मैं साहित्य
को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके और संवेदनशील न बना सके, उसे'साहित्य' कहने में मुझे संकोच होता है। मैं अनुभव करता हूँ कि हम लोग एक कठिन समय से गुज़र रहे हैं। आज नाना प्रकार के संकीर्ण स्वार्थों ने मनुष्य को कुछ अंधा बना दिया है कि जाति-धर्म-निर्विशेष मनुष्य के हित की बात सोचना असंभव हो गया है।
ऐसा लग रहा है कि किसी विकट दुर्भाग्य के इंगित पर दलगत स्वार्थ-प्रेम ने मनुष्यता को दबोच लिया है। दुनिया छोटे-छोटे संकीर्ण स्वार्थों के आधार पर अनेक दलों में विभक्त हो गयी है। अपने दल के बाहर का आदमी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। उसके तप और सत्यनिष्ठा का मज़ाक़ उड़ाया जाता है। उसके प्रत्येक त्याग और बलिदान के कार्य में भी 'चाल' का संधान पाया जाता है और अपने-अपने दल में ऐसा करने वाला सफल नेता भी मान लिया जाता है, परन्तु मेरा विश्वास है कि ऐसा करने वाला आदमी सबसे पहले अपना ही अहित करता है। बड़े-बड़े राष्ट्रनायक जब अपनी विराट् अनुचरवाहिनी के साथ इस प्रकार का गंदा प्रचार करते हैं, तो ऊपर से चाहे कितनी भी सफलता उनके पक्ष में आती हुई क्यों न दिखाई दे, इतिहास-विधाता का निष्ठुर प्रवाह भीतर ही भीतर उनके स्वार्थों का उन्मूलन करता रहता है।
इतिहास शक्तिशाली व्यक्तियों और राष्ट्रों की चिताभूमि को कुचलते हुए आगे बढ़ रहा है। फिर भी गंदे तरीके सुधारे नहीं गये हैं, बल्कि उनको और भी कौशलपूर्ण और प्रभावशाली बनाया जाता रहा है। जो लोग द्रष्टा हैं, वे इस गलती को समझते हैं; पर उनकी बातें मदमत्त व्यक्तियों की ऊंची गद्दियों तक नहीं पहुंच पातीं। संसार में अच्छी बात कहने वालों की कमी नहीं है, परन्तु मनुष्य के सामाजिक संगठन में ही कुछ ऐसा दोष रह गया है, जो मनुष्य को अच्छी बात सुनने और समझने से रोक रहा है। इसलिए आज की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि अच्छी बात कैसे कही जाए, बल्कि यह है कि अच्छी बात को सुनने और मानने के लिए मनुष्य को कैसे तैयार किया जाए।
साहित्य-सृष्टि और समाज
इसलिए साहित्यकार आज केवल कल्पना-विलासी बनकर नहीं रह सकता। शताब्दियों का दीर्घ अनुभव यह बताता है कि उत्तम साहित्य की सृष्टि करना ही सबसे बड़ी बात नहीं है। संपूर्ण समाज को इस प्रकार सचेतन बना देना परमावश्यक है, जो उस उत्तम रचना को अपने जीवन में उतार सके। साहित्यिक सभाएँ यह कार्य कर सकती हैं, सम्पूर्ण जन-मानस को उत्तम साहित्य सुनाने का माध्यम बना सकती हैं।
इस विशाल देश में शिक्षा की मात्रा बहुत ही कम है। जिन देशों में शिक्षा की समस्या का हल हो चुका है, उनके साहित्यिकों की अपेक्षा यहाँ के साहित्यिकों की ज़िम्मेदारी कहीं अधिक है। फिर, हमने जिस भाषा के साहित्य-भंडार को भरने का प्रण किया है, उसका महत्व और भी अधिक है। वह भारतवर्ष के केन्द्रिय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है। इसलिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विकास का वाहन बनाना है।
साहित्य सेवा और समाज
हम लोग जब हिंदी की 'सेवा' करने की बात सोचते हैं, तो प्राय: भूल जाते हैं कि यह लाक्षणिक प्रयोग है। हिंदी की सेवा का अर्थ है उस मानव-समाज की सेवा, जिसके विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम हिंदी है। मनुष्य ही बड़ी चीज़ है, भाषा उसकी सेवा के लिए है। साहित्य-दृष्टि का भी यही अर्थ है। जो साहित्य अपने-आपके लिए लिखा जाता है,उसकी क्या क़ीमत है, मैं नहीं कह सकता, परंतु जो साहित्य समाज को रोग, शोक दरिद्रता, अज्ञान तथा परमुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है। उसी महत्वपूर्ण साहित्य को हम अपनी भाषा में ले आना चाहते हैं। मैं मनुष्य की इस अतुलनीय शक्ति पर विश्वास करता हूँ कि हम अपनी भाषा और साहित्य के द्वारा इस विषम परिस्थिति को बदल सकेंगे।
हमें सावधानी से सोचना होगा कि हिंदी बोलने वाला जनसमुदाय क्या वस्तु है और वास्तव में वह परिस्थिति क्या है, जिसे हम बदलना चाहते हैं। काल्पनिक प्रेत को घूँसा मारना बुद्धिमानी का काम नहीं है। नगरों और गाँवों में फैला हुआ, सैकड़ों जातियों और संप्रदायों में विभक्त, अशिक्षा,दरिद्रता और रोग से पीड़ित मानव-समाज आपके सामने उपस्थित है। भाषा और साहित्य की समस्या वस्तुत: उन्हीं की समस्या है। क्यों ये इतने दीन-दलित हैं? शताब्दियों की सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक गुलामी के भार से दबे हुए ये मनुष्य ही भाषा के प्रश्न हैं और संस्कृति तथा साहित्य की कसौटी हैं!
