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नए लेखक की समस्याएं

प्रकाशन :सोमवार, 7 फरवरी 2011
अज्ञेय

ए साहित्य में नए लेखक और पाठक दोनों को रुचि होना स्वाभाविक है। पर आज हम नए साहित्य की बात करते हैं, क्या सचमुच नया साहित्य ही हमारे ध्यान में होता है वह साहित्य जो आज इस समय लिखा जा रहा है, या कल लिखा जावेगा? या कि आज नए साहित्य की चर्चा करते समय भी हमारी दृष्टि वास्तव में आज से बीस-पचीस वर्ष पहले के साहित्य पर ही जमी होती है? (हमारी यानी समकालीन साहित्य में रुचि रखने वाले की, उन प्राध्यापकों की नहीं जो भारतेंदु से इतर देख ही नहीं सकते!)

नए साहित्य, नए साहित्यकार की समस्याओं पर विचार करने के लिए सबसे पहले इसी स्थिति का सामना हमें करना चाहिए। क्योंकि अगर हमारे सामने नया साहित्यकार ही यथार्थ नहीं है तो उसकी समस्याएं कैसे यथार्थ हो सकती हैं?

आज के हिंदी साहित्य क्षितिज की तुलना सन् 35 के क्षितिज से करें तो यह बात स्पष्ट हो जावेगी। ‘प्रसाद’, मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद, सुदर्शन ये उस समय के बुजुर्ग थे; ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी ये उभरकर सामने आ गए थे और इनके कृतित्व में हिंदी की उज्जवल संभावनाएं स्पष्ट दीख रही थीं। और इनके पीछे बिना किसी अंतराल के अनेक समर्थ और प्रतिभाशाली नए लेखक आ रहे थे: जैनेंद्रकुमार, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, ‘बच्चन’, ‘दिनकर’ और भी अनेक नाम गिनाए जा सकते हैं, पर यहाँ पर गणना हमारा उद्देश्य नहीं है। कहने का अभिप्राय यह कि साहित्यिक जीवन का प्रत्येक स्तर गतियुक्त था, ऊपर से नीचे तक एक अटूट प्रवहमानता लक्षित होती थी, साहित्यकार आशा और उत्साह से आगे बढ़ रहा था और नए तथा पुराने साहित्यकार के बीच संपर्क और सहानुभूति का एक सूत्रा भी था। और आज? उस दिन के उठते हुए साहित्यकार आज के प्रतिष्ठित लेखक हैं: पर उनके आगे? सन् 1935 के बुजुर्गों के बाद हम जिनके नाम लेते थे आज भी उन्हीं के नाम लेते हैं यद्यपि बाद वाले भी बुजुर्ग हो गए हैं: और उनके आगे जब नए नामों की बात होती है तो चुप रह जाते हैं, या अचकचा कर एक दूसरे की ओर देखते हैं, या कोई युवतर लेखकों के नाम लेने का उपक्रम करता है तो मुँह बिचका देते हैं...

तो क्या हिंदी साहित्य खत्म हो गया? क्या उसकी संभावनाएं चुक गयीं? क्या निराशा के सिवा हमारे पास देने को और नयी पीढ़ी के लिए पाने को और कुछ नहीं रहा? या कि साहित्य में नयी पीढ़ी ही अब नहीं होगी?

लेकिन तब और अब की तुलना को कुछ और बढ़ावें। कदाचित् उसी में से इस विषम स्थिति के कारण हमें मिल सकें और उसके सुधार के लिए कुछ प्रकाश।

