डॉ॰ विनयन के अनुभव बहुमूल्य इसलिए हैं,
चूंकि वह (डॉ॰ विनयन) एक निर्णायक दौर में तथा एक सीमित अवधि तक सक्सलियों के हमसफर रहे हैं। यह सच्चाई आश्चर्यजनक है, चूंकि डॉ॰ विनयन जनान्दोलन के उपज थे और जनान्दोलन से नक्सलियों का रिश्ता हमेशा 36 का रहा है। ‘महान नेता’ चारू मजुमदार ने कहा था जनान्दोलन की बात सोचो भी मत बच्चों, सिर्फ हथियार के सहारे आगे बढ़ते रहो। तब से नक्सली, आज की शब्दावली के अनुसार माओवादी, इसी वचन के पीछे चल रहे हैं, इसे सीने से लगाकर, चाहे उनकी राजनीति भांड़ में क्यों नही जा रही हो! लेकिन, विनयन तो जे.पी. आन्दोलन से जुड़ने बिहार आये थे।
जे.पी. आन्दोलन में अवसरवादियों की भरमार से निराश डॉ॰ विनयन मध्य बिहार की ओर मुड़ें, जहां सामन्ती हिंसा चरम पर थी। अपनी भेंट वार्ता में (पृष्ठ-22, विनयन, जीवन विचार और संघर्ष) वह कहते हैं -‘मैंने पाया कि ये सब महत्वाकांक्षी हैं और बौद्धिक परिपक्वता इनमें नहीं हैं। बहरहाल मैंने अपना काम जारी रखा और उसी सिलसिले में मैं जहानाबाद पहुंचा। मुझे लगा मध्य बिहार का वह क्षेत्र ऐसा है, जहां रहकर काम करने की जरूरत है। फिर मैं वहीं रह गया।’
जहानाबाद में सामन्ती हिंसा के दो आयाम थे, एक आर्थिक और दूसरा सामाजिक। डॉ. विनयन अपनी भेंटवार्ता में भिवणसिकरिया का उल्लेख करते हैं। जहां उन्होंने ‘पालकी प्रथा’ का विरोध किया और उसके विरूद्ध अनशन भी किया। अनशन का नतीजा यह हुआ कि गांव वालों ने लिखित रूप से वचन दिया कि अब वे पालकी का उपयोग नहीं करेंगे, सिवाय तब जब कोई बीमार हो और उसे अस्पताल तक ले जाने के लिए कोई और साधन न हों। यह डॉ. विनयन की नैतिक जीत थी।
सामन्ती हिंसा के आर्थिक आयाम का खुलासा डॉ॰ विनयन ने अपने व्याख्यान में किया है। (पृष्ठ-16, विनयन, जीवन विचार और संघर्ष) वह कहते हैं-‘पूरे बिहार में कहीं भी बटाईदारों को, बटाईदारी एक्ट के मुताबिक फसल का तीन-चैथाई भाग नहीं मिलता। बिहार में खेत मजदूरों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी 26 रुपये हैं, लेकिन 26 रुपये मजदूरी मांगने पर जवाब गोली और गाली मिलता है। इसी व्याख्यान में (पृष्ठ-14, विनयन, जीवन विचार और संघर्ष) डॉ॰ विनयन ने सामंतों द्वारा भूमिहीनों के साथ किये ज रहे वर्ताव का जिक्र भी किया है-‘किसी गांव में एक खूंख्वार जमींदार है। वह बंधुआ मजदूर रखता है। न्यूनतम मजदूरी नहीं देता। दलितों और खेत मजदूरों के साथ गाली-गलौज, मारपीट करता है, उनकी स्त्रियों का बलात्कार करता है। गांव के गरीब खेतिहर उससे घृणा करते हैं। लेकिन, कोई भी, कुछ भी करने में असमर्थ है, मध्य बिहार के सामंती तत्व अपनी सेना भी रखते थे। उन सेनाओं के वर्चस्व की वजह थी राजनेताओं और पुलिस प्रशासन का समर्थन।