जब कभी आप किसी विकट प्रश्न के समाधान का प्रयत्न कर रहे हों, तो इन्हें सीधे देंखे। अमेरिका या जापान में ये समस्याएँ कैसे हल हुई हैं, यह कम सोचें, किंतु असल में ये है क्या और किस या किन कारणों से ये ऐसे हो गए हैं, इसी को अधिक सोचें।
हमारी भाषा, साहित्य और राजनीति का उद्देश्य
बड़े-बड़े विचारकों ने इस देश के जनसमुदाय के अध्ययन का प्रयत्न किया है, अब भी कर रहे हैं; किंतु ये अध्ययन तो इन्हें अच्छी प्रजा बनाने के उद्देश्य से किए गए हैं या वैज्ञानिक कुतूहल-निवारण के उद्देश्य से। इनको इस दृष्टि से देखना अभी बाक़ी है कि वे मनुष्य कैसे बनाएँ जाएँ। हमारी भाषा, हमारा साहित्य, हमारी राजनीति-सब कुछ का उद्देश्य यही हो सकता है कि उनको दुर्गतियों से बचाकर किस प्रकार मनुष्यता के आसन पर बैठाया जाए।
हमारा यह देश जाति-भेद का है। करोड़ों मनुष्य अकारण अपमान के शिकार हैं। निरंतर दुर्व्यवहार पाते रहने के कारण उनके अपने मन में हीनता की गाँठ पड़ गई है। यह गाँठ जब तक नहीं निकल पाती, तब तक भारतवर्ष की आत्मा सुखी नहीं रह सकती। कर्म का फल मिलता ही है। उससे बचने का उपाय नहीं है। जिन लोगों को अकारण अपमान के बंधन मे डालकर हमने अपमानित किया है, वे लोग सारे संसार में हमारे अपमान के कारण बने हैं।
हमें सावधानी से उनकी वर्तमान अवस्था का कारण खोजना होगा। ये अनादि काल से ही हीन समझे जाते रहे हैं। भारतवर्ष का सैकड़ों जातियों वाला समाज नाना प्रकार की ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारण-परंपरा के भीतर से गुजरकर तैयार हुआ है। इस शतच्छिद्र कलश में आध्यात्मिक रस टिक नहीं सकता।
आजकल हम लोग हिन्दू-मुसलमानों की समस्या से बुरी तरह चिंतित हैं। नि:संदेह यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। इस प्रश्न ने हमारे समस्त जीवन को गंभीरतापूर्वक विचारने के लिए चुनौती दी है। हम अपनी भाषा के क्षेत्र में भी इस कठिन समस्या से हतबुद्धि हो रहे हैं। हमारे बड़े-बड़े विचारकों ने प्रत्येक क्षेत्र में सुलह का प्रण किया है, परंतु मुझे ऐसा लगता है कि इससे भी कठोर समस्या का सामना हमें हिन्दू-हिन्दू मिलन के लिए ही करना है।
अशांति के चिन्ह अभी से प्रकट होने लगे हैं। जब हम भाषा या साहित्य-विषयक किसी प्रश्न का समाधान करने बैठें, तो केवल वर्तमान पर दृष्टि निबद्ध रखने से हम धोख़ा खा सकते हैं। मुझे अपनी बुद्धि या दीर्घदर्शिता का गर्व नहीं है, लेकिन जो कुछ अनुभव करता हूँ, उसे ईमानदारी से प्रकट करने में शायद कोई लाभ हो जाए, इसी आशा से ये बातें कर रहा हूँ। सैकड़ों व्यर्थ कल्पनाओं की भांति ये अनंत वायुमण्डल में विलीन हो जाएँगी। मुझे ऐसा लगता है कि ज्यों-ज्यों हमारे देशवासियों में आत्म-चेतना का संचार होता जाएगा, त्यों-त्यों हिन्दू समाज की भीतरी समस्याएँ उग्र रूप धारण करती जाएँगी। राजनीतिक बंधनों के दूर होते ही हमारी मानसिक या आध्यात्मिक गुलामी का बंधन और भी कठोर प्रतीत होगा। 200 वर्षों की राजनीतिक गुलामी को तोड़ने में हमें जितना प्रयास करना पड़ा है, उससे कहीं अधिक प्रयास करना पड़ेगा इन सहस्राधिक वर्षों की सामाजिक और आध्यात्मिक गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए।
