- अगर
मेरे लेखन का दर्शन खोजा जाये, तो लोकतंत्र की रक्षा और तानाशाही का विरोध मेरे लेखन का सार है।
- मैं तब लिखना बंद कर देता हूं, जब मुझ़े लगता है कि मैं अब इसके साथ न्याय नहीं कर पा रहा हूं।
- मैंने कभी ऐसी कभी विकल्पहीनता नहीं देखी जो लेखक को लिखने से रोक सकती हो।
इस वर्ष के साहित्य के नोबेल से सम्मानित पेरु के साहित्यकार मारिया वारगास लोसा का जीवन वास्तव में विरोध के बीच से सामाजिकता की वकालत है। उनकी इसी वकालत की तस्दीक करते हुए नोबेल स्वीडिश अकादमी के यह शब्द कितने सही ठहरते हैं कि मारिया वारगास लोसा असल में स्पेनिश भाषा के नवलेखन तथा पारंपरिक लैटिन लेखकीय संदर्भो की अभिव्यक्ति में पुल का काम करते हैं। लोसा जैसे लेखक बहुत समय बाद पैदा होते हैं।
संघर्ष के इस सच को ढूंढ़ते हुए लोसा ने अपनी एक रचना में कहा था। जिस सच की तलाश में-‘मैं चला’। उस सच को ढूढ़ते हुए हर बार मैं ख़ुद से करता हूं मुकाबला। विद्रोह का। संघर्ष का। सच कहूं तो अपनी पहचान का। लोकतंत्र को ढूंढ़ते और तानाशाही को नकारते इस रचनाकार के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में दिये गये साक्षात्कार से लिया गया यह अंश:पुरस्कार मिलने के बाद आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी।
आप लोगों की इस धारणा से कितना सहमत हैं कि आपको यह पुरस्कार इसलिए मिला क्योंकि आपका राजनीतिक हस्तक्षेप ज़्यादा है?जहां तक पहली प्रतिक्रिया की बात है तो मैं इस सम्मान के लिए नोबेल कमेटी का आभार व्यक्त करता हूं। वास्तव में मैं ख़ुद इस सम्मान के प्रति कभी भी आश्वस्त नहीं था। मेरे लिए यह तोहफ़ा है। एक ख़ुशनुमा तोहफ़ा।
दूसरा सवाल राजनीतिक हस्तक्षेप का। मैं नहीं मानता कि साहित्यकार केवल कविता कहानियों तक सीमित होता है। वह किसी भी विषय पर लिख सकता है। मेरे राजनीतिक लेखन को अगर राजनीतिक हस्तक्षेप से जोड़कर देखा जाये, तो उसके लिए मैं कोई सफ़ाई नहीं दे सकता। आप यह सवाल नोबेल कमेटी से करिये। जब आपकी पहली पुस्तक प्रकाशित होनी थी तब आप वापस लैटिन अमेरिका लौट आये।
इसकी वजह क्या थी और आपके लेखन का दर्शन तलाशा जाये तो वह क्या होगा? बचपन में जो मेरा सोच का दायरा था उस पर मेरे दादा-दादी और मेरी मां का काफ़ी प्रभाव था। मेरे जीवन और सोच में एक बड़ा बदलाव तब आया, जब मैं मिल्रिटी स्कूल गया। वास्तव में यह मिल्रिटी स्कूल पेरू समाज का प्रतिबिंब था। इसके प्रतिबिंब में वह आक्रोश और भेदभाव झलकता था, जो उस समय पेरू समाज में व्याप्त था। पेरू के सभी ओर्थक वगरे के छात्र वहां सैन्य अनुशासन में रह रहे थे।
लेकिन दूसरी तरफ़ उसी जगह पर पहली बार मैंने तानाशाही का भी अनुभव किया। मेरे पिता ने मुझे मिल्रिटी स्कूल इसलिए भेजा, ताकि मैं लेखन के प्रति अपने झुकाव से विमुख हो सकूं। लेकिन जिस तानाशाही से मैं वहां नमूदार हुआ उससे मेरे लेखन को काफ़ी सामग्री मिली। अगर मेरे लेखन का दर्शन खोजा जाये, तो लोकतंत्र की रक्षा और तानाशाही का विरोध मेरे लेखन का सार है।
आप किस विषय पर सबसे ज़्यादा लिखना पसंद करते हैं। आपके बारे में कहा जाता है कि जब आप लिखते हैं तो अतिवादी हो जाते हैं?अगर ख़ुद मुझसे मेरे काम के आकलन के लिए कहा जाये तो मेरे लिए यह सबसे मुश्किल काम होगा। दूसरे के लेखन के बारे में मुझसे पूछा जाये,तो बेहतर। जैसा कि मैंने 1971 में कोलंबियाई लेखक ग्रैबिएल मॉरकीज की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ़ ए डिसाइड की एक लंबी समीक्षा लिखी थी। मैं तब लिखना बंद कर देता हूं, जब मुझ़े लगता है कि मैं अब इसके साथ न्याय नहीं कर पा रहा हूं।
