जीवन वृत्तान्त - प्रमोद वर्मा

प्रकाशन :7/1/2009
जयप्रकाश मानस

प्रमोद जी प्रमोद वर्माके जीवन और समग्र लेखन में जाने से पहले उनके निजी जीवन की पृष्ठभूमि और पुरखौती से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण विवरण इस तरह से हैं। सूरजपूरा जिला आरा, बिहार के मूल निवासी श्री बुनियाद लाल और उनके बेटे श्री उजियार सिंह के पुत्र श्रीराम जीवन लाल तथा इनके पुत्र द्वय श्री अक्षैवर लाल तथा श्री द्वारिका प्रसाद हुए, विरंचि देवी से जन्मे श्री रामचन्द्र लाल वर्मा और श्रीमती जानकी देवी थे। श्री रामचन्द्र लाल वर्मा और श्रीमती यदुवंशी देवी, प्रमोद जी के दादा-दादी हुए। जीवन के उतार-चढ़ाव में पड़कर संघर्ष करते हुए, संकल्पशक्ति के धनी मुंशी रामचन्द्र लाल वर्मा बिलासपुर बिहार से माइग्रेट होकर आए तथा अपने समय और समाज की मुख्यधारा का अपरिहार्य अंग बन गए। दीवानी मामलों के जाने-माने मुख्तियार श्री रामचन्द्र लाल वर्मा की दस सन्तानें हुईं। ज्येष्ठ पुत्र गोपालचन्द्र वर्मा, द्वितीय पुत्र विद्याचन्द्र लाल वर्मा, तृतीय कृष्णचन्द्र लाल वर्मा, चतुर्थ पुत्र निर्मल चन्द्र वर्मा तथा पंचम पुत्र ज्ञान चन्द्र लाल वर्मा हुए और पाँच पुत्रियाँ क्रमशः श्रीमती हूबिया देवी, श्रीमती लखिया देवी, श्रीमती राजकली देवी, श्रीमती सीता देवी तथा श्रीमती शान्ति देवी हुईं। प्रमोद जी के बड़े पिता की सबसे बड़ी बेटी श्रीमती शकुन्तला वर्मा का विवाह 1937 में कानपुर केमिकल वर्क्स लिमिटेड के चीफ इंजीनियर पद से अवकाश प्राप्त स्व. श्री रघुनाथ प्रसाद श्रीवास्तव से हुआ था। स्व. प्रधानमन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री की पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री उनकी सगी बुआ सास थीं। शकुन्तला वर्मा के विवाह में बारातियों में श्री लालबहादुर शास्त्री भी शामिल थे।
 

