महिला सशक्तिकरण की दिशा में हालाँकि दुनिया के कई देश कई महत्वपूर्ण उपाय का$फी पहले कर चुके हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी महिलाओं के लिए संसदीय सीटों में आरक्षण की व्यवस्था की जा चुकी है। लगता तो है कि अब भारतवर्ष में भी इस दिशा में कुछ रचनात्मक $कदम उठाए जाने की तैयारी शुरु कर दी गई है। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को आरक्षण दिया जाना और वह भी राजनीति जैसे उस क्षेत्र में जहाँ कि आमतौर पर पुरुषों का ही वर्चस्व देखा जाता है वास्तव में एक आश्चर्य की बात है। परंतु पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के इस सपने को साकार करने का जिस प्रकार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मन बनाया है तथा अपने कांग्रेस सांसदों को महिला आरक्षण के पक्ष में मतदान करने की अनिवार्यता सुनिश्चित करने हेतु व्हिप जारी किया है उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी के शीर्ष पुरुष नेता भले ही भीतर ही भीतर इस बिल के विरोधी क्यों न हों परंतु सोनिया गांधी की मंशा भाँपने के बाद $फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि कांग्रेस का कोई नेता राज्यसभा में इस विधेयक के पारित हो जाने के बाद अब लोकसभा में इसके विरुद्ध अपनी ज़ुबान खोल सकेगा।

बात जब देश की आधी आबादी के आरक्षण की हो तो भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस से लाख मतभेद होने के बावजूद ख़ुद को महिला आरक्षण विधेयक से अलग नहीं रख सकती लिहाज़ा पार्टी में कई सांसदों से मतभेदों के बावजूद भाजपा भी $फ़िलहाल इस विधेयक के पक्ष में खड़ी दिखाई दे रही है। हालाँकि इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि जिस प्रकार मनमोहन सिंह की पिछली सरकार के समय भारत अमेरिका के मध्य हुआ परमाणु कऱार मनमोहन सरकार के लिए एक बड़ी मुसीबत साबित हुआ था तथा उसी मुद्दे पर वामपंथी दलों ने यूपीए सरकार से अपना समर्थन तक वापस ले लिया था। ठीक वैसी ही स्थिति महिला आरक्षण विधेयक को लेकर एक बार फिर देखी जा रही है। परंतु पिछली बार की ही तरह इस बार भी कांग्रेस के इरादे बिल्कुल सा$फ हैं। ख़बर है कि एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री ने सोनिया गांधी से यह पूछा कि उन्हें लोकसभा में महिला आरक्षण की मंज़ूरी चाहिए या वे सरकार बचाना चाहेंगी। इस पर सोनिया गांधी ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें महिला आरक्षण की मंज़ूरी चाहिए।

उक्त विधेयक को लेकर देश की संसद में पिछले दिनों क्या कुछ घटित हुआ यह भी पूरा देश व दुनिया देख रही है। राज्यसभा के 7 सांसदों को सभापति की मेज़ पर चढऩे तथा विधेयक की प्रति फाडऩे व सदन की गरिमा को आघात पहुँचाने के जुर्म में सदन से निलंबित तक होना पड़ा था। राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी व लोकजन शक्ति पार्टी के इन सांसदों द्वारा महिला आरक्षण विधेयक के वर्तमान स्वरूप को लेकर जो हँगामा खड़ा किया जा रहा है वह भी हास्यास्पद है। इन दलों के नेता यह माँग कर रहे हैं कि 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के कोटे में ही दलितों, पिछड़ी जातियों तथा अल्पसंख्यकों की महिलाओं हेतु आरक्षण किया जाना चाहिए। अब यह शगू$फा मात्र शगू$फा ही है या फिर इन पार्टियों के इस $कदम में कोई ह$की$कत भी है यह जानने के लिए अतीत में भी झाँकना ज़रूरी होगा। महिलाओं के 33 प्रतिशत सामान्य आरक्षण की वकालत करने वाले लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव तथा रामविलास पासवान जैसे विधेयक के वर्तमान स्वरूप के विरोधियों से जब यह पूछते हैं कि आप लोग अपनी- अपनी पार्टियों के राजनैतिक अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक के किन्हीं पाँच ऐसे सांसदों, विधायकों या विधान परिषद सदस्यों के नाम बताएँ जिन्हें आप लोगों ने दलित, पिछड़ा तथा अल्पसंख्यक होने के नाते पार्टी प्रत्याशी के रूप में किसी सदन का सदस्य बनवाया हो। इसके जवाब में इन नेताओं के पास कहने को कुछ भी नहीं है। इसी से यह सा$फ ज़ाहिर होता है कि दलितों,पिछड़ी जातियों तथा अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के नाम पर किया जाने वाला इनका हंगामा केवल हंगामा ही है हकीक़त नहीं।

दरअसल जो नेता महिला आरक्षण विधेयक का विरोध जाति के आधार पर कर रहे हैं उनकी मजबूरी यह है कि उनके हाथों से पिछड़ी जातियों व अल्पसंख्यकों के वह वोट बैंक तेज़ी से खिसक रहे हैं जो उन्हें सत्ता मे लाने में सहयोगी हुआ करते थे। लिहाज़ा यह नेता पिछड़ों व अल्पसंख्यकों की महिलाओं को अतिरिक्त आरक्षण दिए जाने के नाम पर महिला आरक्षण विधेयक का जो विरोध कर रहे हैं वह वास्तव में एक तीर से दो शिकार खेलने जैसा ही है। इन जातियों के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद कर यह नेता जहाँ अपने खिसकते जनाधार को पुन: बचाना चाह रहे हैं वहीं इनकी यह कोशिश भी है कि किसी प्रकार उनके विरोध व हँगामे के चलते यह विधेयक पारित ही न होने पाए। और इस प्रकार राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व पूर्ववत् बना रहे।

