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कई रंगों में रंगा विकलांग रचनाकार : वीरेंद्र

प्रकाशन :रविवार, 13 नवम्बर 2011
निर्मला पुतुल

साहित्यिक रचनाओं पर जो संवेदना, भावना और मर्म उभर कर आयी है, वो ऐसे वर्ग के पात्र हैं, जिनके जिंदगी का दायरा खटने और जीने के संघर्ष सीमा को न पार कर सका और न जिंदगी के रंगिनियों का मर्म इनके तक पहुँच सका। जिस मिट्टी में रम गये, यही मिट्टी इनका श्रृंगार बन गया। इन्होंने समाज में अपने अनुभूतियों से जीने के ललक का बीज बो दिया। ऐसे पात्रों से रात-दिन, गाँव, कस्बे, शहर, सड़क, पगडंडियों में मुठभेड़ होते रहते हैं। हँस कर दो वाणी-बात बोलते हैं। इनके भी आंसू हैं। दिलों में सात्विक खुशियों के हिलारें भी हैं। कठिन जिंदगी को इन्ही दो संवेदनाओं, भावनाओं से काट लेते हैं। अमरीकी कवि कार्ल सेंडबर्ग ने अम्ब्राहम लिंकन के जमाने में ऐसे पात्रों की गाथा अपने कविताओं में लाया था। 1916 में ‘शिकागो पोइम्स’ से अंतिम जीवन तक ऐसे लोगों को लिखते रहे।

2008 में पहली प्रकाशित पुस्तक ‘नागपुरी भाषा-शिक्षण और साहित्य’ हिन्दी-नागपुरी में तथा 2009 में पहली कविता संग्रह ‘हिमइत न हार’, नागपुरी में आयी है। इन कविताओं में ऐसे ही लोंगों के दुःख-सुख की बात है। कुछ विद्रोह के महापुरुषों के नाम सम्बोधित है और कुछ कवितायें झारखंडी जनता के जागरण से प्रेरित है। बाकी आम आदमी का अनंत पीड़ा है। इनके कथा में औरतें रूप् सुंदरी नहीं हैं और न प्रेम में पगी। हाँ, खटना ही अवलम्बन है जीने का। घर, बच्चा, अपना मर्द और गांव इलाका जिंदगी का सीमा है। लेखिकाओं के लेखन में नारीवादी विमर्श या कहिये की वर्चस्ववादी पुरुषों का नारियों पर की गई यातना के अनंत कथायें हैं। लेकिन वो औरतें नहीं हैं। वो खटने-कमाने के कठिन राहों के साथ यातना, अवहेलना, मान-अपमान सब कुछ लपेटते चलती है और अपनी सीमा के खोह में बैठ जाती हैं। किसी से शिकायत नहीं करती। वो कहती हैं शिकायत अपनी किस्मत से।

ठनकी ‘चमरा’, कहानी में एक धांगर की जिंदगी का अभिव्यक्ति है। चमरा का न घर है और न परिवार। पर गांव है, मालिक और मालकिन है, जिन्हे सच्चे मन से नाना और नानी के रिश्ते से बांध रखा है। अधपगला सा आदमी, जिसके सामने काम ही काम है। पर इसकी इच्छायें भी हैं। गांव के लोग इसके बातों से मनोरंजन करते हैं। कभी-कभी दिल छू लेने जैसी बात करता है। नानी जितना डांटती-फटकारती है, उतना ही उसके प्रति दया भाव भी है। नानी का फटकार सहत-सहते एक जगह अपने मर्म को उकेरते हुए कहता है - ‘बुझायला, तोहरे मोके जीये नइ देबा।’ दरवाजे से ठोकर खाकर नानी मर जाती है तो वह दहाड़मार कर रोता है। उसके सारे दिनचर्या थम सा जाता है। ‘आब मोके बिहाने-बिहान के जगाय।’

सात नागपुरी में कहानियों का संग्रह तैयार किया है बीरेन्द्र कुमार महतो ने, जो प्रकाशित होने को है। ये कहानियां नागपुरी के धारा-प्रवाह में ग्रास रूट की कहानिया हैं। इनकी कविता संग्रह ‘हिमइत न हार’ के कविताओं का कुछ अंश देखिये,

‘गउ-गधा लखे सोझा/हेकी हाम हंसा जोड़ी/मगिर तनि सँलसत में सोच नि/ए संगी मोर/हंसी-खुसी, रीझ-रंग में/दुइयों संग आही/जदि/काइल चुप होय जामूँ हर हमेसा ले/तो सोच नि संगी/का होवी...?’

