वरिष्ठ कवि और गीतकार डा. महेंद्रभटनागर से मेरा परिचय आधी सदी से भी अधिक पुराना है। तब से लेकर अब-तक उनकी अठारह काव्य-कृतियों का प्रकाशन हो चुका है। हिन्दी काव्य-जगत में उन्होंने एक प्रगतिशील कवि के रूप में प्रवेश किया था। सन् 1958-59 के आसपास आगरा से एक पत्रिका निकलती थी ‘समालोचक’ जिसके सम्पादक थे डा. रामविलास शर्मा और सम्पादन में सहयोग कर रहे थे श्री. राजनाथ शर्मा और प्रो. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय। आगरा कालेज के हिन्दी-विभाग में प्राध्यापक तथा ‘विनोद पुस्तक मंदिर’ के लेखकीय परिवार में होने के नाते श्री. रामगोपाल सिंह चैहान और मैं भी ‘समालोचक’-परिवार से अभिन्न रूप से जुड़े हुए थे। उन्हीं दिनों श्री. महेंद्रभटनागर की एक काव्य-कृति ‘नयी चेतना’ (प्रकाशन 1956) की समीक्षा मैंने ‘समालोचक’ में की थी। (द्रष्टव्य: विस्फूर्जित आलोक की कविताएँ, ‘महेंद्रभटनागर का रचना-संसार’, सं. डा. विनयमोहन शर्मा, पृष्ठ 53-55, प्र॰ चित्रलेखा प्रकाशन, इलाहाबाद )।
तभी से महेंद्रभटनागर जी के साथ मेरा मैत्री और बन्धु-भाव का सिलसिला आज-तक बरक़रार है। दर्जनों पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं जो उस सिलसिले के दस्तावेज़ हैं। सन् 1963 में उनकी प्रसिद्ध काव्य-कृति ‘संतरण’ प्रकाशित हुई । इसकी भी समीक्षा मैंने लिखी। (द्रष्टव्य :बहुआयामी कवि-व्यक्तित्व, ‘सामाजिक चेतना के शिल्पी कवि महेंद्रभटनागर’, सं. डा. हरिचरण शर्मा, पृष्ठ 141-145, प्र. वोहरा प्रकाशन, जयपुर)। 25-30 वर्ष पहले किसी काम से जब वे ग्वालियर से दिल्ली आए थे तो मेरे शाहदरा (दिल्ली) निवास पर अचानक और अनायास ही आ-पधारे थे। इन टूटे-छूटे और बिखरे हुए सूत्रों का समायोजन मैंने इसलिए किया है कि ये उनकी मिलनसारी और रिश्तों को दूर-तक निभानेवाली सद्भावी-प्रकृति के गवाह हैं।
क़रीब छह महीने पहले डा. महेंद्रभटनागर ने एक बड़े-से लिफ़ाफ़े में मेरे पास अपनी छोटी-छोटी-सी पचास कविताओं की प्रति भेजी थी — इस आशय के साथ कि मैं उन पर प्रतिक्रिया-स्वरूप कुछ लिखूँ। ( ये रचनाएँ ‘जनवादी लेखक संघ, वाराणसी’ की अनियतकालीन पत्रिका ‘जनपक्ष’ (8 - जुलाई-दिसम्बर 2009) के ‘कवि महेंद्रभटनागर-विशेषांक’ में, ‘नवगीत: महेंद्रभटनागर’ शीर्षक से निम्नलिखित टिप्पणी के साथ प्रकाशित हुई थीं — ‘‘गीतकार महेंद्रभटनागर की नवगीत-सृष्टि सहज है। सन् 1949 से लिखित उनके नवगीत उपलब्ध हैं। उस समय तक ‘नवगीत’ काव्यान्दोलन प्रारम्भ ही नहीं हुआ था। ‘री हवा!’ (‘अंतराल’ कविता-संग्रह में समाविष्ट / रचना 1949) उनका प्रथम नवगीत है; जो अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। यह गीत अनेक भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनूदित है। महेंद्रभटनागर-विरचित नवगीत विशिष्ट हैं। वे गेय हैं। छंद का बंधन ज़रूर नहीं है; किन्तु वे छंद-मुक्त नहीं हैं। चरणबद्ध हैं। उनमें एक निश्चित मात्रिक-क्रम है। तुकों का व्यवस्थित प्रयोग है। उनके नवगीतों का शिल्प उनका अपना है। माना, इस शिल्प में, इधर अन्य गीतकारों द्वारा भी कुछ नवगीत लिखे गये हैं; लिखे जा रहे हैं। निःसंदेह, महेंद्रभटनागर की नवगीत संबंधी मौलिक विशेषताएँ द्रष्टव्य हैं।’’)
स्वास्थ्य और लेखकीय सक्रियता की दृष्टि से वर्ष 2010 मेरे लिए अधिक अनुकूल नहीं रह पाया; फलतः प्रतिक्रिया-लेखन का प्रस्ताव भी विलम्बित होता चला गया। अब जब कुछ लिखने-पढ़ने का मन बनने लगा तो इच्छा हुई कि महेंद्रभटनागर साहब की कविताओं से रू-ब-रू हुआ जाये और गीत-नवगीत, छन्द तथा लय को लेकर ही क्यों न अपनी बात पाठकों के सम्मुख रखी जाये!