प्रमोद वर्मा के पिता श्री विद्याचन्द्र वर्मा और माँ श्रीमती चन्द्रमणि वर्मा थीं। पिता श्री विद्याचन्द्र लाल वर्मा ने 1987 को रायगढ़ जिला कांग्रेस कमेटी के आग्रह पर अपनी वंशावली और अपनी जीवनी लिपिबद्ध करते हुए भारत शासन को प्रेषित की थी। उन्होंने अपनी सन्तानों और बहुओं को इसकी प्रति देते इसे ‘पिता की ओर से पुरस्कार’ लिखा था। साम्राज्यवादी उपनिवेश में बदल चुके पराधीन हिन्दुस्तान का यह वह समय था, जब स्वतन्त्रता का निर्णायक संघर्ष जारी था। स्व. विद्याचन्द्र लाल वर्मा दरअसल स्वराज और स्वदेशी की मूल अवधारणा को जीवन में घटित करने पर विश्वास रखनेवाले पिता की सन्तान थे। सत्य, अहिंसा, अस्तेय और 1920 में असहयोग आन्दोलन से लेकर भारत की राजनीति में प्रवेश कर चुके गाँधी के आदर्शों पर प्रमोद जी के दादा जी का अखंड विश्वास था। प्रमोद जी के पिता स्व. श्री विद्याचन्द्र लाल वर्मा ने अपनी जीवनी में स्पष्ट लिखा है कि अंग्रेजों द्वारा दी गई व्यवस्था का विरोध एक विशुद्ध असहमति वादी की तरह करते हुए मुंशी रामचन्द्र लाल वर्मा ने अपने बड़े बेटे को सरकारी नायब तहसीलदारी से रोका और ब्रिटिश काले कानूनों का तत्कालीन दौर देखकर अपनी स्थापित हो चुकी वकालत छोड़ दी। प्रमोद जी के पिता स्व. श्री विद्याचन्द्र लाल वर्मा ने भी सत्याग्रह आन्दोलन के कारण 1921 में मैट्रिक की पढ़ाई छोड़ दी और सत्याग्रही हो गए। उनके इस निर्णय से प्रमोद जी के दादा मुंशी रामचन्द्र लाल वर्मा जरा भी दुखी नहीं हुए। 1923 में विवाहोपरान्त ही विद्याचन्द्र वर्मा काशी विद्यापीठ जाकर पढ़ाई पूरी कर सके। विद्यापीठ में पंडित कमलापति त्रिपाठी और श्री लालबहादुर शास्त्री उनके सहपाठी हुए लेकिन सत्याग्रही जत्थों और छोटे-छोटे जन-आन्दोलनों के कारण परतन्त्रता के विरुद्ध सक्रिय राजनीति करने वे सन् 1926 के बीच पढ़ाई छोड़कर बिलासपुर आ गए। स्वतन्त्राता आन्दोलनों में शामिल होने की दारुण सजाएँ भी मुंशी रामचन्द्र लाल वर्मा को झेलनी पड़ी। बड़े बेटे गोपाल चन्द्र लाल वर्मा को उन्होंंने स्वयं सरकारी नौकरी नहीं करने दी। दूसरे बेटे यानी प्रमोद जी के पिता विद्याचन्द्र लाल वर्मा सत्याग्रही हुए औरसन् 1942 को प्रमोद जी के बड़े चाचा सेना में शामिल हो गए। 1942 को ही प्रमोद जी के छोटे चाचा कृष्णचन्द्र लाल वर्मा को सत्याग्रही होने के कारण छह माह का कठिन कारावास मिला। अक्षत तिलक लगाकर प्रमोद जी के दादाजी ने अपने इस चतुर्थ पुत्रा को कारागार भेजा। उनके इस छोटे चाचा की वापसी नहीं हुई। जेल में ही उनकी मृत्यु हुई। मुंशी रामचन्द्र लाल वर्मा मूलतः गाँधीवादी और राष्ट्रवादी थे। जालियाँवाला बाग हत्याकांड और भगतसिंह और उनके साथियों को फाँसी की सजा के बाद उन्होंने दुखी होकर गजलें भी लिखीं ‘‘जिए तो बदन पर स्वदेशी वसन है। मरे भी अगर तो स्वदेशी कफन है।’’ (सन्दर्भः जीवनीः स्व. श्री व्ही.सी.एल. वर्मा) 

मुंशी रामचन्द्र लाल के परदादा उजियार सिंह की पत्नी को प्रमोद जी के सारे पुरखे अपने वंश की कुल देवी के रूप में आज तक आराध्या मानते हैं। मुंशी रामचन्द्र लाल वर्मा 1907 में ही अपनी इस दादी की स्मृृति में सूरजपुरा जाकर एक चबूतरा बना आए थे। जीवनी लिखते हुए प्रमोद जी के पिता विद्याचन्द्र लाल वर्मा ने सहज रूप से स्वीकार किया है कि उनका परिवार सूरजपूरा जमींदारी जिला आरा जिसे शाहाबाद भी कहते हैं, से सम्बन्ध रखता है, प्रान्तों के विलीनीकरण के पूर्व इस रियासत के अन्तिम जमींदार और हिन्दी के जाने-माने हस्ताक्षर राजा राधिका रमण सिंह मुंशी रामचन्द्र लाल वर्मा को चाचा मानते थे। मुंशी रामचन्द्र लाल वर्मा बिहार प्रान्त से सटी हुई सरगुजा की सीमा तक पैदल ही आए थे। तत्कालीन बिलासपुर में प्रमोद जी के दादाजी के सगे बड़े चाचा श्री अछेवर लाल जो खुद एक सरकारी मुलाजिम थे उनके साथ रहने लगे। इस तरह शब्दके तिलिस्म में बुरी तरह गिरफ्तार प्रमोद जी की जड़ें राजा राधिका रमण सिंह से जुड़ती हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्चस्व रखनेवाले आचार्य सम्पूर्णानन्द भी प्रमोद जी के पिता के राजनीतिक सहयात्राी थे। कई प्रसंगों पर सम्पूर्णानन्द जी रायगढ़ आए थे। न्द प्रमोद आचार्य सम्पूर्णानन्द के छोटे भाई डॉ. परिपूर्णान जी की सगी बुआ के पति होने के नाते उनके फूफा थे।


