मामोनी रायसम गोस्वामी,
जो साहित्य की दुनिया में इंदिरा गोस्वामी और असमिया समाज में बाइदेउ यानी बड़ी दीदी कही जाती हैं, हिंदी के पाठकों के लिए एक चीन्हा हुआ नाम है। हिंदी के पाठकों ने उनके उपन्यास ‘छिन्नमस्ता’ और ‘अहिरन’ के साथ ही साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कृति ‘जंग लगी तलवार’ को विशेष प्यार दिया है। जहां ‘छिन्नमस्ता’ शक्तिपीठ कामरूप-कामाख्या की पृष्ठभूमि पर आधारित है, वहीं ‘अहिरन’ छत्तीसगढ़ की एक नदी अहिरन पर निर्माणाधीन बांध के काम में लगे श्रमिकों की दुनिया से जुड़ा है। ‘जंग लगी तलवार’ में भी श्रमिकों की मजबूरी और बदहाली को विषय बनाया था। असमिया जीवन, समाज और संस्कृति की विविध छवियों वाला उनका विपुल साहित्य तो है ही, उनके साहित्य में विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों की वेदना छिपी है।
इंदिरा गोस्वामी के साहित्य में मौजूद इस वेदना का गहरा संबंध उनके निजी जीवन से भी रहा है। उनके जन्म के बाद ज्योतिषी ने कहा था कि इस लड़की के सितारे बहुत खराब हैं। हालांकि उनका जन्म एक पारंपरिक जमींदार परिवार में हुआ था और इनके पिता पढ़े-लिखे और नए विचारों के थे। रवींद्र साहित्य और संगीत से गहरा लगाव रखने वाली इनकी मां भी सुलझे विचारों की थीं। फिर भी, अपने जन्म से जुड़ी यह कहानी गोस्वामी भूल न सकीं। आजीवन भाग्य के इस लेखे को खंडित करने की इच्छा उनमें बनी रही।
जब कभी उनके जीवन में ऐसी कोई घटना घटती थी, जिससे ज्योतिषी की कही बात ठीक साबित होती हो, तो वे बहुत परेशान हो जाती थीं। इस कदर परेशान कि उन्हें भयंकर अवसाद घेर लेता था, उन्होंने एकाधिक बार आत्महत्या की कोशिश की थी। ऐसा ही एक प्रसंग विवाह के अठारह महीने बाद ही सड़क दुर्घटना में उनके पति की मृत्यु के समय का है। ऐसी हर बात से उन्हें लगता था कि भाग्य खंडित करने की उनकी इच्छा अधूरी रह गई है। अनायास नहीं है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा का शीर्षक ‘आधा लेखा दस्तावेज’ रखा है।
इंदिरा गोस्वामी मधुर बोलती थीं, लेकिन सच कहने का विवेक और विरोध सहने का साहस उनमें अपार था, ठीक महादेवी वर्मा की तरह। ‘छिन्नमस्ता’ में जब उन्होंने हिंसा और अहिंसा की दो विरोधी विचारधाराओं के बीच गरीबी, अशिक्षा और अंधविश्वासों से घिरे कामरूप के जीवन का चित्र अंकित करते हुए कामाख्या मंदिर में प्रचलित पशुबलि के विरोध में आवाज उठाई तो उन्हें वहां के पंडों का घोर विरोध सहना पड़ा था। उन्हें हत्या की धमकी तक दी गई थी। ‘नीलकंठी ब्रज’ में जब उन्होंने वृंदावन के मंदिरों में विधवाओं के शोषण से संबंधित विषय को उठाया तो वहां के पंडों ने भी उनके लिए कम परेशानी नहीं खड़ी की थी। सबसे बढ़ कर उन्होंने ‘उने खोवा हौदा’ यानी ‘दक्षिणी कामरूप की गाथा’ नामक रचना में उन्हीं सत्रों (मठों) की आलोचना की है, जिनमें से एक में उनका जन्म हुआ था।
असमिया समाज और संस्कृति पर श्रीमंत शंकरदेव के चलाए ‘सत्रों’ का विशेष महत्त्व है। इंदिरा गोस्वामी ने इन सत्रों (मठों) के परिवेश, रूढ़ धार्मिक सिद्धांतों और इनके भीतर व्याप्त दकियानूसी मान्यताओं पर करारा चोट किया है। एक परंपरागत समाज के भीतर यह बड़े साहस की बात है।
साहस की बात यह भी थी कि उन्होंने तमाम विरोधों के बावजूद एक विजातीय दक्षिण भारतीय युवक से विवाह किया था। बाद में एक विधवा का जीवन जीते हुए भी उन्हें सजना-संवरना खूब पसंद था। आकर्षक दिखने को वे स्त्रियों की आजादी और अधिकार से जोड़ कर देखती थीं। जो लोग उनसे मिल चुके हैं, क्या कभी उनके ललाट पर सजी बड़ी-सी लाल टिकुली और आंखों के गहरे काजल को भूल सकेंगे? परिवार के लोगों से उन्होंने कहा था कि ‘जब तक मैं जीवित हूं मैं खुद को सजा-संवार कर रखूंगी, लेकिन मेरे मरने के बाद तुम लोग यह काम कर देना’।