महिला आरक्षण विधेयक से जुड़ी तमाम और ऐसी सच्चाईयाँ हैं जिन्हें हम नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते। हालांकि महिलाओं द्वारा आमतौर पर इस विषय पर ख़ुशी का इज़हार किया जा रहा है। आरक्षण की ख़बर ने देश की अधिकांश महिलाओं में जोश भर दिया है। परंतु इन्हीं में कुछ शिक्षित व सुधी महिलाएँ ऐसी भी हैं जो महिला आरक्षण को ग़ैर ज़रूरी और शोशेबाज़ी मात्र बता रही हैं। ऐसी महिलाओं का तर्क है कि महिला सशक्तिकरण का उपाय मात्र आरक्षण ही नहीं है। इसके अतिरिक्त और भी तमाम उपाय ऐसे हो सकते हैं जिनसे कि महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष लाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर महिलाओं हेतु नि:शुल्क अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया जाना चाहिए। महिलाओं पर होने वाले यौन उत्पीडऩ संबंधी अपराध तथा दहेज संबंधी अपराधों में अविलंब एवं न्यायसंगत $फैसले यथाशीघ्र आने चाहिएँ तथा इसके लिए और सख़्त $कानून भी बनाए जाने चाहिए। कन्या भ्रुण हत्या को तत्काल पूरे देश में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए तथा इसके लिए भी और सख़्त $कानून भी बनाए जाने की ज़रूरत है। खेल कू द में महिलाओं हेतु पुरुषों के बराबर की व्यवस्था की जानी चाहिए। सरकारी एवं $गैर सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं को आरक्षण दिया जाना चाहिए। और यह आरक्षण चूँकि देश की आधी आबादी के लिए दिया जाना है अत: इसे 33 प्रतिशत नहीं बल्कि 50 प्रतिशत किया जाना चाहिए। वृद्ध, बीमार तथा घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की सहायता व इन्हें आश्रय दिये जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। व्यवसाय हेतु महिलाओं को प्राथमिकता के आधार पर बैंक लोन मुहैया कराए जाने चाहिए। लिज्जत पापड़ जैसी ग्राम उद्योग संस्था से सीख लेते हुए सरकार को भी इसी प्रकार के अनेक महिला प्रधान प्रतिष्ठान राष्ट्रीय स्तर पर संचालित करने चाहिए।

रहा सवाल महिलाओं की सत्ता में भागीदारी हेतु संसद में महिला आरक्षण विधेयक प्रस्तुत किए जाने का तो इसमें भी शक नहीं कि राजनीति में महिलाओं की आरक्षित भागीदारी निश्चित रूप से राजनीति में फैले भ्रष्टाचार में कमी ला सकेगी। संसद व विधानसभाओं में आमतौर पर दिखाई देने वाले उपद्रवपूर्ण दृश्यों में भी लगभग 33 प्रतिशत कमी आने की संभावना है। संसद में नोट के बंडल भी पहले से कम उछाले जाऐंगे। परंतु यह सब तभी संभव हो सकेगा जबकि देश की लोकसभा में उक्त विधेयक पेश होने की नौबत आ सके और उसके पश्चात लोकसभा इस विधेयक को दो-तिहाई मतों से पारित भी कर दे। और चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है इसलिए देश की आधी से अधिक अर्थात् लगभग 15 विधानसभाओं में भी इस विधेयक का पारित होना ज़रूरी होगा। चूँकि बात भारत में महिला सशक्तिकरण को लेकर की जा रही है इसलिए आज महिला आरक्षण के पक्ष में सबसे अधिक मुखरित दिखाई दे रही कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी से ही जुड़ी कुछ महिलाओं से संबंधित अतीत की ऐसी ही बातों का उल्लेख यहाँ करना संबद्ध पक्षों को शायद बुरा तो बहुत लगेगा परंतु इतिहास ने समय के शिलालेख पर जो सच्चाई दर्ज़ कर दी है उससे भला कौन इंकार कर सकता है। याद कीजिए जब एक महिला अर्थात् सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनने के $करीब थी उस समय सुषमा स्वराज व उमा भारती के क्या वक्तव्य थे। यह महिला नेत्रियाँ उस समय सोनिया गांधी के विरोध में अपने बाल मुंडवाने,भुने चने खाने व घर में चारपाई उल्टी कर देने जैसी बातें करती देखी जा रही थीं। आज भाजपा व कांग्रेस महिला आरक्षण के पक्ष में लगभग एकजुट दिखाई पड़ रहे हैं। इन दोनों ही पार्टियों को वे दिन भी नहीं भूलने चाहिए जबकि दिल्ली के सिख विरोधी दंगों के दौरान तथा गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार के संरक्षण में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान न जाने कितनी औरतों के पेट फाड़कर उनके गर्भ से बच्चों को निकाल कर चिता में डाल दिया गया। अनेक महिलाओं को जीवित अग्रि के हवाले कर दिया गया। अनेकों के स्तन तलवारों से काट दिए गए। बड़े अ$फसोस की बात है कि महिलाओं पर यह अत्याचार भी इन्हीं राजनीति के विशेषज्ञों के इशारे पर किया गया था जो आज महिला सशक्तिकरण की बातें कर रहे हैं। और इसी लिए अविश्वसनीय से लगने वाले इस विधेयक को देखकर यह संदेह होना लाज़मी है कि इसमें कितनी ह$की$कत है और कितना फ़साना।


  निर्मल रानी
1630/11, महावीर नगर,
अम्बाला शहर, हरियाणा
फ़ोन- 0171-2535628
ई-मेल- nirmalrani@gmail.com
  

 
         
टिप्पणी लिखें