     पिता श्री विद्याचन्द्र लाल वर्मा की पहली पत्नी स्व. श्रीमती चन्द्रमणि देवी से तीन पुत्रा और तीन पुत्रिायों का जन्म हुआ। ज्येष्ठ सन्तान कन्या थी। दीदी यानि श्रीमती चन्द्रप्रभा श्रीवास्तव, सन्तानों में दूसरे क्रम पर प्रमोद जी थे। प्रमोद जी के बाद सुबोध वर्मा, विनोद चन्द्र वर्मा के अलावा दो बहनें और हुईं। मँझली बहन श्रीमती चन्द्रकान्ता श्रीवास्तव (शशि) सुश्री चन्द्रभागा वर्मा (गिन्नी) ये दोनों बहनें प्रमोद जी के गृहस्थ होने तक साथ रहीं और सुबोध जी की बेटी मीनू (मनीषा) बहन चन्द्रकान्ता की एक मात्रा सन्तान पुत्रा बब्बू (तथागत) के साथ बीते जीवन के अधिकतम वर्ष प्रमोद जी के लिए अपनी अस्मिता का ही पर्याय थे। प्रमोद जी ने सुबोध जी की बेटी मीनू को बेटी के रूप में स्वीकार किया था। रायगढ़ में प्राध्यापक और प्राचार्य रहते हुए प्रमोद जी ने अपनी सृजन यात्राा का एक बड़ा हिस्सा पूरा किया। प्रमोद जी के पिता स्व. श्री विद्याचन्द्र लाल वर्मा की दूसरी पत्नी नगीना देवी हुईं। सबसे पहले ठीक उसी क्रम में सर्वप्रथम कन्या श्रीमती चन्द्र किरण श्रीवास्तव फिर भाई समोद चन्द्र वर्मा हुए। ये महज संयोग नहीं है कि पिता की बाकी सन्तानें भी उसी क्रम से हुईं जिस क्रम से प्रमोद जी की माताश्रीमती चन्द्रमणी को हुई थीं। प्रमोद चन्द्र वर्मा के बाद उत्तम यानी मनोज चन्द्र वर्मा और सबसे छोटे भाई प्रबोध चन्द्र वर्माहुए। बहनें चन्द्र रेखा और चन्द्र ज्योति बाद में हुईं। एक बड़े संयुक्त परिवार का समृद्ध सांस्कृतिक परिदृश्य प्रमोद वर्मा के लिए विरासत बना।

     सेवानिवृत्त होने के बाद प्रमोद जी ने अपने छोटे चाचा के द्वितीय पुत्रा श्री सुभाषचन्द्र वर्मा और छोटे भाई श्री समोद चन्द्र वर्मा के आग्रह पर पैतृक नगर बिलासपुर (छ.ग.) में ही स्थाई आवास बनाया। सुख-दुख में प्रमोद जी का साथ सुभाष जी और समोद जी ने ही हमेशा दिया, वे प्रमोद जी के बाद उनके परिवार का ख्याल अब भी रखते हैं।


     1942 में जब उनकी उम्र मात्रा 13 वर्ष ही थी इनकी माता जी का देहान्त हो गया। मातृछाया से वंचित प्रमोद जी जाहिर है बचपन से ही भावुक और अन्तर्मुख होते चले गए। वैसे तो प्रमोद जी को पिता का प्यार पूरी तरह से मिलता रहा था लेकिन वो माँ की सन्तान ज्यादा थे। माँ की यादें हमेशा से प्रमोद जी के मन में रही चली आई हैं। उम्र के इस पड़ाव में आने के बाद भी प्रमोद जी के मन में उनकी अमिट छाप दिखाई दे जाती है। उनकी रचनाओं में भी कई रूपों में उनके दर्शन होते हैं।