सन् 1930-35 का युवक अपने बुजुर्ग़ों की पीढ़ी से ईर्ष्या नहीं करता था: ईर्ष्या की उसे ज़रूरत नहीं थी। उसके मन में यह बोध स्पंदित होता रहता था कि आगे शीघ्र ही कुछ बहुत बड़ा होने वाला है, जिसमें वह भाग लेगा; उसका जीवन बराबर आशा और अनागत के आह्नान से भरा था। लेकिन आज का युवक जानता है कि पीछे कुछ ही पहले बड़ी-बड़ी बातें हो चुकी हैं: और जब वह अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी की ओर देखता है तो कुछ इस भाव से कि उन महान घटनाओं में इन लोगों ने भाग लिया था। इससे वह यह भी अनुभव करता है कि वह उन घटनाओं से अलग है, उच्छिन्न है और पिछली पीढ़ी के प्रति एक ईर्ष्या भी उसमें भर जाती है। ‘वैसी घटनाएं अब फिर नहीं होंगी’ बहादुरशाह और सन् ’57 के बाद से इस शती के दूसरे-तीसरे दशक तक उर्दू पर जैसा प्रत्यवलोकी नशा छाया रहा था, जिसका मुख्य लक्षण था गिरती बादशाही और नवाबों के दिन का स्मरण करके स्वयं अपने पर अपनी करुणा को चुका देना, उसे ध्यान में रखें तो आज के युवा लेखक का उच्छिन्न भाव समझ में आ सकता है। कुछ तो जिन घटनाओं की बात वह सोचता है वे इतनी विराट और अद्वितीय रहीं कि उसका यह मान लेना स्वाभाविक है कि वे दोबारा न होंगी और इसलिए वह वंचित ही रह गया; पर उच्छिन्न अनुभव करने का एक दूसरा कारण भी है। वह है पिछली पीढ़ी और इस पीढ़ी के व्यक्ति के अपने समाज से संबंध में परिवर्तन। संपन्न होना आवश्यक नहीं है, न वर्ग स्वार्थों से आत्मसात् होना ही आवश्यक है; लेकिन अभिजात साहित्यकारों में एक सहज आत्मविश्वास और आत्मगौरव की भावना होती थी जो उनके लेखन में भी अभिव्यक्त होती थी और उसे एस शालीनता देती थी। उदाहरणतया जवाहरलाल नेहरू के लेखन में वह शालीनता रही; जब वह विद्रोह और विप्लव की बात कहते थे तब भी उसके मूल में यह भावना रहती थी कि वह स्वयं उच्छिन्न नहीं है, कि समाज में उनकी गहरी जड़ें और समाज के गठन में, उसके स्थायित्व में, उनका स्थान है। अभिजात साहित्यकार शासनप्रिय न हो, व्यवस्था विरोधी भी भले ही हो, अधिकार के लंबे अभ्यास का वातावरण उसे एक गुरुता और आत्मविश्वास देता था। यही बात एक दूसरे रूप में और दूसरे स्तर पर मैथिलीशरण गुप्त में देखी जा सकती है। वह भी समाज से ‘उखड़े हुए’ नहीं हैं, न कभी वैसा अपने को समझते रहें उनके व्यक्ति जीवन की जड़ें भी समाज में बहुत गहरे तक रहीं और परंपरा संपृक्त होने का यह बोध बराबर उन रचनाओं में स्पंदित होता रहा। और जड़ों का, ‘स्थापित’ होने का यह सजग बोध, न केवल आत्मविश्वास देता है बल्कि स्वाधीन भी करता है ऐसा साहित्यकार तात्कालिक परिस्थिति से और दैनंदिन परिवर्तनों से ही शासित न होकर एक स्वतंत्रा, असंपृक्त विवेक बनाए रख सकता है।

इसके विपरीत आज का साहित्यकार अनुभव करता है कि उसकी कहीं जड़ें नहीं हैं, वह उच्छिन्न और अनाधार है; और इस प्रकार वह तात्कालिक परिस्थिति का खिलौना बन जाता है। ऐसा न होता, तो साहित्य में ऐसी स्थिति की कल्पना भी असंभव थी जिसमें निकट या दूर, देश या विदेश में कहीं कोई घटना होते ही सारा साहित्यिक कृतित्व मानो बटन दबाकर उधड़ मोड़ दिया जाए। (यह नहीं कि हिंदी में ऐसा हो गया है और शायद कभी हो भी नहीं; पर ऐसे दल हैं जो मानते हैं कि ऐसा होना चाहिए, जो यह स्थिति लाना चाहते हैं और बाहर नहीं तो अपने दल के इने-गिने ‘साहित्यिक’ पत्रों में ऐसा अभ्यास भी करते हैं।)

