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हुधा हिंदी के साहित्यकार हिंदी में पाठकों की कमी का रोना रोते रहते हैं, इस बात पर भी लगातार मंथन होता आया है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं । लेकिन इस रुदन के पीछे की वजहों पर यदा-कदा वो भी अगंभीरता से ही बात होती है, जो गोष्ठियों आदि तक ही सीमित रहती है । दरअसल पिछले चार पांच दशकों में साहित्य में एक ऐसी वर्ण व्यवस्था बनाई गई जिसने लेखकों के साथ साथ पाठकों का भी वर्गीकरण कर दिया है । बेहद लोकप्रिय उपन्यास लेखक वेद प्रकाश शर्मा के निधन के बाद एक बार फिर यह साहित्यक वर्णव्यवस्था विमर्श के केंद्र में है । वेदप्रकाश शर्मा के गुजरने के बाद जिस तरह से कथित मुख्यधारा के लेखकों ने उनको लुगदी साहित्यकार कहकर संबोधित किया वह बेहद क्षुब्ध करने जैसा था । वेदप्रकाश शर्मा को लुगदी लेखक कहकर एक बार फिर से साहित्य में वर्णव्यवस्था को पोषक सामने आ गए ।

लुगदी लेखन, लोकप्रिय लेखन, गंभीर लेखन की पुरानी बहस फिर से साहित्यक विमर्श के केंद्र में है । साहित्य में इस तरह के बहस व्यर्थ हैं क्योंकि साहित्य तो साहित्य है और उसको किसी खांचे में डालकर पाठकों को भ्रमित करने की कोशिश होती है और एक खास किस्म के लेखन को बढ़ावा देने की जुगत होती है, बहुधा खोटे सिक्के को चलाने की कवायद भी । जिसे हिंदी साहित्य में लुगदी कहकर और जिनके लेखकों को पल्प राइटर कहकर हाशिए पर डाल दिया जाता रहा दरअसल वो हिंदी के पाठकों के केंद्र में रहे । चाहे वो गुलशन नंदा हों, रानू हों, सुरेन्द्र मोहन पाठक हों या फिर वेद प्रकाश शर्मा ।

वेद प्रकाश बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उनका लिखा इतना अधिक लोकप्रिय होता था कि पाठकों को उनके हर नए उपन्यास का इंतजार रहता था । उनके उपन्यासों की अग्रिम बुकिंग हुआ करती थी । लगभग दो सौ उपन्यास लिखनेवाले वेदप्रकाश शर्मा का हाल ही में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया । कम ही लोगों को यह बात मालूम होगी कि वेद प्रकाश शर्मा के मशहूर उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ की करीब आठ करोड़ प्रतियां बिकी थीं । राजीव गांधी की हत्या पर जब यह उपन्यास लिखा गया था तब शुरुआत में ही इसकी पंद्रह लाख प्रतियां छापी गई थीं । हिंदी के पाठकों में इस उपन्यास को लेकर दीवानगी थी । उन्नीस सौ तेरानवे में छपे इस उपन्यास के लिए कई शहरों में पोस्टर और होर्डिंग लगे थे । मेरे जानते किसी राजनीतिक शख्सियत की हत्या और उसकी साजिश पर लिखा गया हिंदी का यह इकलौता उपन्यास है ।

वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों को जासूसी या हल्का उपन्यास माना जाता रहा लेकिन हिंदी के स्वनामधन्य आलोचक ये भूल जाते रहे कि पूरी दुनिया में जासूसी उपन्यासों की जबरदस्त मांग रही है और उनके लेखक बेहद लोकप्रिय । इस संदर्भ में पाब्लो नेरूदा का एक इंटरव्यू याद आता है । जब पाब्लो नेरूदा से पूछा गया कि अगर उनके घऱ में आग लग जाए तो वो क्या बचाना चाहेंगे । नेरूदा ने फौरन उत्तर दिया कि वो कुछ जासूसी उपन्यासों के साथ घर से निकलना चाहेंगे । पाब्लो नेरूदा का यह वाक्य जासूसी उपन्यास लेखक की महत्ता को समझने के लिए काफी है ।

वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास तो लोकप्रिय होते ही थे उनके कई उपन्यासों पर फिल्में भी बनीं । जिन उपन्यासों पर फिल्में बनीं वो हैं- वर्दी वाला गुंडा, सबसे बड़ा खिलाड़ी और इंटरनेशनल खिलाड़ी प्रमुख हैं । उन्नीस सौ पचासी में उनके उपन्यास ‘बहू मांगे इंसाफ’ पर शशिलाल नायर के निर्देशन में ‘बहू की आवाज’ के नाम से फिल्म बनी थी । उन्होंने कई फिल्मों की स्क्रिप्ट और सीरियल के लिए भी लेखन किया । वेद प्रकाश शर्मा हर साल दो तीन उपन्यास लिखते थे और हर उपन्यास की शुरुआती डेढ लाख प्रतियां छपती थीं । जब वेद प्रकाश शर्मा का सौवां उपन्यास ‘कैदी नंबर 100’ छप रहा था तो प्रकाशकों ने ढाई लाख प्रतियां छापने का एलान किया था । हिंदी साहित्य के तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों के लिए यह संख्या कल्पना से परे, किसी दूसरी दुनिया का आंकड़ा लगता है । यह वेद प्रकाश शर्मा की लोकप्रियता का कमाल था जिसकी वजह से प्रकाशकों में आत्मविश्वास था ।

यह वेदप्रकाश शर्मा की भाषा का ही कमाल था कि आज के तमाम खबरिया चैनल उससे अछूते नहीं हैं । दर्शकों के बीच लोकप्रियता की होड़ में न्यूज चैनलों की भाषा को उनके कार्यक्रमों के नाम से समझा जा सकता है जिसपर वेदप्रकाश शर्मा की छाप लक्षित की जा सकती है । चंद बानगी है - लुटेरी दुल्हन, बीबी का नशा, बहू मांगे इंसाफ, साजन की साजिश, हत्यारा कौन, जुर्म, सनसनी, सास बहू और साजिश आदि । किसी भी लेखक के लिए लोकप्रिय होने के बाद यह संतोष की बात होती है कि उसने अपनी भाषा को किस हद तक अपनी लेखनी से प्रभावित किया और कितने लोगों ने उसका अनुसरण किया ।

वेद प्रकाश शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक गांव में हुआ था । उनके उपन्यास लेखन बनने की भी दिलचस्प कहानी है । बात 1972 की थी और वेद प्रकाश शर्मा गर्मी की छुट्टियों में अपने गांव गए थे । वहां उन्होंने खाली समय में लिखना शुरू किया और कई कॉपियां भर दी । जब उनके पिता को पता चला तो उन्होंने उनकी जमकर पिटाई की और बालक वेदप्रकाश की मां से बोले लो अब पहले तो सिर्फ पढ़ता था अब तो लिखने भी लगा है । उस वक्त किसे मालूम था कि कॉपियों में कथा लिखनेवाला अपनी लेखनी से कीर्तिमान स्थापित करेगा । दरअसल अगर हम समग्रता में देखें तो वेद प्रकाश शर्मा साहित्य का पंचमुखी दीपक थे जिनमें प्रतिभा की बाती पांचो दिशाओं में जलती थी । कथित मुख्यधारा के लेखक भले ही उनको लुगदी लेखक माने लेकिन वेदप्रकाश शर्मा को पाठकों का जो प्यार मिला वो अप्रतिम है ।