हॉस्टल जीवन पर इंग्लिश में उपन्यास और फिल्में खूब मिलती हैं।
चेतन भगत की फाइव पॉइंट समवन, अभिजित भादुडी की मीडिओकर बट एरोगेंट कॉलेज तथा हॉस्टल को कथानक बना कर लिखे गए उपन्यास हैं। हिन्दी में मेरी दृष्टि अब तक इस विषय पर किसी उपन्यास पर नहीं पडी है। मनोज सिंह ने इसकी पहल की है। उन्होंने हॉस्टल जीवन को उकेरते हुए एक उपन्यास लिखा है।
मनोज सिंह का हॉस्टल के पन्नों से हॉस्टल से प्रारंभ होता है मगर वहीं समाप्त नहीं होता है यह हॉस्टल की राजनीति से शुरू होकर पूरे प्रदेश और देश की राजनीति तक फैलता चला जाता है। इस तरह यह उपन्यास एक बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में घटित होता है, समकालीन समाज का राजनैतिक और युवा चेहरा विस्तार से दिखाता है। पूरे उपन्यास के केंद्र में राजनीतिक गुटबंदी है। युवावस्था में हॉस्टल जीवन के चित्र हैं। रैगिंग, मारपीट, गुंडई, दोस्ती और दोस्ती की खातिर जान की बाजी लगा देना यही अधिकांश हिस्से में चित्रित है।
कथाक्रम में वर्तमान और अतीत के बीच आवाजाही होती रहती है। अतीत में हॉस्टल जीवन है तो बीस-बाइस साल बाद वर्तमान जीवन भी इसमें है। जब ये युवा प्रौढ बाल-बच्चेदार हो चुके हैं। सबकी अपनी जिंदगी और व्यस्तताएं हैं। यह कमिंग ऑफ एज, एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने के संक्रमण काल की उथल-पुथल को दर्शाता है। मनोज सिंह स्त्री पात्रों का विश्लेषण करने में उतने सक्षम हैं जितनी तत्परता, मुस्तैदी और कुशलता के साथ पुरुष पात्रों का चित्रण करने में उपन्यास की स्त्रियां अधिकतर निष्क्रिय हैं। चाहे वो दुष्यंत की पत्नी शांतिप्रिया हो, अरुण की पत्नी नीता अथवा स्वयं प्रणव की पत्नी कविता हो या फिर मयंक की पत्नी सुधा। हां, उपन्यासकार ने नई पीढी की जीवंतता को काफी सक्रिय दिखाया गया है। वह अपने पिता और अरुण के लिए आंदोलन करती है।


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