यह ‘निर्गृहता या निर्मूलता’ नए लेखक की पहली समस्या है। यों अगर यह परिस्थितिजन्य तथ्य है तो इसका यह इलाज बताना तो व्यर्थ होगा कि ‘जड़ें होनी चाहिए’, पर इस स्थिति के जो ख़तरे हैं, उनसे सतर्क कर देना लाभकर हो सकता है। ख़तरे दो दिशाओं में हैं। एक को इंगित हम ऊपर कर चुके: नया साहित्यकार अपने को तात्कालिक परिस्थिति के प्रति समर्पित कर दे सकता है। युगधर्म के नाम पर क्षण धर्मी होकर एक ख़तरनाक क़िस्म का अवसरवादी हो जा सकता है और अपनी चिंतन की स्वाधीनता खो दे सकता है। दूसरा ख़तरा दूसरी दिशा में है। वह अतीतोन्मुख होकर फिर एक बीती हुई परिस्थिति को लाना चाह सकता है, एक रूमानी लालसा उसे रूढ़िवादी ही नहीं बल्कि प्रतिक्रियावादी बना दे सकती है। पहला ख़तरा एक प्रकार का आत्मसमर्पण है, दूसरा एक दूसरे प्रकार का। अंत दोनों का है व्यक्तित्व की पराजय और मानसिक दासत्व।

दो

एक और दृष्टि से भी यह तुलना उपादेय है। सन् 1930-35 का साहित्यकार यहाँ हम उस समय के बुजुर्ग की बात नहीं, उस समय के युवक साहित्यकार की बात कह रहे हैं विद्रोही और परिवर्तनकामी था, पर अपने प्रति उत्तरदायी रहते हुए। वह मानता था कि सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं में व्यक्ति का हस्तक्षेप उन घटनाओं की दिशा को प्रभावित कर सकता है और उसे वैसा करना चाहिए। यह ‘चाहिए’ की भावना नैतिक थी और नैतिकता का आधार व्यक्ति धर्म था। उदाहरणतया युद्धारंभ के बाद जो ‘फ़ास्स्टि विरोधी लेखक सम्मेलन’ दिल्ली में हुआ था, वह प्रगतिवादियों का सम्मेलन नहीं था, न प्रगतिवादी दल की प्रेरणा से ही हुआ था। प्रगतिवादियों ने भी उसमें भाग लिया था अवश्य; और उसके दौरान में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ का एक अलग खंड सम्मेलन भी किया था जिसमें सदस्येतर लोग नहीं बुलाए गए थे; पर ‘फ़ासिस्ट विरोधी लेखक सम्मेलन’ मूलतः ऐसे ही व्यक्तियों का सम्मेलन था जो एक नैतिक प्रश्न पर तटस्थ न रहकर अपनी नैतिक सहानुभूति स्पष्ट प्रकार करना चाहते थे एक राजनीतिक दल या संगठन के रूप में नहीं बल्कि स्वाधीन चिंतकों के रूप में।

लेकिन आज का युवक लेखक इस अर्थ में उत्तरदायी नहीं है यानी वह अपने प्रति उत्तरदायी नहीं है और उसकी दायित्व भावना का आधार नैतिक नहीं है। आज या तो वह किसी दल का सदस्य है और दल के प्रति उत्तरदायी है और यह दायित्व नैतिक नहीं, राजनीतिक है जहाँ उसका अपना विवेक दल की नीति से मेल नहीं खाता वहाँ दल को नहीं, विवेक को छोड़ना ही सुसदस्यता है! या फिर, यह अनुभव करके और ठीक अनुभव करके, कि विवेक का ऐसा उत्सर्ग एक मानसिक दासता होगी, वह दलों से तो अलग रहता है पर अपनी अकिंचनता से किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। सत्तालोलुप, सत्तापूजक दलों में बँटे हुए जगत में वह इस विश्वास को बनाए नहीं रख पाता कि उसकी नैतिक मान्यताएं सामाजिक-रानजीतिक जीवन को प्रभावित कर सकती हैं। वह देखता है कि एक ओर किसी दल का पक्ष लेने का मतलब है व्यक्तित्व खोकर लय हो जाना, अर्थात् एक नैतिक इकाई के रूप में अपनी सत्ता खो देना, तो दूसरी ओर स्वतंत्रा रहना चाहने का मतलब है अकिंचन हो जाना, न कुछ हो जाना, और जो न कुछ है उसकी नैतिक भावना भला विश्वशक्तियों पर क्या प्रभाव डालेगी? इस प्रकार निःसहायता की एक भावना से वह राजनीति को आत्मसमर्पण कर देता है और बह जाता है। यह उसी आधारहीनता का दूसरा पहलू है। आज के लेखक की स्थिति पुरानी पीढ़ी की ही नहीं, बीच की पीढ़ी की अपेक्षा में भी जटिलतर है।