     माँ की मृत्यु के बाद प्रमोद जी के पिता ने दूसरी शादी कर ली। प्रमोद जी पहले ही छह भाई-बहन थे। बाद में दूसरी माँ से भी छह भाई-बहन हुए। इनमें एक बहन ‘कमला जी’ बड़ी हैं। उसके बाद प्रमोद जी ही सबसे बड़े थे।

     प्रमोद जी की बचपन से ही पढ़ने-लिखने में रूचि थी। अतः जब उन्होंने प्राइमरी की परीक्षा दी तब उनके पिता श्री विद्याचन्द्र लाल जी ने उन्हें रायगढ़ की एकमात्रा लाइब्रेरी जो कि टाउन हॉल में थी का सदस्य बना दिया था और इस तरह जब उनकी साहित्य यात्राा आरम्भ हुई तब वे बालक ही थे। मैट्रिक तक की शिक्षा वर्मा जी ने रायगढ़ से ही प्राप्त की, मैट्रिक के बाद विज्ञान विषय की शिक्षा प्राप्त करने प्रमोद जी कानपुर गए किन्तु जैसा कि स्वयं स्वीकारते हैं ‘‘साहित्य एक तिलिस्म है’’ वर्मा जी तब तक इसी साहित्य तिलिस्म के जाल में फँस चुके थे और यह तिलिस्म उन्हें विज्ञान से खींच लाया।

     अन्ततः प्रमोद जी ने विज्ञान की पढ़ाई बन्द कर दी। तत्पश्चात् प्रमोद जी ने नागपुर के ‘मारिस कॉलेज’ से दर्शनशास्त्रा, राजनीति तथा हिन्दी साहित्य विषयों के साथ 1951 में बी.ए. के बाद 1953 में हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। ये दिन प्रमोद जी के लिए विशेष सक्रियता के दिन रहे। प्रमोद जी जब नागपुर अध्ययन हेतु गए तो उन्हें वहाँ अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त हुईं।इन महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में ‘‘आचार्य विनय मोहन शर्मा’’ तथा ‘‘गजानन माधव मुक्तिबोध’’ शामिल हैं।

     सन् 1944-45 तक प्रमोद जी को साहित्य के तिलिस्म ने यकीनन गिरफ्तार कर लिया था। माता जी के देहान्त के बाद भावुक हृदय वर्मा जी ने स्वयं को पूरी तरह साहित्य को समर्पित कर दिया। सन् 1942 में ही प्रमोद जी ने अपनी पहली कहानी लिखी थी। इन्हीं दिनों प्रमोद जी ने आनन्दी सहाय शुक्ल, काशी प्रसाद मिश्र आदि के साथ मिलकर रायगढ़ में साहित्य के क्षेत्रा में काफी काम किया। इन कामों में नाटकों एवं कवि गोष्ठियों के अलावा ‘इंगित’ और ‘अरूणा’ नामक हस्तलिखित पत्रिाकाएँ भी थीं। इन गतिविधियों के लिए प्रमोद जी को ‘महादेव प्रसाद मिश्र, अतीत’ तथा रघुवंश प्रसाद तिवारी ‘बिन्दु’ का आशीर्वाद प्राप्त था।

     रायगढ़ में प्रमोद जी अपने समय के प्रसिद्ध एवं श्रेष्ठतम साहित्यकारों के सम्पर्क में आए। इनमें ज्वाला प्रसाद मिश्र, आनन्द मोहन बाजपेयी, बनमाली प्रसाद शुक्ल (जो उनके गुरु भी थे) बन्दे अली फातमी, लोचन प्रसाद पांडेय तथा मुकुटधर पांडेय प्रमुख हैं। जब प्रमोद जी अध्ययन हेतु कानपुर गए तो वहाँ अपने फूफा परिपूर्णानन्द जी के यहाँ ठहरे। परिपूर्णानन्द जी के बड़े सुपुत्रा सर्वदानंद जी अपने समय के एक बड़े उपन्यासकार थे। इसके अलावा कानपुर में ही प्रसिद्ध कवि स्नेही जी से हुई, साथ ही विश्वंभर नाथ शर्मा, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, शान्तिप्रिय द्विवेदी, भगवती चरण वर्मा आदि का भी सान्निध्य मिला। इस प्रकार प्रमोद जी का कानपुर प्रवास उनकी साहित्यिक गतिविधियों को तेज करने वाला ही साबित हुआ।

