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यात्रा दुस्वार ( योरोप की डायरी )

प्रकाशन :बुधवार, 1 जुलाई 2009
प्रमोद वर्मा
बुधवारः 17 मई

गॉथेनबर्ग आये बहत्तर घंटे से ऊपर हो गये। पता ही नहीं चला। इतवार 14 तारीख की सुबह यहाँ की घड़ी के मुताबिक मैंने ग्यारह के आसपास स्तोकहोल्म आया। एयरपोर्ट से स्टेशन आकर वीरेन्द्र जी को फ़ोन किया। 2.8 की गाड़ी पकड़कर लगभग 6.30 बजे शाम को गॉथेनबर्ग आया। वीरेन्द्र जी स्टेशन पर मिल गये और हम साढ़े सात तक घर आ गये। वीरेन्द्र जी ने पिछले साल अपनी दाढ़ी साफ़ कर दी है और कोई ख़ास तब्दीली उनमें नहीं हुई है। वैसे कह रहे थे कि वे भी कुछ मोटे हो चले हैं। पेट निकल रहा है। अभी कुछ ख़ास पता तो नहीं चलता। मुझे तो उसी तरह एकहरे बदन के दिखायी दिये। हाँ, सिर के बालों की सघनता कुछ कम हो गयी है।

    स्वीडन बेहद ख़ूबसूरत देश है। और एक़दम आधुनिक। हमारे जैसे गँवार आदमी को तो परिस्तान सा लगता है। हर चीज़ ऑटोमेटिक। सीढ़ियाँ तक आपको नहीं चढ़नी पड़तीं। ऑटोमेटिक सीढ़ियाँ हैं। किसी सीढ़ी पर आप चढ़ जाइये। वह खिसकती हुई धरातल तक आपको ले जायेगी। पोस्ट ऑफ़िस या बड़े कार्यालयों के दरवाज़े अपने आप खुल जाते हैं। आप भीतर गये कि अपने आप बंद हो जाते हैं। फ़ोटो एलक्ट्रोनिक से संचालित होते हैं। बस, ट्राम सभी वातानुकूलित होते हैं। वैभव और ऐश्वर्य की नगरी है। बाथ रूम और टॉयलेट बहुत अच्छा है। घर की दीवारों के उपयोग कर लिये गये हैं। छोटी-बड़ी आलमारियाँ हैं जिनमें गंदे कपड़े, बैग, जूते वगैरह डाल दीजिए। हर बिल्डिंग में वाशिंग मशीन है जहाँ सूती, ऊनी, नायलोन सभी तरह के कपड़े आप धो सकते हैं। इतना बड़ा देश है। यहाँ कुल अस्सी लाख लोग रहते हैं।

    गॉथेनबर्ग ही नहीं, वीरेन्द्र जी ने  बताया, समूचा स्वीडन ही कुछ इसी तरह है। यहाँ के शहरों की प्लानिंग ही कुछ ऐसी हुई है। प्राकृतिक सौंदर्य को क़ायम रखते हुए उन्हें बसने योग्य बना दिया गया है। सभी पेड़ पौधे अपनी जगह पर। कुछ ऐसा लगता है जैसे हम जंगल में रहते हों। घर की बालकनी में खड़े हो जाओ, पहाड़ियाँ चारों ओर दिखायी देती हैं। हरी-भरी और पेड़ पौधों से भरी हुई। कहीं कबूतर दाना चुग रहे हैं, कहीं बिल्लियाँ टहल रही हैं। शहर के कुछ हिस्सों में बारहिसंगे भी मिल जायेंगे और लोमड़ियाँ भी। यहाँ बसंत ऋतु है। चारों ओर मखमली दूब है, जिनमें एक्ज़ाटिक किस्मों के फूल खिले हैं। झीलें तो इस देश में भरी पड़ी हैं। समुद्री तट पर है गॉथेनबर्ग।

    इस देश में समाजवादियों ने चालीस साल राज किया। उन्होंने कई ऐसे उपाय किये जिससे समाज में वर्ग भेद लगभग मिट गये हैं। ऊँची आमदनी वालों को बहुत टैक्स देना पड़ता है। उसे चुकाने के बाद जो रक़म उनके हाथ आती है उसमें तथा कम आमदनी वालों के वेतन में बहुत फ़र्क नहीं होता। सामाजिक सुरक्षा बहुत है। अस्पताल में चिकित्सा की व्यवस्था है। तनख़ाह से ज़्यादा पेंशन मिलती है। बेकारी की हालत में भत्ता। मंहगाई बहुत है लेकिन आमदनी के लिहाज़ से भारत की तुलना में सस्ता ही है।