तीन

पुरानी पीढ़ियों की करुणा की जड़ में जीव-दया की भावना थी। बीच की पीढ़ी ने दया को एक नए रूप में देखा: एक सामाजिक उत्तरदायित्वों के रूप में; उसकी करुणा सामाजिक चेतना के रूप में प्रकट हुई। दोनों विश्वयुद्धों के बीच का अंतराल इस रूपांतर का काल है: मानवीय करुणा के सामाजिक चेतना में परिवर्तित होने का काल। ग़रीब को सहानुभूति दी जाने लगी, इसलिए नहीं कि वह ग़रीब है वरन् इसलिए कि वह सामाजिक उत्पीड़न का शिकार है। इस काल का समूचा लेखन एक नए प्रकार की सजग करुणा का लेखन है। और वह करुणा उस व्यक्ति या समाज के प्रति अकरुण भी रही जो ग़रीबी के सामाजिक पहलू को नहीं देखता रहा।

एक ओर मानवी करुणा सामाजिक चेतना बनी, तो दूसरी ओर वह एक नए अर्थ में मानवीय हुई क्योंकि वह मानव पर केंद्रित हुई। जीव-दया के आदर्श में मानव और मानवेतर का भेद प्रखर रूप से सामने आया और उत्पीड़ित मानव की सहायता तथा बंदरों-चींटियों को आटा खिलाने में न केवल एक मौलिक गुणात्मक भेद देखा गया बल्कि एक विरोध भी: दूसरे से पहला न केवल बेहतर था, बल्कि दूसरा अपराध था क्योंकि वह पहले में बाधक था।

यहाँ तक तो, ख़ैर, ठीक है। लेकिन आज फिर एक नयी स्थिति सामने है। केवल ग़रीब ही उत्पीड़ित नहीं है: केवल ग़रीब ही सहानुभूति का पात्रा नहीं है। आज बल्कि वह निम्न मध्यवर्ग ही, जिसे हमें उत्पीड़कों का गुरगा मानना सिखाया जा रहा था, अधिक उत्पीड़ित और सहानुभूति का पात्रा है। (निःसंदेह विघटित होते हुए अभिजातवर्ग में भी करुणा के पात्रा होंगे, पर उनकी बात हम नहीं कहते क्योंकि समूचे वर्ग के बारे में ऐसी साधारण स्थापना नहीं की जा सकती।) आज सन् 1930-35 का लेखन एक नए रूप में दीखता है और अचरज पैदा करता है। और उस समय का गंभीर मानवीय सत्य आज एक पार्टी का नारा मात्रा रह गया है; आज का गंभीर मानवीय सत्य उसमें नहीं समा रहा है, कोई भले ही अपने नारों से अपने को ही ऐसा चकरा ले कि आगे कुछ सोच न सके।

यह एक और प्रश्न है जिसका उत्तर नयी पीढ़ी के साहित्यकार को पाना है। वह अपनी करुणा किसको दे? ग़रीब के वर्ग को, जो ग़रीब तो है ही? या निम्न मध्यवर्ग को, जो ग़रीब से किसी तरह कम कष्ट में नहीं है? या कि समूची मानवता को वह करुणा के पात्रा मान ले जो स्वयं एक ख़तरनाक सिद्धांत हो सकता है? या फिर वह मानवता के प्रतीक स्वयं अपने को ही करुणा का परम पात्रा मान ले जो कि पराजय की इति है!