डॉ॰ विनयन ने जब मध्य बिहार में सामंती शोषण के खिलाफ लड़ने का मन बनाया तब उन्हें एक सुरक्षा कवच की जरूरत महसूस हुई, चूंकि सामंत हिंसक थे और किसी हद तक जाने को तैयार थे। सुरक्षा-हीनता की अनुभूति के रास्ते नक्सलपंथी उनके सम्पर्क में आयें। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि डॉ॰ विनयन और नक्सलियों का मेलबंध्न न टिकाऊ हुआ न सुखद। नक्सली उन दिनों ‘यूनिटी गु्रप’ की शक्ल मेंथे। बाद में उन्होंने ‘पार्टी यूनिटी’ का चेहरा अपनाया और ‘पीपुल्सवार गु्रप’ की बिहार इकाईबन गये। आगे चलकर एमसीसी के साथ मिलकर उन्होंने भाकपा (माओवादी) की नींव रखी।
उन दिनों उनकी जो कार्यशैली थी, उसकी दिलचस्प झांकी प्रस्तुत करती है डॉ॰ विनयन की भेंट वार्ता (पृष्ठ-30, विनयन, जीवन विचार और संघर्ष) -‘साथ काम करते हुए हमारे बीच कुछ अंतद्र्वंद्व उभरे। पार्टी यूनिटी के लोग हमारे क्षेत्रों में भी, बिना हमें बताए, अपनी कार्रवाई कर देते थे, जिसका नतीजा हमारे उन निरपराध लोगों को भुगतना पड़ता था, जिन्हें उस कार्रवाई की भनक तक नहीं होती थी। शुरू में उनकी ऐसी हथियारी कारवाई कम होती थी, लेकिन बाद में काफी बढ़ गयी। लिहाजा हमें इस पर कुछ न कुछ सोचना ही था।’
इस सिलसिले में नक्सली जिस चालबाजी का सहारा लेते थे, उसकी भी काफी स्पष्ट तस्वीर खींची है डॉ॰ विनयन ने (पृष्ठ-30, विनयन, जीवन विचार और संघर्ष)-‘कभी तो वे उसे उचित बताते हुए तर्क देते थे कि वह व्यति तो सचमुच बदमाश था, लोगों को सताता था, वगैरह और कभी मान लेते थे कि उनसे गलती हो गयी। तब उनका तर्क होता था कि आपने भी तो राजनीतिक आन्दोलन के दौरान गललियां की हैं, जैसे आप अपनी गलतियों से सीखते हुए आगे बढ़े, हम भी बढ़ेंगे।’
जब मतभेद और गहरा हुआ, तो डॉ॰ विनयन ने पार्टी यूनिटी के सामने शर्तें रखी (पृष्ठ-31, विनयन, जीवन विचार और संघर्ष) -‘हमने पार्टी यूनिटी के सामने दो शर्तें रखीं -एक, हमारे प्रभाव क्षेत्र में कोई कार्रवाई करने से पहले आप हमसे विचार विमर्श कर ले। दो, जैसे बाकी सबके बारे में कहा जाता है, वैसे ही आपको भी, अपने कार्यों की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिएऔर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपके किए की सजा कोई अन्य, निरपराध लोग न भुगतें। इसके लिए जरूरी है कि जब भी आप कोई ‘कार्रवाई’ करें तो वहां आप पर्चा छोड़ें, जिसमें न केवल उस घटना की जिम्मेदारी ली गयी हो, बल्कि उसका औचित्य भी साबित किया गया हो। लेकिन पार्टी यूनिटी ने हमारी दोनों ही मांगें अमान्य कर दी।
