे थे।
विनोद साव
vinod.sao1955@gmail.com


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