श्रेणियाँ

बनारस, का हाल बा गुरु!

प्रकाशन :मंगलवार, 15 मार्च 2011
आनंद वर्द्धन

तीन लोक से न्यारी काशी,बनारस सो काशी सेइय कस न, जो मज़ा बनारस में वो न पेरिस में न फारस में, कासी कबहुँ न छाँड़िये, मोरे मन भावै काशी की गली वगैरह वगैरह उक्तियाँ, सूक्तियाँ, मुहावरे और काव्य पंक्तियाँ संस्कृत काव्य परंपरा से लेकर लोकमन तक पसरी बिखरी हैं। लब्बो लुबाव ये कि काशी माने वाराणसी माने बनारस के बारे में जो कहा जाय वो कम और उसी बनारस पर लिखना ‘‘एक फर्लांग का सफ़र‘‘ में ये तो और बड़े जोख़िम का काम। सफर एक फर्लांग का और नापना है बनारस जैसा शहर। ना बाबा ना, बहुत कठिन है पर बामन ने भी तो तीन पग में सारी दुनिया नाप ली थी। लेकिन बनारस है तीन लोक से न्यारा और इसकी हर गली, हर मुहल्ला अपने में एक दुनिया समेटे हुए है।

चार साल पहले इटली के शहर वेनिस जाना हुआ था मेरा। वेनिस के पोर्ट पर उतरा तो लगा कि अरे ये तो बनारस के दशाश्वमेघ घाट जैसा ही है। गलियों में घुसा तो बिल्कुल बनारस की गलियाँ याद हो आईं। फ़र्क बस इतना कि बनारस अपनी मस्ती में मस्त, धूल, गर्द, गंदगी के साथ और वेनिस की गलियाँ थोड़ी साफ़ सुथरी। बनारस में आज भी किसी कोने अतरे रुपये दो रुपये में कट चाह (चाय) मिल जायगी और वेनिस में हो सकता है किसी किओस्क में 50 यूरो (3000 रूपये) एक कॉफी के लिए ढीले करने पड़ें। पर वेनिस में लगा कि साफ़ सुथरे बनारस में ही आ गए हम। और मज़े की बात देखिये कि अभी हाल में एक लेख पढ़ते समय मैंने पाया कि सुनीति कुमार चटर्जी ने बनारस की गलियों की तुलना वेनिस से की है।

मित्रो, शाश्वत सत्य कभी नहीं बदलते। बनारस भी है एक शाश्वत सत्य इसीलिये यह बरसों से नहीं बदला। बनारस, खाँटी बनारस। बहरी (बाहरी) बनारस भले बदलता रहे पर ज़रा खड़े होकर देखिये तो चौक, ठठेरी बाज़ार, चौखंबा, गोदौलिया, मनकनका (मर्णिकर्णिका घाट) अस्सी, मैदागिन, मच्छोदरी, पंचगंगा, दशासुमेध (दशाष्वमेध) कितने मुहल्ले, कितनी गलियाँ, सब जस की तस। आप खाँटी बनारसी को विदेश में भी पहचान लेंगे उसकी बोली सुनते ही। उसके उच्चारण में जो बनारसीपन है न - भोजपुरी, काशिका और गंगा के पानी के बीच लहराता झूलता, फट्ट से बता देगा कि ‘ई पक्का बनारसी है’। हो सकता है कि कंधे पर गमछा रखे कोई मिल जाय और मुँह में क़रीने से रखे पान से टपकी कोई छोटी-सी बूँद उसके सूट के वैभव को बढ़ा रही हो और हो सकता है कि यह सब न भी हो पर बनारस में जो जी लिया वह तर गया। बिहारी को याद करें ‘अनबूड़े बूड़े, तिरे जे बूड़े सब अंग।’ पर यह बूड़ना आसान नहीं है भइय्या। बनारस पत्तागोभी की परत की तरह है। जितना खोलो उतने खम। ऐसे बनारस को एक फर्लांग में देखना अपने आप में ‘‘ज्यों रहीम नट कुंडली सिमिटि कूदि कढ़ि जाँहि‘‘ जैसा ही है।

