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हिंदी साहित्य में हर दौर में आलोचना को लेकर लंबी बहसस होती रहती है । बहुधा आलोचकों पर आरोप लगते हैं कि अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं । पर हाल के दिनों में रचनाकारों का आलोचकों को सर्टिफिकेट देने की प्रवृत्ति काफी बढ़ी है हलांकि हिंदी आलोचना के अभी इतने बुरे दिन नहीं आए हैं कि उनको रचनाकारों के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता पड़े । अगर हम गंभीरता से विचार करें तो रचनाकार और आलोचक के बीच के झगड़े का कोई अर्थ नहीं है । कुछ उत्साही लेखक तो आलोचना को रचना का परजीवी तक करार दे देते हैं । उनके तर्क होते हैं कि रचना ना हो तो आलोचना कैसे होगी । सतह पर या प्रत्यक्ष रूप से यह तर्क ठीक प्रतीत हो सकता है लेकिन रना और आलोचना कं संबंधों को जाननेवालों की राय अलग होती है । रचना के बगैर आलोचना के अस्तित्व को नकारने वाले यह भूल जाते हैं कि बगैर आलोचना के रचना भी नहीं हो सकती है । प्रत्य़क्ष और अप्रत्यक्ष के इस संबंध को पहचान नहीं पाने की भूल अक्सर साहित्य से जुड़े लोगों को हो जाती है ।

रचना और आलोचना को आमने सामने ऱड़ा करना भी लगभग अज्ञानता की ही बात है । अगर हम विचार करें तो आलोचना जहां रचना के अंदर की संवेदना के रेशे रेशे को अलग कर देखने का प्रयत्न है वहीं रचना में संवेदना अपने अखंड रूप में सृजित होती है । एक जगह पर आकर रचना और आलोचना दोनों मिलती है वह है भाषा । कई बार जो आनंद रचना की भाषा को पढ़कर होता है वैसा हीआनंद आलोचना की भाषा में भी प्राप्त होता है और कई बार तो आलोचना को पढ़ते हुए रचना का आस्वाद मिलता है । एक आलोचक ने लिखा भी है - आलोचना रचना है इसका एक अर्थ यह भी है कि अच्छी आलोचना रचना की तरह ही भाषा का शास्त्रीय नहीं बल्कि सृजनात्मक उपयोग करती है, जिससे उसे पढ़ते समय तक एक स्तर पर रचना को पढ़ने का आनंद मिलता है । जैसे रचना की एक कचना प्रक्रिया होती है, वैसे ही निश्चित रूप से आलोचना की भी । उदाहरण के तौर पर नामवर सिंह जब साठ के दशक में नई कहानियां में स्तंभ लिखते थे तो उस वक्त उसको पढ़ते हुए पाठकों को रचना का आस्वाद मिलता था । इसी तरह से अगर हम विजयदेव नारायण साही का लेख- शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट को पढ़े तो ऐसा लगता है कि कोई बेहतरीन रचना पढ़ रहे हों ।

यह लेख सृजनात्मक आलोचना का बेहतरीन नमूना माना जा सकता है । हलांकि कुछ आलोचर इसके कथ्य को लेकर सवाल खड़े करते रहे हैं । इसी तरह से नामवर सिंह की किताब दूसी परंपरा की खोज भी सृजनात्मक आलोचना का शिखर है । रचनात्मक भाषा को छोड़कर आलोचना ने रूढ भाषा को आलिंगनबद्ध कर लिया । इसके अलावा एक और दोष का शिकार हिंदी आलोचना हुई । हिंदी के आलोचकों ने अपने लेखों में अपने पांडित्य का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया और एक विदेशी विद्वानों के हवाले से एक ऐसी शब्दावली विकसित कर दी जो हिंदी के आम पाठकों के समझ से बाहर की चीज होने लगी । विश्वविद्यालयों के शिक्षकों का इस तरह की आलोचना में मुख्य योगदान है । पूरी तैयारी के साथ आलोचना लेखन का स्थान सरसरी तौर पर रचना का परिचय देने और सार संक्षेप बताने तक सीमित होने लगा । यह वैसा ही हुआ कि हाईवे पर जाने की बजाए हिंदी आलोचना ने आसान पगडंडियां ढूंढनी शुरू कर दी ताकि कठिन रास्ते से जाने का श्रम नहीं करना पड़े । आलोचकों और समीक्षकों ने भी हाल के दिनों में साहस के साथ लिखना छोड़ दिया है । कुछ साल पहले हिंदी की वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन से कहा था कि अब रचानाकरों में अपनी आलोचना सुनने पढ़ने का धैर्य नहीं रहा और अपनी रचना के खिलाफ लिखा उनको पसंद नहीं आता है । इस नापसंदगी की मार आलोचक को झेलनी पड़ती है क्योंकि रचनाकार उनसे दुश्मनी पाल बैठते हैं । तब भी मैंने लिखा था कि आलोचक का बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहना छोड़ देना साहित्य के लिए अच्छी स्थिति नहीं है ।