हो सकता है कि वह स्थिति किसी के पक्ष में न जाती हो, तो लोगों को अतिवादी लगती हो। तब मैं या तो कुछ और लिखने लगता हूं। या फ़िर उस किताब अधूरा मानकर ही ताख पर रख देता हूं। क्या कभी आपको लगता है कि आपको लेखक न बनकर एक राजनेता बनना चाहिए था। तब शायद आप चुनाव लड़ते और देश की राजनीति में दिशा देने में सहयोग करते?मैं फ़ाबर्ट की एक पंक्ति दोहराना चाहूंगा कि लिखना जीने का ढंग होता है।
मेरे जीवन में भी कहीं- न- कहीं यह विचार पूरी तरह लागू होता है। अब मैं बिना लेखक की भूमिका के जीवन की कल्पना ही नहीं करता। इस तरह मेरे जीवन की धुरी अब मेरा लेखन ही है। यह बात सही है कि एक लेखक राजनीति से प्रभावित होता है।ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि राजनीति किसी को भी इस दिशा में संवेदनशील बनाती है ताकि वह अपने नागरिक अधिकारों और उसके प्रभावों के प्रति सजग होता है।
लेखक की रचना में जो बौद्धिकता और सुंदरता उभरकर आती है, वह पाठक के मन में ऐसा राग पैदा करती है जिससे पाठ इन संवेदनाओं की ओर खिंचता है। यही वजह है कि कुछ अपवादों को छोड़कर सभी तानाशाहों में साहित्य लेखन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की है। क्योंकि यह वास्तविकता है कि जिनके मन में साहित्य के प्रति अनुराग है उन्हें बरगला पाना मुश्किल है।आप अमेरिका की जार्ज टाउन यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफ़ेसर भी रहे हैं।
अध्यापन के दिनों में आपने अमेरिका को किस तरह महसूस किया।अमेरिका की जो सबसे बेहतर बात है कि अगर वहां की सरकार तानाशाही की राह पर या मानवता के ख़िलाफ़ चलती है। तो वहां की आम जनता इसके ख़िलाफ़ सड़कों के ख़िलाफ़ उतर आती है। बुश के शासन में हमने ऐसा कई बार देखा।हाल ही में आप प्रिंस्टन विश्वविद्यालय के छात्रों को फ़िलासिफ़ी ऑफ़ राइटिंग सिखाई।
इस तरह कई बार आप अध्यापक की भूमिका में दिखते हैं। इराक युद्ध के समय आप पत्रकार की भूमिका में दिखे। अपनी किस भूमिका से आप ज़्यादा संतुष्ट हैं। लेखक, अध्यापक या फ़िर पत्रकार?(हम्म) सोचते हुए- मैं ख़ुद को लेखक पहले मानता हूं, अध्यापक बाद में। हां, अध्यापन पसंद है, क्योंकि छात्रों के सवालों के दौरान कई छिपी परतें उघड़ कर सामने आती हैं। बेहतर साहित्य से केवल मनोरंजन ही नहीं, स्वस्थ मनोरंजन होता है।
साथ ही आपको यह उस परिवेश को समझने का मौक़ा भी देता है, जिसमें आप रहते हैं।वास्तव में एक लेखक को कभी भी ‘स्टैच्यू‘ नहीं होना चाहिए। मैं किसी भी ऐसे पुस्तक का हिमायती कभी नहीं हो सकता जो लाइब्रेरी में बैठकर लिखी हुई गयी हो। मैं जानना चाहता हूं कि आपके समाज में हो क्या रहा है।
इसी लिए मुझ़े पत्रकारिता पसंद है। तो भविष्य में हम आपको किस भूमिका में पायेंगे? मेरी सारी भूमिकाएं मेरे लेखन से ही निकलती हैं और उसे मैं नहीं छोड़ सकता। मैंने कभी ऐसी कभी विकल्पहीनता नहीं देखी, जो लेखक को लिखने से रोक सकती हो। अभी बहुत कुछ करना बाकी है।क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आपके पाठकों में महिलाएं ज़्यादा है? हंसते हुए। हां यह बात सही है। औरतों की तुलना में पुरुषों की पढ़ने की संख्या कम हो रही है।
इसका उदाहरण समूचे विश्व में मौजूद है। अगर मेरा साहित्य ज़िंदा है, तो महिला पाठकों की वजह से ही।


![Validate my Atom 1.0 feed [Valid Atom 1.0]](valid-atom.png)