असम में तीन दशक से भी ज्यादा समय से चल रहे विद्रोह और हिंसक आंदोलनों के बीच इंदिरा गोस्वामी अपनी विशिष्ट सामाजिक भूमिका के साथ सामने आती हैं। वे असम से प्यार करती थीं और राज्य में अमन का माहौल देखना चाहती थीं। उन्होंने ‘जात्रा’ में असम के विद्रोह को विषय बनाया। उनका मानना था कि साहित्यकार अपने समाज का ही एक चेहरा होता है, उसके साहित्य में समाज झलकता है। इसलिए साहित्यकारों को केवल अपने समाज की सुंदर छवियों को दिखाने का प्रयास नहीं, बल्कि जो असुंदर है उसे सुंदर बनाने में अपनी विशिष्ट प्रतिभा और क्षमता का उपयोग भी करना चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने उल्फा के साथ शांति वार्ता की एक राह निकालने की कोशिश की थी। यह उनके साहस की ही एक मिसाल है कि उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।
हिंसा छोड़ने की बात करने वाली इंदिरा गोस्वामी को हिंसक आंदोलनों में लिप्त उल्फा के नेता इस रूप में याद करते हैं कि उन्होंने उसके आदर्श, उद्देश्य और दर्शन को सही तरीके से भारत सरकार के सामने रखा था। यह बात ध्यान देने की है कि उन्होंने अपने सहकर्मी, राजनीति विज्ञान के विशेषज्ञ मनोरंजन मोहंती के परामर्श से एक शांति प्रस्ताव तैयार कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने रखा था। उनके प्रयासों से ही 2003 में ‘पीपुल्स कंसल्टेटिव ग्रुप’ की स्थापना हुई थी। अभी असम के विभिन्न विद्रोही संगठनों की भारत सरकार के साथ जो बातचीत संभव हो पा रही है उसके पीछे इंदिरा गोस्वामी की इन ईमानदार कोशिशों की बड़ी भूमिका है।
वे कहती थीं कि उनके स्त्री चरित्रों- सौदामिनी, नारायणी, गिरिबाला आदि में कहीं न कहीं वास्तविक जीवन की शोषित-दमित स्त्रियों और उनका अपना जीवन भी उभर कर आता रहा है। सामाजिक मुद्दों पर लिखने के लिए इंदिरा गोस्वामी गंभीर अध्ययन और समाज के भीतर तक पैठ को जरूरी चीज मानती थीं। ‘छिन्नमस्ता’ उपन्यास उन्होंने देवीपीठ कामाख्या के इतिहास और लोककथाओं से सामग्री लेने के साथ-साथ मंदिरों में दीर्घकाल तक रह कर अनुभव प्राप्त करने के बाद लिखा था। पशुबलि विरोध जैसे एक ज्वलंत और धार्मिक कर्मकांड से जुड़े विषय पर लिखते समय इंदिरा गोस्वामी ने तर्क, चिंतन और शास्त्रों के प्रमाणों का सहारा लिया है।
‘नीलकंठी ब्रज’ भी उनके देखे वृंदावन के ‘राधेश्यामी’ विधवा महिलाओं के जीवन और अनुभव पर आधारित है। अपने अभियंता पति के साथ रहते हुए कश्मीर और तत्कालीन मध्यप्रदेश के अनुभवों के आधार पर उन्होंने ‘चेनाबेर स्रोत’ और ‘अहिरन’ की रचना की थी। दिल्ली के शक्तिनगर में रहते हुए चौरासी के सिख विरोधी दंगों में हिंसा के तांडव को उन्होंने नजदीक से देखा और महसूस किया था। हिंसा का विरोध करने वाली उनकी स्पष्ट और मुखर मान्यता इसी घटना से उत्पन्न हुई थी। निकट से देखे जाने वाली बात को वे इतना महत्त्व देती थीं कि जब उन्हें वेश्याओं के जीवन से जुड़ी जानकारियों की जरूरत पड़ी तो खुद उन्होंने जीबी रोड जाकर उन लोगों से मिलना मुनासिब समझा।
असम के लोग असमिया जातीय जीवन में बहुत गहरे बसी एक बड़े और सम्मानित साहित्यकार के रूप में अपनी मामोनी को तो याद करते ही हैं, समाज में शांति की स्थापना के लिए उनके प्रयासों के प्रति भी उनके मन में कृतज्ञता का भाव है और सबसे बढ़ कर इंदिरा गोस्वामी को वे एक बड़ी दीदी, संरक्षक, प्रेम करने वाली और बड़े दिल वाली लेखिका मानते हैं।जनसत्ता से
प्रभात कुमार मिश्र
prabhat432@gmail.com


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