चलिये शुरुआत करते हैं बनारस के चौक से। चौक हर शहर का एक तरह से दिल होता है। हर शहर में चौक नाम की कोई न कोई जगह होती ही है। पुराने घरों में भी चौक हुआ करता था। छोटा हो, बड़ा हो, घर में चौक होगा ही और शहर में भी। इसी चौक के पूरब पश्चिम हैं बनारस की गलियाँ और उत्तर दक्षिण की ओर मुख्य सड़क जिसमें से गुज़रते समय आपको लहराती बलखाती नदी होना पड़ता है। वरना सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। रिक्शे का हैंडिल या हुड, स्कूटर का पहिया, गाय और सांड़ों के सींग या राह चलते किसी का धक्का आपको सुमधुर बनारसी गालियाँ देने के लिये उत्प्रेरित कर सकता है। इसी चौक के पूरवी मुहाने पर है भद्दूमल की कोठी जिसके नीचे और अगल बगल कई बरसों से स्थित है पान सुपाड़ी, इत्र, तेल, फुलेल, अमावट, बड़ी, अचार, नमकीन, नानखटाई और न जाने काहे काहे की दुकानें। यहीं बीच सड़क पर एक से एक आम, लीची, पपीता और जितने भी देशी और आभिजात्य फल हैं सबकी दुकानों के बीच गौ माता और उनके वंशज पगुराते हुए खड़े बैठे मिल जाएँगे। आपको लोकतंत्र का इससे बढ़िया जीवंत उदाहरण कहीं और न मिलेगा।

कहा जाता है कि बहुत पहले यहाँ श्मशान हुआ करता था। पर आज यह सबसे अधिक जीवंत इलाक़ा है जो लगातार चहचह करता है। शहर का सबसे ऊँचा स्थान होने का गौरव इसे प्राप्त है। यह नए शहर और पुराने शहर का संधि स्थल है। सड़क के पश्चिमी तरफ़ है चौक थाना और चौक थाने के पास उत्तर पूर्वी कोने पर है कब्रगाह । इस कब्रगाह का किस्सा भी अजीब है, जो औरंगजेब के जमाने का है। बकौल विश्वनाथ मुखर्जी -‘‘काशी में उन दिनों नगर के कोतवाल साहब किसी विधवा महिला पर फिदा हो गये। उन दिनों नगर का बादशाह कोतवाल ही होता था। कोतवाल का प्रस्ताव विधवा तक पहुँच गया। संभव है कि उसने इसके विरुद्ध नगर के लोगों से सहायता माँगी हो और लोग मुकर हो गये हों । जब कहीं से कोई सहायता नहीं मिली तब उस विधवा ने कोतवाल से दो महीने का समय माँगा ताकि एक अनुष्ठान पूरा कर ले।

कोतवाल अपने घमण्ड में चूर था। उसे अपनी शक्ति पर विश्वास था कि ‘वन का गीदड़ जायगा किधर?’ कोतवाल ने कहा- ‘‘अमुक तारीख को निकाह होकर रहेगा। मैं कोई बहाना नहीं सुनना चाहता।’’

विधवा भी काफ़ी सयानी थी। एक दिन वह रात के सन्नाटे में चुपचाप दिल्ली रवाना हो गयी। सम्राट के दरबार में आकर उसने अपनी कहानी सुनाई। औरंगजेब ने कहा- ‘‘घबड़ाने की बात नहीं है बेटी। अब तुम जैसे आयी थी, वैसे चली जाओ। मैं इंतजाम करता हूँ। पर यह बात किसी से मत कहना। मौक़े पर सब काम हो जायगा।‘‘

समय गुज़रता गया। निकाह की तारीख से एक दिन पहले विधवा के पास सूचना आ गयी कि कल सबेरे निकाह की जगह पहुँच जाना। बेचारी क्या करती? सम्राट को मन ही मन कोसती हुई उस स्थान पर पहुँच गयी जहाँ कोतवाल, काज़ी वगैरह मौमौज़ूद थे। तैयारी पूरी हो गयी थी। आँसुओं की गंगा से सारा वक्षस्थल भीग रहा था। ठीक इसी समय दर्शकों की भीड़ चीरता हुआ एक बूढ़ा आदमी चबूतरे पर आकर खड़ा हो गया। पूछा- ‘यह क्या हो रहा है?’

  1  2  3  4  
  आनंद वर्द्धन
एफ-5/64 चार इमली
भोपाल
anandsharma_64@yahoo.co.in
 
         
Bookmark and Share
टिप्पणी लिखें
 
वाक्यांश खोजें




Bing


Site Search Site Search
लेखागार (Archive)
लेखक की प्रविष्टियाँ

RoboForm: Learn more...