ऐहे इंसाफ हेके शीर्षक कविता का एक अंश, ‘मोयँ बनेक वाला रहों/मंदिर कर सोभा/मुदा बनाय देलयँ देखा/मोके भट्ठी घरे/चुलइया कर पयँटी-पेयाला/हे बुरू सींगबोंगा/काले बनाले तोयँ मोके/अइसन अबला जनाना।’

इनके अन्य विधाओं पर चर्चा कर रहा हूँ, जो इन्हें ख्याति दिलायी। वो है कठपुतली नाच जिसे शायद अंग्रेजी में पपेट भी कहते हैं। झारखंड का पहला कठपुतली फिल्म ‘अक्षर की बरसात’ और ‘100 दिन मिलेगा काम’। इसमें इन्होंने खुद कठपुतली निर्माण, संचालन और कठपुतली निर्देशन किया। 2004 में, लोक कला पर इनके कार्टून पोस्टर ‘गलती किसकी’ और मिनी कॉमिक्स ‘पछतावा’ को वर्ल्ड कॉमिक्स फिनलैंड के अध्यक्ष लैफ पैकलिन एवं मैथी ने सर्वश्रेष्ठ चुना, और इन चुने हुए कार्टून पोस्टर और कॉमिक्स का फिनलैंड में प्रदर्शनी भी लगाया गया। सितंबर 2003 में ‘अभिशासन हेतु लोक कलाओं की भूमिका’ पर हरियाणा में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में कठपुतली कला का प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन पर जामिया-मिलीया मास कम्यूनिकेशन के छात्रों द्वारा डॉक्यूमेंट्री बनायी गयी। झारखंड, बिहार, हरियाणा और राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्त्ताओं को लुप्त होती लोक कला ‘कठपुतली’ को बनाने और चलाने का प्रशिक्षण दे चुके हैं। ये भारत वर्ष के संभवतः पहले युवा व्यक्ति हैं जिन्होंने रांची स्थित संत मिखाईल नेत्रहीन स्कूल के छात्रो को कठपुतली बनाने और चलाने का प्रशिक्षण दिये। 2003 से 2007 तक सूचना-प्रसारण मंत्रालय के गीत एवं नाट्य विभाग रांची में बतौर पंजीकृत कलाकार राज्य एवं राज्य के बाहर कठपुतली के माध्यम से सरकारी और गैर-सरकारी योजनाओं को बताने व पहुंचाने का काम किया।

कठपुतली, कार्टूनिस्ट, पेंटिग, नाट्य अभिनय और लेखन के साथ ही साहित्य रचना में अथक प्रयास का फल है कि अब साहित्यकार और कलाकर्मी बीरेन्द्र कुमार महतो को जानने-पहचानने लगे हैं। आमजन के बीच धीरे-धीरे जगह बनने की संभावनायें उभर आयी है। इस रचनाकर्मी ने एक साथ कई विधाओं को चुन-चुन कर कठिन कामों को ले कर बढ़ा। जिस दिलेरी और धैर्य के साथ अपने कामों को अंजाम देता है, जो चर्चा-अचर्चा के सतह पर आ निकला।

ऐसे बीरेन्द्र कुमार महतो से कई अवसरों पर दिल्ली और रांची के कार्यक्रमों में मिलने और एक साथ रहने का मौका मिला है। इनका भोलापन इनके आंखों में झलकती है। चेहरे में अदम्य मेहनत की क्षमता ही इतने विधा को लेकर कयास चल रहा है। मित्रों के साथ व्यवहार में एक कलाकार चरित्र उभर कर सामने आता है। इनकी मातृभाषा ही प्रेरणा का स्रोत है। पैरों से असमर्थ होने के बाद भी इन्होंने इसे अपना कमजोरी नहीं बनने दिया। इनकी यही दृढ़ इच्छाशक्ति और हमेशा कुछ नया करने की तमन्ना से आगे बढ़ने का रास्ता प्रशस्त हो रहा है। इनके संवेदना का दाद मानिये कि कला-साहित्य के रचनाकरों का केन्द्र बिन्दु सर्वहारा क्लास का दुःख-दर्द और अंजुलि भर खुशियां है। बीरेन्द्र कुमार महतो बत्तीस वर्ष के उम्र में रचना के एक पड़ाव पर पहुंचे हैं और कई पड़ाव इन्हें पार करनी है।

2005 में कठपुतली कला के क्षेत्र में सराहनीय योगदान के लिए ‘झारखंड रत्न प्रोत्साहन सम्मान’ तथा 2010 में नागपुरी भाषा-साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष कार्य करने के लिए ‘पीटर शांति नवरंगी हीरानागपुर साहित्य सम्मान’ और झारखण्ड सरकार दवारा बिकासात्मक आलेख पुरस्कार -2011 से सम्मानित किया गया। धन्यवाद के पात्र हैं कई रंग में रंगा रचनाकार। नागपुरी पत्रिका ‘जोहार सहिया’, ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’, ‘जोहार दिशुम खबर’ में उपसंपादन के साथ-साथ नागपुरी पत्रिका ‘गोतिया’ और पाछिक समाचार पत्र 'छोटानागपुर एक्सप्रेस ' का संयोजन और संपादन करते हैं। 'इंकलाबी नवजवान लेखक संघ' और 'झारखण्ड जर्नलिस्ट एंड प्रेस असोसिअसन' के सचिव के रूप में जिम्वारी निभा रहें हैं. नागपुरी के भाषाविद् हैं और समर्पित हैं। कहीं-कहीं रचना में अपने दर्द को कला में समर्पित किया है और जीवंत हो उठी है रचना।

  निर्मला पुतुल
 
         
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