दिन और तारीख़
तो ठीक-ठीक याद नहीं लेकिन कुछ महीने पहले सीताराम यादव की पुस्तक ‘हिंदी परंपरा के शिखर पुरुष’ मिली तो हैरत तो हुई ही ख़ुशी भी हुई। साहित्य से उनके अनुराग और जुड़ाव की जानकारी तो थी लेकिन उनके लेखन से पूरी तरह अपरिचित था। उनका लिखा पहले कभी पढ़ा भी नहीं था। हालांकि उनसे मेरा रिश्ता काफ़ी पुराना था। क़रीब दो-ढाई दशक से उन्हें मैं जानता हूं। आकाशवाणी में उनसे पहली बार मिलना हुआ था। आकाशवाणी के पटना केंद्र में उर्दू प्रोग्राम से मैं कैजुअल तौर पर जुड़ा था और सीताराम यादव चौपाल और दूसरे कार्यक्रम देखते थे। लेकिन जो दूसरा बड़ा कारण उससे निकटता का बना वह है एक ही इलाक़े से होना। बाद में पता चला कि उनका ताल्लुक़ भी शेख़पुरा से ही है तो ज़ाहिर है कि फिर नज़दीकी बढ़ी। लेकिन इन सबके बीच भी उन्होंने कभी अपने लेखक होने का अहसास तक होने नहीं दिया। लेकिन साहित्यिक सभा-समारोहों में उनकी मौजूदगी से उनके साहित्य से जुड़ाव की जानकारी मिलती रही। अब जब उनकी यह पुस्तक आई है तो हैरत होना लाज़िमी था। सीताराम यादव ने भी अपने प्रस्तावना में इस बात का इज़हार किया है कि संग्रह में शामिल आलेखों में से चार का प्रसारण आकाशवाणी से हुआ बाक़ी आलेख अप्रकाशित और अप्रसारित हैं। तो यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि सीताराम यादव छपने से ज्Þयादा लिखने पर यक़ीन रखते हैं।
सीताराम यादव की इस पहली पुस्तक ‘हिंदी परंपरा के शिखर’ में उनके पच्चीस आलेख संकलित हैं। हिंदी के प्रमुख साहित्यकारों पर लिखे गए उनके आलेख उन साहित्यकारों के जीवन, चिंतन और दर्शन को सामने रखता है। जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, आचार्य शिवपुजन सहाय, निराला, रामधारी सिंह दिनकर, मलिक मोहम्मद जायसी, अमीर ख़ुसरो, कबीर, तुलसीदास, भारतेंदु, अज्ञेय, रेणु, नागार्जुन, सुभद्रा कुमारी चौहान, मुक्तिबोध के साथ-साथ धूमिल, मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव पर लिखे उनके आलेख संग्रह में हैं। इन आलेखों में सीताराम यादव ने इन लेखकों के साहित्यिक अवदान की चर्चा विस्तार से की है। उनके साहित्य, भाषा और चिंतन पर नजर डाली है। यह सही है कि सीताराम यादव ने इनका मूल्यांकन अपने नजÞरिए से किया है और पाठकों के सामने उन्हें विस्तार से रखा है। ऐसा करते हुए वह कोई बड़ा दावा नहीं करते और न ही यह मानते हैं कि उनके पाठक उनकी बातों से सहमत भी हों। सीताराम यादव ने उनकी रचनाओं का मूल्यांकन किसी आलोचक की तरह नहीं बल्कि पाठक की तरह ही की है, यह बात दीगर है कि शुरुआती दौर में वे हिंदी के प्राध्यापक भी रहे हैं। इसलिए इन आलेखों में वह अकादमिक छौंक ज़रूर नज़र आती है जो आमतौर पर कालेजों या विश्वविद्यलयों में पढ़ाने वाले प्रोफेसरों के यहां मिलते हैं।
संग्रह में शामिल दो आलेख ‘आदि कवि: सरहपा’ और ‘लोकरंगकर्मी: भिखारी ठाकुर’ का विशेष रूप से उल्लेख करना ज़रूरी है क्योंकि नई पीढ़ी इनके साहित्यिक या सांस्कृतिक अवदान को लगभग न के बराबर जानती है। सरहपा या भिखारी ठाकुर ने जो काम किया है उनका ज़िक्र बार-बार किया जाना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। भिखारी ठाकुर ज़रूर कभी-कभी याद कर लिए जाते हैं लेकिन सरहपा तो किताबों में ही सिमट कर रह गए हैं। लेकिन सीताराम यादव ने जिस आत्मीयता के साथ उनके रचनाकर्म पर लिखा है वह उनके कृतित्व को नए रंग में हमारे सामने रखता है। यों भी संदर्भ ग्रंथ के तौर पर सीताराम की यह पुस्तक उपयोगी है और इसे पढ़ा जाना चाहिए।
लेखक- सीताराम यादव
प्रकाशक- जिज्ञासा प्रकाशन, झेलम अपार्टमेंट्स, राजेंद्रनगर, पटना-800016
मूल्य-375 रुपए।


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