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जेरी पिंटो का नाम एक ऐसे लेखक के तौर पर जाना जाता है जो फिक्शन से लेकर बॉयोग्राफी और अनुवाद से लेकर बच्चों के लिए फिक्शन लिखते रहे हैं । अपने जमाने की मशहूर डांसर हेलन के जीवन पर जेरी ने बेहद रोचक और दिलचस्प किताब लिखी है। इसके अलावा जेरी ने अपनी किताब में बेहद संवेदनशील तरीके से मानसिक रोगियों पर भी लिखा है । जेरी अपनी चुटीली टिप्पणियों के लिए भी जाने जाते हैं । उनकी नई किताब ‘मर्डर इन माहिम’ ने उनके लिए एक नई छवि गढ़ी है । जेरी पिंटो के इस उपन्यास में अपराध है, समलैंगिकता और उससे जुड़ी समस्याएं हैं और अपने संपूर्ण स्वरूप में उपस्थित है मायानगरी मुंबई । खांटी मुंबईकर की तरह जेरी ने माहिम, माटुंगा से लेकर मायानगरी के कई इलाकों में मौजूद सामाजिकक विसंगतियों और उससे उपजने वाले अपराध की मानसिकता की ओर भी इशारा करते चलते हैं। जेरी चूंकि मुबंई के रहनेवाले हैं लिहाजा उनके लेखन में मुंबई का समाज और उसकी बोली वाणी भी पाठकों को दिलचस्प लग सकती है ।

मर्डर इन माहिम में मुंबई के एक इलाके के पब्लिक टॉयलेट में एक युवक की लाश मिलती है जिसकी किडनी गायब है । इस केस को सुलझाने की जिम्मेदारी मिलती है मुंबई पुलिस के एक ईमानदार अफसर इंसपेक्टर झेंडे को जो इस केस में अपने मित्र बुजुर्ग पत्रकार पीटर डिसूजा को भी साथ रखता है और उससे केस की डिटेल्स पर चर्चा करता रहता है । जैसे जैसे यह अपराध की कथा आगे बढ़ती है वैसे वैसे इंसपेक्टर झेंडे और पीटर डिसूजा के बीच का संवाद बेहद दिलचस्प होता जाता है । कैसे किडनी निकाली गई होगी, क्या मर्डर करनेवाला पहली बार हत्या कर रहा होगा, उसे कैसे मालूम कि किडनी शरीर में कहां होती है, क्या हत्या कहीं और की गई और फिर लाश को लाकर टॉयलेट में फेंक दिया गया ।

इन सब बातों पर दोनों पात्रों के बीच बेहद सूक्षम्ता से बात होती है । दोनों पात्रों के बीच होनेवाली बातचीत के माध्यम से लेखक अपनी बात कहता चलता है यानि सामाजिक स्थितियों पर टिप्पणी भी करता चलता है । ‘मर्डर इन माहिम’ भले ही अपराध कथा हो लेकिन लेखक इसको अपराध से ज्यादा समाज और पात्रों पर अपराध के असर को लेकर ज्यादा चौकस दिखाई देता है । पात्रोंके बीच जब धारा तीन सौ सतहत्तर को लेकर, अदालतों द्वारा दो वयस्कों के बीच के अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध करार देने या फिर महानगर में अपनी मर्जी की जिंदगी के लिए छटपटाते मन को चित्रित करने की कोशिश इसको पठनीय बनाते हैं लेकिन कई बार अपराध कथा के तय खांचे से अलग भी लेकर चले जाते हैं ।

क्राइम फिक्शन में जिस थ्रिल की तलाश में पाठक रहते हैं वो जेरी की इस किताब में कई बार लेखक के ज्ञान से बाधित होती है । यह इस वजह से भी संभव है कि अपराध और अपराध की वजह और उसका प्रभाव भी उपन्यास में प्रमुखता से है । अपने एक इंटरव्यू में जेरी पिंटों ने माना भी है कि यह उपन्यास या क्राइम थ्रिलर समाज में व्याप्त स्थितियों को लेकर उनके गुस्से का प्रकटीकरण भी है । वो कहते हैं कि समाज की कबीलाई मानसिकता को लेकर उनके मन में बहुत दिनों से चल रहा था जिसको वो लगातार लिखते और सुधारते रहते थे, इस वजह से इस उपन्यास के दर्जनों ड्राफ्ट हुए। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि अगर जेरी ने लगातार अपराध कथा लिखते रहने की ठानी तो यह भारतीय क्राइम फिक्शन के लिए बेहतर होगा ।