दिल्ली। साहित्य अकोदमी में आज मीडिया से जुड़े तीन कथाकारों का कहानी-पाठ आयोजित किया गया। ‘साहित्य मंच’ के अंतर्गत हुए इस कार्यक्रम में एनडीटीवी से प्रियदर्शन, जनसत्ता से राकेश तिवारी और इंडिया न्यूज पत्रिका से जुडे़ अशोक मिश्र का कहानी-पाठ हुआ। प्रियदर्शन ने ‘हंस’ और‘कथन’ में प्रकाशित अपनी कहानियाँ ‘उठते क्यों नहीं कासिम भाई?’ और ‘घर चले गंगा जी?’ सुनाई। पहली कहानी न्यूज चैनलों की कारस्तानियों से परेशान और संदिग्ध बनाए जा रहे मुस्लिमों के दर्द को उजागर करती है तो दूसरी कहानी में भूमण्डलीकरण के दौर में एक आम आदमी को रोजगार के लिए क्या-क्या पाड़ बेलने होते हैं को दर्शाया गया है। राकेश तिवारी ने एचआईवी/एड्स और उसके भय से तैयार किए विश्वव्यापी बाजार को अपनी कहानी ‘सुबह है और चश्मीश है’ से रूबरू कराया। अशोक मिश्र ने पाँच लघुकथाएँ और कहानी ‘‘गाँव की मौत’’ प्रस्तुत की।
आलोचक ज्योतिश जोशी ने तीनों कहानीकारों की कहानियों का विवेचन प्रस्तुत करते हुए कहा कि कहानीकार को किसी सांचे में नहीं बांधना चाहिए। कहानीकार कहानीकार होता है वह चाहें किसी भी पेशे से जुड़ा हो। प्रियदर्शन की कहानियों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वे छोटी-छोटी चीजों पर भी तल्ख नज़र रखते हैं। उन्होंने एक नए संसार की कुंजी को खोजा है। राकेश तिवारी की कहानी को एक बड़े मुहावरे का प्रतीक बताते हुए उन्होंने कहा कि इतने व्यापक विशय को विनोद के सहारे इतनी सहजता से पकड़ना उनकी कहानी को विलक्शण बनाता है। अशोक मिश्र को उन गाँवों के चरित्रों पर दुबारा गौर करने की जरूरत है, जिन्हें वे मोहवश प्रस्तुत कर रहे हैं।
कहानीकार कवि अशोक गुप्ता, वीरेन्द्र सक्सेना, सत्येन्द्रप्रकाश ने भी प्रस्तुत कहानियों पर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए अकादेमी के उपसचिव, ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि इन तीनों कथाकारों की कहानियों से पत्रकार-कहानीकारों के प्रति बना यह मिथ टूटता है कि वे केवल बाह्य जगत की बात करते हैं, उन्होंने इन कहानियों के पात्रों के मनोजगत को बेहद बारीकी से प्रस्तुत किया।
कहानी-पाठ में कई महत्त्वपूर्ण कहानीकार/पत्रकार श्री रमेश उपाध्याय, संजय कुंदन, नीला प्रसाद, महेश दर्पण, विमल कुमार, प्रताप सिंह आदि उपस्थित थे।


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