    लेकिन समृद्ध देशों की अपनी समस्याएँ हैं। मसलन वीरेन्द्र जी बता रहे थे कि बेकारी का भत्ता अगर आपको मिलता है तो फिर आप काम करना क्यों पसंद करेंगे ? आप कल तक पढ़ाते थे। आज आपने तय किया कि यह काम नहीं करेंगे। क्या करेंगे आप ? कारख़ाने में काम करेंगे। चलिए, ट्रेनिंग लीजिए और इस दौरान आपको बेकारी का भत्ता मिलेगा। तनख़ाह से ज़्यादा पेंशन है। अगर आपने हाथ-पैर तुड़ा लिए या नर्वस ब्रेक डाउन हो गया या ब्लड प्रेशर बढ़ गया है, यह सिद्ध करा सके तो पेंशन लेकर मौज कीजिए। नौजवान लड़के-लड़कियाँ जंगलों, पहाड़ियों या बागीचों में घूमते और शराब पीते या मौज करते मिलेंगे। सरकारी ख़जाना ख़ाली होता जा रहा है। जीवन-स्तर को क़ायम रखने के लिए शासन को बहुत ख़र्च करना पड़ता है। दूसरे देश भी इस बीच औद्योगिक दृष्टि से विकसित होते जा रहे हैं। अगर कोरिया सस्ते दामों में जहाज़ बनाकर बेचता है तो फिर मंहगे दामों में बिकने वाले स्वीडी जहाज़ कौन खरीदेगा ? खाने-पीने की सारी चीज़ें बाहर से आती हैं। व्यापार ठप हुआ तो कैसे काम चलेगा ? तनख़ाहें आप कम नहीं कर सकते, जीवन-स्तर गिरा नहीं सकते, स्वतंत्र समाज होने के कारण लोगों को किसी भी तरह से मजबूर भी नहीं कर सकते – फिर प्रतियोगिता में आप कैसे टिक सकते हैं और कितने दिन ?

    ख़ाना खाने के बाद वीरेन्द्र जी वाश बेसिन में बर्तन धो रहे थे। बेसिन में झाग पैदा करने वाला पदार्थ – शायद सिट्रान – डाला। बर्तन तो धुल गये। झाग बहा दिया। यह झाग घरों से निकलकर कहीं एक जगह बहकर जाता है। वीरेन्द्र जी ने बताया कि ये झाग नष्ट नहीं होते और आप इनका समुद्र देख सकते हैं। इसी तरह टायलेट का पानी भी बहकर समुद्र में जाता है। समुद्र के जीव-जंतु इससे प्रभावित होते हैं। प्रदूषण का ख़तरा बढ़ता है। वैज्ञानिक आगाह कर रहे हैं कि पानी कम होता जा रहा है। अमेरिका में हज़ारों फुट ड्रिलिंग करने पर पानी निकलता है। हमें पानी का समझ-बूझकर उपयोग करना चाहिए। हर चीज़ यहाँ डब्बों या कार्ल्टन में मिलती है। इस्तेमाल करने के बाद आप बोतलें, कार्ल्टन, अख़बार, पैकेजेज़ फेंक देते हैं। west  का कल्चर क्या waste का कल्चर नहीं है ?

     आदमी क्या करे ? यदि प्रकृति को पश्चिम की तरह अपने अनुकूल न बनाये तो भारत या अन्य पिछड़े देशों के निवासियों की तरह कष्ट पाता है और मशीनीकरण करता चले तो दूसरी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। स्वीडन में दो-दो, तीन-तीन ट्रामें जुड़ी रहती हैं। लेकिन उनमें सिर्फ़ एक कर्मचारी होता है – ड्राइवर। उसके बटन दबाते ही दरवाज़े खुल जाते हैं और बंद भी हो जाते हैं। मशीन लगी है – यात्री स्वयं पैसे डालकर टिकट निकाल लेते हैं। हमारे यहाँ एक बस में ड्राइवर और कंडक्टर भी होता है। अगर हम स्वीडन का रास्ता अपनाते हैं तो बेकारी की समस्या का निराकरण कैसे करेंगे ? लेकिन अगर हम ऐसा नहीं करते तो जीवन-स्तर कैसे ऊपर उठेगा ? स्वीडन का ड्राइवर अगर चार आदमियों का काम करता है तो चार आदमियों का वेतन देकर उसका जीवन-स्तर उठा दिया गया है। यदि आप अपना बर्तन ख़ुद नहीं धोयेंगे तो नौकर रखिए। नौकर रखने का मतलब है आधी तनख़्वाह उसे देना। फिर आप भूखों मरेंगे। अगर ख़ुद बर्तन धोते हैं तो आधुनिक तरीक़ा अपनाना ही सुविधाजनक होगा। याने झाग के समुद्र बनेंगे और वातावरण प्रदूषित होगा। स्वतंत्रता नहीं देते तो रूस जैसे बंद समाज में रहना पड़ेगा और स्वतंत्रता देने से आदमी ग़ैर ज़िम्मेदाराना ढंग से आचरण करेगा। मेरे ख़याल से हमें किसी golden mean की तलाश करनी होगी। लेकिन कैसे ?

