जादू-कथा

प्रकाशन :2/25/2012
शशिकांत गीते
भैया रे! ओ भैया रे!
है दुनिया जादू-मंतर की

पार समुंदर का जादूगर
मीठा मंतर मारे
पड़े चाँदनी काली, होते
मीठे सोते खारे
बढ़ी-बढ़ी जाती गहराई
उथली धरती, खंतर की

अपनी खाते-पीते ऐसा
करे टोटका-टोना
कौर हाथ से छूटे, मिट्टी
होता सारा सोना
एक खोखले भय से दुर्गत
ठाँय लुकुम हर अंतर की

उर्वर धरती पर तामस है
बीज तमेसर बोये
अहं-ब्रह्म दुर्गंधित कालिख
दूध-नदी में धोये
दिग्-दिगन्त अनुगूँजें हैं मन
काले-काले कंतर की

पाँच पहाड़ी, पाँच पींजरे
हर पिंजरे में सुग्गा
रक्त समय का पीते
लेते हैं बारूदी चुग्गा
इनकी उमर, उमर जादूगर
जादू-कथा निरन्तर की


  शशिकांत गीते
 
         
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