दरअसल आलोचना को जब से नारेबाजी की शक्ल दी गई या जब से आलोचना ने अपनी दृष्टि संकुचित कर ली तब से उसके पाठक कम होने लगे । हमारे आलोचक यह भी भूलने लगे कि आलोचना राजनीति नहीं है जिसमें समझौते की कोशिश की जाए या दोनों पक्षों की सहूलियतों का ध्यान रखा जाए । आलोचना का रास्ता दायित्व और विवेक का रास्ता है जिसको बेहतर ढंग से समझकर उसको अपने लेखन में अपनाया जाए । लेकिन मार्क्सवाद के सोवियत संस्करण के प्रभाव में लिखी जानेवाली आलोचना इस बात को समझ नहीं पाई । विचारधारा के जकड़न और गुलामी में लिखी गई आलोचना पथभ्रष्ट होती चली गई । कलांतर में सोवियत मार्क्सवाद के प्रभाव में ज्यादातर आलोचना उद्धरणों की विधा बनकर रह गई । अगर आप हिंदी के कई आलोचकों का लेखन देखें तो विदेशी विद्वानों के, विदेशी आलोचकों के एक एक पन्ने का उद्धरण फिर उसको आगे बढ़ाने के लिए एक वाक्य और फिर एक पन्ने का उद्धरण । इस तरह की आलोचना का एक नुकसान यह हुआ कि पाठकों उसको पढ़ने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा । उसको लगने लगा कि उसने तो अमुक का नाम देखकर किताब खरीदी थी लेकिन इसमें ज्यादातर तो राय दूसरे या विदेशी विद्वानों की है । इसके अलावा इस पद्धति का एक और दोष जो सामने आया वो ये कि इसने अपनी परंपरा और समृद्ध साहित्यक विरासत को हाशिए पर डालकर आलोचना की एक ऐसी पद्धति अपनाई जो विदेशी विद्वानों की अवधारणाओं पर आधिरत हो गई । विचारधारा विशेष के प्रभाव में लिखी जा रही आलोचना ने जानबूझकर भारतीय क्लासिक्स को दरकिनार करना शुरू कर दिया । उससे उद्धरण लेने की जरूरत ही महसूस हीं हुई । कोई भी आलोतर यह कहने का साहस नहीं जुटा पाया कि महाभारत पूरी दुनिया में किसी भी भाषा में लिखा गया सबसे बड़ा क्राइम थ्रिलर है । महाभारत का इस आधार पर मूल्यांकन नहीं होने का नतीजा यह रहा कि हमारी विरासत की इस अहम कृति को वैश्विक स्तर पर वो मान्यता नहीं मिल पाई जिसकी वो हकदार है । अब अंग्रेजी के लेखकों ने छोटे-छोटे महाभारत लिखकर शोहरत कमाना प्रारंभ कर दिया है तब जाकर भी हमारे आलोचकों की तंद्रा भंग नहीं हो पाई है । एक और विवाद उठाने की कोशिश की गई कि हिंदी में रचनाकार आलोचकों की कमी है । रचनाकार आलोचना की ओक नहीं जाते हैं । इसकी वजह को समझने की जरूरत है । रचनाकार जब आलोचना लिखता है तो उसके अवचेतन मन में अपनी खुद की रचनना होती है । जो उसको अपने बाड़े से आगे जाने से बार-बार रोकती है जिसका नतीजा उसके लेखन के स्वकेंद्रित हो जाना होता है । अगर आलोचना को एक विधा के तौर पर मजबूत करना है तो उसको विचारधारा की जकड़न, गुलामी से तो मुक्त होना ही होगा साथ ही उद्धरणों से आगे जाकर अपनी बात कहने का हुनर भी विकसित करना होगा ।