     नागपुर में प्रमोद जी की मुलाकात मुक्तिबोध जी से हुई। उनके जीवन में आने वाले अनेक प्रमुख लोगों में मुक्तिबोध भी थे जिन्होंने उन्हें खासा प्रभावित किया। नागपुर में पढ़ाई के समय तकरीबन रोज ही उनसे मुलाकात हो जाया करती थी। इसकी एक खास वजह भी थी। मुक्तिबोध जी प्राइवेट एम.ए. की तैयारी के कारण तथा दूसरे अपनी स्वाभाविक ललक के कारण प्रमोद जी से तथा प्रमोद जी उनसे जुड़ गए। हालाँकि प्रमोद जी को प्रेमचंद, प्रसाद, मुक्तिबोध ने अत्यधिक प्रभावित किया लेकिन अज्ञेय भी उनके मन में कहीं गहरे छाए हैं।

     वैसे तो लेखन प्रमोद जी ने 15 16 वर्ष के उम्र से प्रारम्भ कर दिया था लेकिन अन्य साहित्यकारों की तरह अपने नाम की कोई भी किताब बाजार में नहीं आई। प्रमोद जी पहले पत्रिकाओं में छपते रहे थे जिनमें ‘अजन्ता’, ‘राष्ट्रवाणी’, ‘नई दिशा’,‘वसुधा’, ‘हंस’, ‘कृति’, ‘कल्पना’ आदि पत्रिाकाएँ प्रमुख हैं। प्रमोद जी की पहले पहल सन् 1971 में ‘साहित्य-रूप’ साक्षात्कार तथा बाद में ‘अंगे्रजी की स्वच्छन्द कविता’ प्रकाशित हुईं। बाद में 1973 में ‘हलफनामा’ और ‘रोमान की वापसी’ 1980 में ‘कविता दोस्तों में’ आदि किताबें आईं। तत्पश्चात् ‘कल और आज के बीच’ और ‘बुलाने से नहीं आती नदी’ का प्रकाशन हुआ।

     इसके अलावा डायरी के रूप में ‘यात्राा दुस्वार’ रचनाधीन रहा। एक अनाम उपन्यास और साहित्य अकादमी की ओर से मुक्तिबोध पर एक मोनोग्राफ, नाटक ‘लम्बा मारग दूरि घर’ आदि वर्मा जी की अनेक रचनाएँ हैं।

     पेशे से शिक्षक प्रमोद जी ने अपनी मनोभिव्यक्तियों का साधन लेखन को ही माना। उनके अध्यापकीय जीवन का अनुभव लेखक के रूप में उनकी चिंता को गहराता है।। प्रमोद जी शिक्षा के क्षेत्रा में आए गिरावट रूपी मरुस्थल में भी कुछ उगानेकी चेष्टा या दुस्साहस करते रहे हैं। सांस्कृतिक शून्यता और मूल्यहीनता के इस युग में बिना किसी अधिकार के कुछ नया और सृजनात्मक करने की गुजांइश इन दिनों कम होती जा रही है। आत्मीयता का अभाव मूल्यहीनता को जन्म देता जा रहा है। परिवार से राष्ट्र और विश्व तक आदमी संवेदनहीन हो गया है। मौजूदा व्यवस्था को बदलने के लिए क्रान्ति के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं परन्तु क्रान्ति के लिए बुनियादी शर्त, वे दूसरों के दुख, शोषण और उत्पीड़न का गहरा एहसास को मानते हैं जो आत्मीय संवेदनशीलता के बिना संभव नहीं है। इसी के बिना वर्तमान समाज में मूल्यों के प्रति उपेक्षा और तिरस्कार व्याप्त है। प्रमोद जी किसी मूल्य का बोध कराने के लिए मानव-मानव के बीच आत्मीयता का सेतु होना अनिवार्य मानते हैं।

