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हिन्दी के चलते हिन्दी पेशेवर रंगमंच असंभव है

प्रकाशन :शनिवार, 24 सितम्बर 2011
मुद्राराक्षस

संस्कृत भाषा में दुनिया के बेहतरीन नाटक लिखे गये थे और हिन्दी साहित्य को संस्कृत साहित्य की वही परंपरा मिली थी।

उसी परंपरा से जुड़ कर मध्ययुग और आधुनिक काल में काफी हद तक स्तरीय काम हुआ है। आखिर वह परंपरा हिन्दी में नाटकों की दुनिया में क्यों नहीं कोई स्तरीय काम कर सकी? हिन्दी में नाटक लेखन इतना दरिद्र क्यों बना रहा? हिन्दी अधिकांशत: आत्ममुग्ध समुदाय की भाषा रही है। गांवों में एक कहावत है, हल की पाई तींगनी खेती भई अटल्ल यानी एक गरीब आदमी को सड़क पर हल में लगने वाली लकड़ी की एक मेख मिल गई। वह सोचने लगा अब हल का एक फाल मिल जायगा फिर हल और फिर खेत और इस तरह वह खेती भी करने लग जाएगा। हिन्दी संसार लगभग इसी स्थिति में रहा है।

अंगरेजी भाषा की चर्चा यहां नहीं ही की जाय तो बेहतर होगा क्योंकि हिन्दी की दुनिया में जिस वक्त अध्यात्म हावी था, अंगरेजी में शेक्सपीयर जैसे नाटककार हो रहे थे। उन्नीसवी सदी में हिन्दी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हुए जो अंगरेज शासकों के घोर चाटुकार थे और नाटक भी लिख रहे थे। भारतेन्दु के नाटक जिस वक्त लिखे जा रहे थे और खुद भारतेन्दु ही उन्हें मंचित कर रहे थे, उससे लगभग दो-ढाई दशक पहले उर्दू भाषा में पारसी रंगमंच का बड़ा आन्दोलन शुरू हो चुका था। भारतेन्दु ने निश्चय ही शेक्सपीयर के नाटकों के बारे में सुना होगा या यहां अंगरेजों द्वारा लाये शेक्सपीयर थियेटर का मंचन भी शायद देखा होगा। लेकिन उस सब का प्रभाव उन्होंने अपने से दूर रखा। उनके विषय अधिकांशत: हिन्दू मिथक थे लेकिन रंगलेखन के नजरिए से खासे ही स्तरहीन थे। भारतेन्दु के नाटकों के मंचन भी अपनी जड़ें जमा नहीं सके। थोड़े से प्रदर्शन ही हो पाए।

इसके विपरीत भारतेन्दु से काफी पहले उर्दू की दुनिया ने पारसी व्यावसायिक रंगमंच की शुरुआत कर दी थी। निश्चय ही वह अंग्रेजों द्वारा भारत में लाये गये शेक्सपीयर थियेटर का अनुसरण था लेकिन ऐसा प्रयास था, जिसने देश में एक बड़ा, देशव्यापी और कलाधर्मी आन्दोलन पैदा कर दिया था। उस वक्त उर्दू में नहीं गुजराती भाषा में पारसी नाटक मंडली और जोरोस्ट्रियल थियेटर कंपनी ने अपनी प्रस्तुति व्यावसायिक स्तर पर शुरू की और वह कामयाब भी हुई थी। अवाम पारसी थियेटर की प्रस्तुतियों को टिकट खरीद कर प्रस्तुति देखता था। यह सौभाग्य हिन्दी रंगचर्या को कभी नहीं मिला। थोड़े ही समय बाद गुजराती भाषा में शुरू हुए इस पारसी रंगमंच ने उर्दू भाषा अपना ली क्योंकि पारसी रंगमंच की व्यावसायिक जरूरत थी कि वह देश के वृहत्तर जनसमुदाय तक पहुंचे और उस वक्त तक उर्दू देश की सबसे बड़ी और स्वीकार्य जनभाषा का रूप ले चुकी थी। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में तो प्रशासन, सेना, पुलिस और अदालतों का सर्वस्वीकृत माध्यम उर्दू हो चुकी थी। हिन्दी खड़ी बोली उस तरह फैल नहीं पाई थी। अवाम उर्दू के अलावा दूसरी जन भाषाएं जैसे अवधी, ब्रज, भोजपुरी आदि प्रयोग में लाता था।

अवाम के बीच व्यावसायिक रंगकर्म ले जाने के लिए पारसी थियेटर ने हिन्दी खड़ी बोली की जगह उर्दू को अपना माध्यम बनाया। यह उर्दू भाषी रंगमंच देश के हर भाग में, यहां तक कि पूर्वी देशों में भी अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। पारसी थियेटर की कंपनियों की लोकप्रियता की सीमा यह थी कि कई जगह उन्हें हीरों से जड़े हुए ताज भेंट किये गये। नारायण प्रसाद बेताब जैसे नाटककारों को उस वक्त तीन सौ रुपये महीना वेतन मिलता था। सवाई गंधर्व जैसे अप्रतिम गायक उसी आन्दोलन की देन थे। पारसी थियेटर ने अभिनेताओं की एक कतार ही पैदा कर दी थी। यह काम हिन्दी में नहीं हुआ। तमाम कोशिशों और अल्काज़ी जैसे रंगकर्मियों के बावजूद हिन्दी में पेशेवर रंगमंच नहीं बन पाया।

इसके जिम्मेदार हिन्दी लेखकों की कुछ भ्रांतियां भी हैं। जयशंकर प्रसाद मानते थे कि वे अवाम के स्तर तक नहीं जाएंगे, अवाम उन तक आये। आखिर गालिब ने यह क्यों नहीं कहा था और अवाम में उनकी पैठ प्रसाद से हजार गुना क्यों हुई? हिन्दी क्षेत्र में एक और रंगचर्या जनमी और अत्यधिक लोकप्रिय हुई और आज भी है- नौटंकी। नौटंकी उर्दू भाषा का रंगान्दोलन है और पारसी रंगमंच की तरह ही लोकप्रिय। इसका श्रेय भी उर्दू को जाएगा। हमें समझना होगा कि हिन्दी के चलते हिन्दी पेशेवर रंगमंच असंभव है।

  मुद्राराक्षस
78, दुर्विजयगंज, लखनऊ
फोन- 0522-2619417
 
         
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