कवि ने बहुत पहले सावधान किया है, ''जिसे तुमने नीचे फेंक रखा है, वह तुम्हें नीचे से जकड़कर बांध लेगा; जिसे पीछे डाल रखा है, वह पीछे खींचेगा; अज्ञान के अंधकार में तुमने जिसे ढक रखा है, वह तुम्हारे समस्त मंगल को ढककर घोर व्यवधान की सृष्टि करेगा। हे मेरे दुर्भाग्यग्रस्त देश ! अपमान में तुम्हें समस्त अपमानितों के समान होना पड़ेगा।'' (गीतांजली)
शताब्दियों के विकट अपमान की प्रतिक्रिया कठोर होगी। उसके लिए हमें तैयार होना होगा। मुझे ऐसा लगता है कि जब भाषा और साहित्य के मसले पर विचार किया जाता है, तो इस तथ्य को बिल्कुल भुला दिया जाता है। हिन्दुओं की अपनी भीतरी समस्याएँ भी हैं और उन भीतरी समस्याओं के लिए जो विचार विनिमय हुए हैं या हो रहे हैं, वे नाना कारणों से संस्कृत-साहित्य से अधिक प्रभावित हुए हैं। वे किसी के प्रति घृणा या अदूरदर्शिता के कारण नहीं हुए हैं। छोटी कही जाने वाली जातियों में ऊपर उठने की आकांक्षा स्वाभाविक है और उसके लिए उनका संस्कृत-साहित्य की झुकना भी अस्वाभाविक नहीं है।
यदि संस्कृत बहुल भाषा के व्यवहार से और समस्त जातियों के ब्राह्यण या क्षत्रिय कहे जाने से सात करोड़ लोगों में अपने को हीन समझने की मनोवृत्ति कुछ भी कम होती है, तो ऐसा करना वांछनीय है या नहीं, यह मैं देश के नेताओं के विचारने के लिए छोड़ देता हूँ।
भाषा और मनुष्य
एक जमाना था, जब भाषा-विज्ञान और नृतत्त्वशास्त्र की घनिष्ठ मैत्री में विश्वास किया जाता था। माना जाता था कि भाषा से नस्ल की पहचान होती है, परंतु शीघ्र ही यह भ्रम टूट गया। देखा गया है कि ये दोनों शास्त्र एक-दूसरे के विरुद्ध गवाही देते हैं।
भारतवर्ष भाषा-विज्ञान और नृतत्वशास्त्र के कलह का सबसे बड़ा अखाड़ा सिद्ध हुआ है। वर्तमान हिन्दू समाज में एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों ऐसी जातियां हैं, जो अपनी मूल भाषाएँ भूल चुकी हैं और आर्यभाषा बोलती हैं।
ब्राह्यण-प्रधान धर्म ने जातियों का कुछ इस प्रकार स्तर-विभाग स्वीकार किया है कि निम्न श्रेणी की जाति हमेशा अवसर पाने पर ऊंचे स्तर पर जाने का प्रयास करती है। इस देश में जाने किस अनादि काल से संस्कृत भाषा का प्राधान्य स्वीकार कर लिया गया है कि प्रत्येक नस्ल और फिरके के लोग अपनी भाषा को संस्कृत श्रेणी की भाषा में बदलते रहे हैं।

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