     आधुनिकता क्या सचमुच वरदान है ? हमारे यहाँ मिट्टी से बर्तन मांजे जाते हैं। पानी से बहा दो – मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है, प्रदूषण का कोई ख़तरा नहीं। गांधीजी ट्रेंच लेट्रिन के इस्तेमाल की सलाह देते थे। मिट्टी के नीचे कुछ दिन तक दबे रहने पर मल खाद बन जाता है। प्रकृति का हम शोषण ही करते रहेंगे क्या ? क्या पोषण साथ ही साथ करते रहना बुद्धिमत्ता नहीं है ? भोजन मल बनता है। मल भोजन भी बन सकता है। अगर उसे नष्ट करने के बदले हम उसकी खाद से अन्न उपजाने का काम करने लगें। पश्चिम की नकल करके स्काई-स्क्रेपर्स या सीमेंट कांक्रीट की बिल्डिंग बनाने के बदले हम अपने पुरखों की तरह मिट्टी के घरों में क्यों न रहें? मिट्टी के घर तपते नहीं। पहाड़ क्यों तोड़े जायें ? पेड़ क्यों काटे जायें ? पशु-पक्षी क्यों मारे जायें? प्रकृति का संतुलन निरंतर ही भंग करते रहना क्या आत्मघात करने जैसा नहीं ? मुश्किल यह है कि पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प का दावा करने वाली समाजवादी व्यवस्था भी उसी तरह मशीनीकरण पर ज़ोर देती है। मशीनी सभ्यता में विशेषज्ञों को वर्चस्वता मिलती है। याने नौकरशाही का बोलबाला। घूम-फिर कर आप फिर से उसी दुश्चक्र में फँस गये ! खरबूजे की तो हर तरह से जान साँसत में है – चाहे वह छुरी पर गिरे या छुरी उस पर !

     लेकिन औद्योगिक विकास के बिना न तो हमारा उद्धार हो सकता है और न व्यापक तौर से सम्पूर्ण मानव समाज का ही। अगर मशीनीकरण एक तरह की अमानवीय व्यवस्था को जन्म देती है तो ग़रीबी दूसरी तरह की अमानवीयता को। उत्पादन की गति बढ़ाये बिना तीसरा दुनिया के लोगों को मनुष्य का दर्जा कैसे भला कैसे दिया जा सकेगा? और संसार के बहुसंख्य भाग के निर्धनता रेखा के नीचे रहते हुए संसार में न्याय और संतुलन की स्थापना कैसे की जा सकेगी ? पश्चिम का रास्ता हमारे काम का नहीं। समाजवादी देशों द्वारा प्रस्तुत वैकल्पिक रास्ता भी उससे बहुत बेहतर या भिन्न नहीं है। तो फिर हम क्या करें ? एक रास्ता और है – जो गांधीजी ने बताया था। हमने उसे work out नहीं किया। उसके कई कारण हो सकते हैं। वह आसान रास्ता नहीं है। उस पर चलने के लिए सबसे पहले उसे अपने आपको बदलना होगा – पूरी तरह और सब लोगों को स्वेच्छा से। वह एक साथ ही निषेध और सम्पूर्ण प्रतिबद्धता की मांग करता है। निषेध है सुविधा और सुरक्षा का – अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य उनके सिद्धांत के निषेधात्मक पक्ष हैं और सत्य तथा अहिंसा सकारात्मक पक्ष। हम उत्पादन तो करें लेकिन surplus wealth का नहीं क्योंकि सरप्लस वेल्थ असमानता पैदा करेगा, साधन साध्य की जगह ले लेगा। मशीन से हमारी दुश्मनी नहीं हो सकती। यह शरीर भी तो आख़िर एक यंत्र ही है। विकृति तब पैदा होती है जब मशीन चालक की जगह ले लेती है। सबका जीवन-स्तर उठा देने से ही काम नहीं चलेगा। यह काम स्वीडन जैसे देशों में एक तरह से हुआ है और समाजवादी देशों में दूसरी तरह से। विपन्न और अभावग्रस्त मनुष्य पशु होता है लेकिन अतिशय समृद्धि और सम्पन्नता भी उसे फिर से वापस पशु बना देती है। हमें विकास के ऐसे बिन्दु की खोज करनी होगी जहाँ पहुँचकर हम कह सकें – ना, इसके आगे नहीं और इसके निर्णय का अधिकार किसी एक को या कुछ ही लोगों नहीं दिया जा सकता। हमारे लिए क्या अच्छा है, यह हमीं तय करें।