     जीवन के प्रारम्भिक काल में घर का आत्मीय वातावरण तथा बाद में भोगे हुए जीवन के कटु अनुभवों ने प्रमोद जी के व्यक्तित्व के निर्माण में जिस संवेदन की उष्मा भरी उसमें एक ओर मानवीय मूल्यों के प्रति स्नेह तो दूसरी ओर छल और कपट के वातावरण से विरक्ति, प्रमोद जी की कविताएँ सरल, सहज मानवीय अभिव्यक्तियाँ ही तो हैं।

     प्रमोद जी के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। किन्तु प्रमोद जी के अनुसार जीवन में जो कुछ महत्त्वपूर्ण घटा हो तो वह भीतर ही ज्यादा घटता रहा है बाहर की तुलना में। उनकी एक काव्य पंक्ति ही है कि
‘‘भटकाव भरी यात्राएँ कभी खत्म नहीं होतीं सिर्फ उनकी दिशा बदल जाती है।’’

      पारिवारिक जीवन की धूप-छाँव को प्रमोद जी ने सदैव समभाव से लिया। परिवार पर आए कुछ दिनों के आर्थिक दबावों की वजह से वर्मा जी के नाजुक कन्धों पर अपने परिवार की सारी जिम्मेदारी आ गई। इसी वजह से वे अपनी निजी जिन्दगी के बारे में बहुत कम सोच पाए।

     प्रेम उनके लिए जीवन का ही पर्याय था। प्रेम उनके जीवन में एक विलम्बित राग की तरह बजता रहा। अन्ततः सांसारिक अर्थों में 1980 को उन्होंने विवाह किया, घर बसाया। सहधर्मिणी कल्याणी जी बनीं।

     सृजन कर्म ही उनका मूल कर्म है। वे नव स्वतन्त्रा देश की अधीन और सुशिक्षित पहली पीढ़ी थे। राजनीति और अमानवीयराजनीति की निरन्तर कठोर हो रही जकड़बन्दी के विरुद्ध वे एक मुकम्मिल मनुष्य संस्कृति के हस्तक्षेप का विश्वास रखनेवाले बौद्धिकों में हैं।

     उनकी सुदीर्घ शब्द साधना उनकी विचार यात्राा का ही प्रतिफलन है। वे उन यशः कार्य कवि-लेखकों में से हैं जिनकी एककिताब ‘हलफनामा’ राज्य शासन के संस्कृति विभाग द्वारा 1979 को पुरस्कृत हुई। सन् 1992 में उन्हें म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन में ‘भवभूति अलंकरण’ से विभूषित किया और 1995 में उन्हें म.प्र. के तत्कालीन राज्यपाल और मुख्यमन्त्री ने एकमहत्त्वपूर्ण समारोह में वरिष्ठ लेखक ‘स्वर्गीय श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी’ जी की स्मृति में भिलाई में स्थापित ‘बख्शी पीठ’का पहला अध्यक्ष मनोनीत किया। वे अध्यक्ष ‘बख्शी सृजन पीठ’ की हैसियत से छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों में साहित्यिक,सांस्कृतिक हलचलें आयोजित करने में सक्रिय रहे। वैसे भी वे अपनी कई कविताओं में मन, आत्मा के अलाव को जलाए रखने की छोटी-सी लेकिन बहुत जटिल लगती, आकांक्षा को व्यक्त करते हैं। कवि शब्द कर्मी का यह अलाव जलता ही रहा। अन्त तक उनका भवभूति जैसा यह विश्वास भी नहीं टूटा कि काल निरवधि है और ‘धरित्रिा विपुला’ कभी-न-कभी, कोई न कोई मेरा समान-धर्मी होगा ।


  जयप्रकाश मानस
एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल,
आवासीय परिसर पेंशनवाड़ा, विवेकानंद नगर,
रायपुर, छत्तीसगढ़-492001
srijangatha@gmail.com
 
         
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