डॉ॰ विनयन ने जिसे सुरक्षा-कवच के रूप में अपनाया था, वह (पार्टी यूनिटी) अब उनके गले का फंदा बनता जा रहा था। नक्सली अतिरेकों के कारण ‘मजदूर किसान संग्राम समिति’ प्रतिबंधित हो चुकी थी। सामन्ती तत्व कमजोर नहीं हुए, चूंकि ‘नक्सली खतरा’ को कारण स्वरूप दर्शातेहुए वे पुलिस प्रशासन का समर्थन हासिल कर चुके थे। इस समर्थन का मूर्त रूप अरवल गोली कांड के दौरान देखने को मिला। अरवल जहानाबाद का एक कस्बा है, जहां 19 अप्रैल 1986 को यह दुखद घटना घटी। एक हाॅल में ‘मजदूर किसान संग्राम समिति’ ने सभा बुलाई थी। इस सभा में महिलाएं, बूढ़े, बच्चे सभी उपस्थित थे। एस.पी. के आदेश पर बिना चेतावनी दिये, बीएमपी के जवानों ने गोली चलाई, जिसमें (पुलिस के मुताबिक) 23 लोग मारे गये।
डॉ॰ विनयन कहते हैं (पृष्ठ-32, विनयन, जीवन विचार और संघर्ष) -‘असल में वह हमें सबक सिखाने का, और हमारे लोगों में डर बैठाने का एक सुविचारित और सुनियोजित प्रयास था। उसकी तैयारियां काफी पहले से की जा रही थी।’
डॉ॰ विनयन ने निष्कर्ष सही निकाला, परन्तु वह कुछ बातें और कहते तो बेहतर होता। नक्सलियों ने ‘व्यक्ति-हत्या’ के माध्यम से सम्पूर्ण इलाके में दहशत का जो माहौल पैदा किया था, उसने आखिरकार सामन्ती तत्वों को ही लाभ पहुंचाया। अतिवादी कार्यशैली का नतीजा, हर युग में, हर काल में यही निकलता आया है। ऐसा लगता है कि डॉ॰ विनयन भी अंदर ही अंदर इस सच्चाई की ओर मुखातिब हो चुके थे। व्याख्यान में उनके द्वारा कही गयी चन्द पंक्तियों में उनका यह बोध साफ झलकता है (पृष्ठ-13, विनयन, जीवन विचार और संघर्ष) -‘बिहार के वर्तमान नक्सली आन्दोलन में मौजूद हिंसा के तीन चार रूप हैं। एक तो चीनी क्रांति की रणनीति के अनुकरण में इलाकाबार राज्यसत्ता दखल की नीति अपनाने वाले गुटों की राजनीतिक हिंसा है। इस रणनीति के हामी यह भूल जाते हैं कि आज का भारत चैथे दशक के चीन से सर्वथा भिन्न है। देश के विभिनन भू-भागों पर राज्य सत्ता का प्रभावशाली पकड़, विकसित दूरसंचार, यातायात एवं शस्त्रास्त्र प्रणाली, मुक्त बाजार और खुले पूंजीवाद के समर्थक प्रचार माध्यमों का जनता पर प्रभाव, लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता की भागीदारी आदि कारकों ने मिलकर इलाकावार राज्यसत्ता-दखल करने एवं मुक्त अंचल स्थापित करने की रणनीति को निरर्थक और आत्मघाती बना दिया है।’
डॉ॰ विनयन ने बाद के दिनों में ‘जनमुक्ति आन्दोलन’ के नाम से एक संगठन बनाया (1988)। इसका पहला सम्मेलन 1989 (28-29 नवम्बर) को पटना के अंजुमन इस्लामिया हाल में सम्पन्न हुआ। आगे चलकर वे ‘भारत जन आन्दोलन’ में शामिल हो गये (1992)। 18 अगस्त 2006 को शाम 7.15 बजे उनका निधन हो गया।
‘विनयन-जीवन विचार और संघर्ष’ एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसे प्रकाशित कर ‘डॉ॰ विनयन जनमुक्ति मेमोरियल ट्रस्ट’ ने सराहनीय काम किया है। बिहार में नक्सली आन्दोलन की उत्पत्ति और फैलाव का अध्ययन जिनके जिम्मे है, वे अवश्य इस पुस्तक को पढ़ें।
कृति- विनयन : जीवन, विचार और संघर्ष
संपादक - गोविन्द शर्मा
प्रकाशक- डॉ॰ विनयन जनमुक्ति मेमोरियल ट्रस्ट


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