     स्वीडन ख़ासा बड़ा देश है। lengthwise इसका विस्तार लगभग उतना ही होगा जितना हिमालय से कन्याकुमारी का। हमारे यहाँ साठ करोड़ लोग रहते हैं और यहाँ अस्सी लाख। स्वच्छंद समाज है जहाँ मुक्त आचरण की खुली छूट है। डॉ. एलेक्स कम्फर्ट कहते हैं कि कान्ट्रासेप्टिव के आविष्कार ने मनुष्य को आज पहली बार चिन्ता-मुक्त किया है और वह निर्द्वंद्व भाव से उस चरम सुख की प्राप्ति में जुट सकता है जो जीवन में संभव है। ठीक है – लेकिन एक हद तक ही। सभी पुरुष एक-दूसरे के लिए ही बने हैं और जुड़कर ही वे परिपूर्ण होते हैं। यह भी सही है कि कन्ट्रासेप्टिव के आ जाने से उन्हें उन्मुक्त प्रेम की सुविधा भी हासिल हो गयी है। लेकिन इसके दूसरे complications भी तो हैं। अवांछित संतान धरती पर न आये, यही ठीक है, लेकिन यह ख़तरा भी तो पैदा हो सकता है कि ऐसी जीवन-दृष्टि के चलते एक दिन प्रजनन ही थम जाएगा। फिर सृष्टि कैसे चलेगी ? अवांछित संतान को लाने से बचने की कोशिश करते-करते कहीं हम संतान की वांछा को ही न त्याग दें। और मुक्त यौनाचार वाले इस समाज की इतनी थोड़ी आबादी क्या इस बात का सूचक नहीं कि स्वीडियों की प्रजनन क्षमता कम होती जा रही है? याने ये लोग वर्तमान को सुखकर बनाने के चक्कर में भविष्य को अस्वीकृत भी कर रहे हैं। सुखभोग बुरा नहीं, लेकिन क्या सुखभोगवादी होना श्रेयस्कर है ?  कान्ट्रासेप्टिव के पहाड़ के नीचे यहाँ के बच्चों की लाशें दफ़्न हैं। अपने जीवन-स्तर को बनाये रखने के लिए या उसे उत्तरोत्तर ऊँचा उठाने के लिए ज़रूरी है कि बर्थ-रेट पर रोकथाम हो। शायद मूल बात यही है कि आर्थिक संतुलन न गड़बड़ाये। सब लोगों को इफ़रात पैसे मिलते हैं। बीमार हुए तो मंहगी से मंहगी दवाइयाँ मिलती हैं। बूढ़े या अपाहिज हो गये तो पेंशन, बेकार हुए तो भत्ता। लम्बी उम्र होती है। आबादी बढ़ जायेगी तो सुविधाएं कम हो जायेंगी। यावद् जीवेत् सुखम् जीवेत। कैसा अन्तर्विरोध है यहाँ के जीवन में। लोग अच्छे हैं, शांत और ख़ुशमिज़ाज़। हिंसा और क्रूरता से यहाँ के लोगों को बड़ी वितृष्णा है। यहाँ का सेंसर बोर्ड हिंसा के दृश्यों को बेरहमी से काट देता है। शोले जैसी फ़िल्म यहाँ नहीं बनायी जा सकती। पशु-पक्षियों से यहाँ के लोगों को बेहद लगाव है। वीरेन्द्रजी के घर के पीछे लगे पेड़ों में डिब्बे बने हुए हैं ताकि उत्तरी अटलांटिक या भूमध्यसागर या अफ़रीका से उड़कर आने वाले पक्षी उसमें बसेरा कर सकें। किसी ने बिल्ली पाली है। उसके बच्चे होने पर वह अख़बारों में इश्तहार छपवा देता है कि बिल्ली के बच्चे चाहिए तो अमुक पते पर सम्पर्क स्थापित करें। बात की बात में वे बच्चे बँट जाते हैं। लोग पशुओं-पक्षियों से बच्चों जैसा प्यार करते हैं। लेकिन यहाँ के लोग अपनी वंश-परम्परा के प्रति उदासीन हैं। इतना भी नही सोचते कि यही रवैया ज़ारी रहा तो ऐसा अच्छा समाज कुछ बरसों के भीतर ही ख़त्म हो जायेगा।

  प्रमोद वर्मा

 
         
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