बीच की पीढ़ी एक प्रश्न को लेकर बहुत चर्चा करती थी: कस्मै देवाय हविषा विधेम? आज यह प्रश्न कोई नहीं पूछता। न उसे उठाया ही जा सकता है। इसलिए नहीं कि ‘कस्मै’ का अंतिम उत्तर हमने पा लिया है: इसलिए कि बाक़ी का पद निरर्थक हो गया है। ‘देवाय’ का कोई प्रश्न ही नहीं; ‘हविष्’ क्या हमारा नैतिक चिंतन अधिक मूल्यवान है, या हमारा राजनीतिक कर्म? ‘विधेम’ जब हमारा कर्ता होना ही संदिग्ध है तो हम उत्तम पुरुष में बात ही क्यों करें, दल का जो विधेय हो!

चार

नए लेखक के स्वाधीन विकास में स्थिति की बाधाएं और भी हैं। पिछले 40-50 वर्षों में कई साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं आरंभ हुईं और बंद हुईं। सब ‘दरिद्राणां मनोरथाः’ नहीं थीं, लेकिन विलीन सब हो गयीं; अगर एक-आध पत्रिका बची तो इसीलिए कि ‘साहित्यिक’ विशेषण का माह उसने छोड़ दिया। फिर भी, कुछ वर्ष पहले तक बराबर नए पत्र आते रहे, चाहे दो-चार अंकों के बाद ही बंद हो जाने के लिए! सर्जनोत्कंठा बराबर नहीं रही। साहित्यिक पत्र-जगत की अवस्था उतनी हीन कभी नहीं थी जितनी वह आज है। आज जो दो एक साहित्यिक पत्र निकलते हैं, उनके निकलते रहने का रहस्य ढँढ़ने चलें तो कदाचित् प्रत्येक के पीछे किसी एक आदर्शवादी की हठधर्मी से अच्छा कोई कारण न मिल सकेगा कम-से-कम यह तो कोई न कह सकेगा कि उसके ग्राहक इतने हैं कि वह आर्थिक दृष्टि से सफल है! ऐसी स्थिति में नए लेखक के लिए लेखनजीवी हो सकना तो लगभग असंभव है। यह नहीं कि पहले स्वतंत्रा लेखनजीवियों की संख्या बहुत अधिक रही, पर अब स्थिति और भी विकट हो गयी है। पत्र-पत्रिकाओं की अनुपस्थिति में लेखकों का सामने आना भी कठिन है; जो प्रतिष्ठित हैं उनकी बात छोड़ दें तो नयी प्रतिष्ठाएं बनना कहीं कठिन हो गया है, क्योंकि उसके लिए चर्चा, समीक्षाएं, वाद-विवाद इत्यादि आवश्यक हैं और पत्र-पत्रिकाओं की अनुपस्थिति में ये सब भी नहीं हो सकते। दलों के छोटे-मोटे स्थानीय पत्र अपने लाख उपयोग के बावजूद इस कमी को पूरा नहीं करते। रेडियो पर समीक्षा होती हैं, लेकिन एक तो उनका साधारण स्तर अख़बारों के रविवारीय क्रोड़़़पत्रों की आलोचना से ऊँचा नहीं होता; कुछ इसलिए और कुछ निरी वार्ता होने के कारण कोई उन पर ध्यान नहीं देता; दूसरे रेडियो पर भी प्रायः प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाओं की ही चर्चा होती है। रेडियो नयी प्रतिष्ठाएं नहीं बनाता, नयी प्रतिभा सामने नहीं लाता, केवल प्रतिष्ठित प्रतिभाओं का दोहन या शोषण करता है। हमारी धारणा है कि यह बात भारतीय रेडियो के समूचे इतिहास के बारे में निरपवाद सत्य के रूप में कही जा सकती है।

ऐसी स्थिति में नए लेखक के आगे मार्ग क्या है? शिक्षण, पत्रकारिता और सिनेमा के व्यवसाय, रेडियो, प्रकाशन और प्रचार के सरकारी विभागों की नौकरियां, सरकारी पत्रों का संपादन ये ही मार्ग उसके सामने खुले रह जाते हैं। थोड़ी बहुत संभावना कूटनीतिक पत्रकारिता के क्षेत्रा में हो सकती है विदेशी दूतावासों के प्रचार-प्रसार विभागों में। स्वच्छंद रहना बहुत कठिन हो गया है और क्रमशः कठिनतर होता जाता है क्योंकि जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएं भी इतनी महंगी हो गयी हैं। यह संकट भारत में ही नहीं, सर्वत्रा यही प्रश्न है। इंग्लैंड में भी लेखक अधिकाधिक सरकारी नौकर होते जाते हैं; अमेरिका में बहुत से लेखक ‘लेखन शिक्षक’ भी हो जाते हैं पर इस एक नए व्यवसाय की संभावना से बहुत अधिक अंतर नहीं पड़ता। रूस में तो सभी लेखक अनिवार्यतया सरकारी कर्मचारी हैं ही, नहीं तो प्रकाश में ही नहीं आ सकते। इस प्रकार सर्वत्रा साहित्यकार का ‘सरकारीकरण’ हो रहा है और इसका प्रभाव उसके मानसिक विकास पर होना स्वाभाविक है। वह क्रमशः अधिक आसानी से अपने को स्वाधीन व्यक्ति के रूप में नहीं, एक संस्था के कर्मचारी के रूप में देखता है। जिस प्रकार दलनिष्ठा उसके स्वतंत्रा विवेक को सीमित करती है, उसी प्रकार संस्थानिष्ठा भी। किसी लेखक ने नहीं अनुभव किया होगा कि कल का स्वाधीन साहित्यसृष्टा आज का रेडियो कर्मचारी या प्रकाशक का सलाहकार बनकर, अपनी संस्था के दृष्टिकोण को संपूर्णतया अपनाकर, आज उसके पास कोई ऐसा प्रस्ताव लेकर आया है जिसे कल वह स्वयं आग्रह्य मानता था! सन् 1930-35 का साहित्यकार विद्रोह में भी अपने प्रति उत्तरदायी था; आज का संस्थानिष्ठ साहित्यजीवी ऐसे नैतिक दायित्वों के बग़ैर भी मज़े में चल सकता है। (बल्कि उनके बग़ैर ही मज़े में चल सकता है, उनको मानने में तो मज़ा किरकिरा हो जाएगा!)

पाँच

चित्र निःसंदेह काफ़ी अँधेरा है। लेकिन निराशाजनक नहीं। मैंने समस्या को उघाड़कर सामने रख दिया है; उसका हल तो नए लेखक को ही खोजना होगा। वह मेरा काम नहीं है। ऐसा इसलिए नहीं कि मुझे उसकी समस्या से सहानुभूति नहीं, वरन् इसलिए कि मैं जो भी कहूँ, वह ‘बाहर’ से मिली हुई सलाह ही हो सकती है और समाधान ‘भीतर’ से होना चाहिए। सलाह के तौर पर अपने अनुभव की दो-तीन बातें मैं कह सकता हूँ। एक तो यह, कि समस्या को आँख मिलाकर देख लेना भी उपयोगी है। उस में समाधान की जो माँग है, वही समाधान उत्पन्न करेगी। दूसरे यह, कि समस्या का रूप नया और जटिलतर होते हुए भी मूलतः समस्या वही है: एक स्वाधीन व्यक्तित्व का निर्माण, विकास और रक्षण। लेखक को वह स्थिति और वातावरण खोजना और गढ़ना है जिसमें स्वाधीन व्यक्तित्व पनप सके, उन साधनों को पाना और बनाना है जिनके द्वारा वह व्यक्तित्व अभिव्यक्ति हो सके। उसे न समष्टि में विलीन हो जाना है, न निरे स्वच्छंदतावाद में पलायित होना है; न सर्वसत्तावान स्वीकार करना है, न संपूर्ण अराजकता। वह उत्तरदायित्व मुक्त नहीं है। पर उसका उत्तरदायित्व न तो अधिकार की अभ्यस्त पुरानी पीढ़ी का अपने अधिकार के प्रति उत्तरदायित्व है, न परिवर्तनकामी बीच की पीढ़ी का अपने प्रति उत्तरदायित्व। उसका उत्तरदायित्व है स्वाधीन विवेक के प्रति यद्यपि मैं इसकी कठिनाइयां ही गिनाता आया हूँ! लेकिन अगर वही एक रास्ता है, तो उसकी कठिनता या दुर्गमता भी ऐसी बाधा नहीं हो सकती जिसे उलांघ न सकें। ‘नान्यः पन्था विद्यते?’ ‘शुभास्ते पन्थानः!’

 
         
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