यहाँ इन गीतों पर कुछ टिप्पणी करते समय कई ऐसे मुद्दे मेरे सामने आकर खड़े हो रहे हैं जिनपर कुछ कहे बग़ैर बात आगे नहीं बढ़ायी जा सकेगी। अंग्रेज़ी साम्राज्यशाही से पेश्तर लगभग एक हज़ार वर्ष तक हमने जो मुश्तरफ़ा संस्कृति स्वायत्त कर रखी थी उसमें अनेक भिन्नताओं के चलते भी एक संश्लेषण का प्रच्छन्न सूत्र विद्यमान था जिस पर यूरोपीय जीवन-शैली ने प्रत्यक्ष रूप से आघात किये थे फलतः जो बात पं. नेहरू के लिए कही जाती है वह आम हिन्दुस्तानी पर भी लागू होती है और वह बात है ‘स्पिलिट पर्सनेलिटी’ की। हमारा नव-शिक्षित और नव-प्रबुद्ध समाज जहाँ चिन्तन के स्तर पर पश्चिमोन्मुख होता जा रहा था वहाँ संस्कारतः मूलभूत सांस्कृतिक चेतना तब भी बहुत कुछ औपनिषदिक और सूफ़ी दृष्टिकोण को आत्मसात् किये हुए थी। जहाँ स्वाधीनता-प्राप्ति के तहत देश के दो टुकडे़ हुए वहाँ वैयक्तिक स्तर पर भी हम एक दोराहे पर आ खड़े हुए। यह द्वैधी स्थिति हिन्दी कविता में भी भलीभाँति परिलक्षित होती है। छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के नाम पर कविता में जितनी शक्तियाँ समुद्गत हुईं वे पूर्वा पर त्वेन रूप से परस्पर संगुम्फित हैं । पन्त जी औैर निराला जी का काव्य इसका ज्वलन्त उदाहरण है। वे छायावाद और प्रगतिवाद दोनों के ही प्रवर्तक रचनाकार हैं। परवर्ती रनाकारों ने मौलिक संधान की अपेक्षा पूर्व-निर्मित काव्य-सरणियों का ही अनुगमन किया। अतः विगत साठ-सत्तर वर्षों में जो निरन्तर कवि-कर्म से जुड़े रहे उन सभी रचनाकारों में उपर्युक्त काव्यगत-त्रिभंगिमा का अन्वेषण किया जा सकता है और महेन्द्रभटनागर का कविकर्म भी इसका अपवाद नहीं है। उन्होंने छायावादी रूमानियत, प्रगतिवादी क्रांतिधर्मिता और शिल्प के स्तर पर प्रयोगपरकता का समन्वित निर्वहण किया है।
यह एक तथ्य है कि महेंद्रभटनागर के गीत किसी भी प्रतिनिधि नवगीत संकलन में समाविष्ट नहीं हैं भले ही उनका संपादन ओम प्रभाकर, शंभुनाथ सिंह, चंद्रदेव सिंह, देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’, राजेंद्र प्रसाद सिंह अथवा भारतेंदु मिश्र और परवर्ती वीरेंद्र आस्तिक या निर्मल शुक्ल में से किसी ने किया हो। इसकी पृष्ठभूमि में संपादकों की अज्ञानता और व्यक्तिगत रुचि के अतिरिक्त स्वयं महेंद्रभटनागर की उदासीनता भी हो सकती है तथापि उनके अविराम कविकर्म के मद्देनज़र कहीं तो उन्हें पंक्ति में स्थापित करना ही होगा और ऐसा न करना उनके साथ सरासर बेइंसाफ़ी भी होगी। गीत के संदर्भ में नवता के अन्वेषी जिस प्रकार आज उदार दृष्टि से वस्तुओं का पुनरावलोकन और पुनर्मूल्यांकन करने में प्रवृत्त हो रहे हैं वही प्रवृत्ति महेंद्रभटनागर के परिप्रेक्ष्य में भी प्रयोजनीय है, ख़ासतौर से तब जबकि वे स्वयं अपने अनेक गीतों को ‘नवगीत’ कहने लगे हैं। आज जहाँ एक वर्ग ‘नवगीत’ के अभिधान को पानी पी-पी कर कोस रहा है वहाँ उस वर्ग के गीतकारों, कवियों और समीक्षकों से कई गुना अधिक लोग नवगीत के शामियाने तले बैठने के लिए उत्सुक नज़र आ रहे हैं। मुझे यह स्वीकार करते हुए तनिक भी द्विधा नहीं कि महेंद्रभटनागर भले ही सोलहों-आना नवगीतकार न हों किन्तु उनके इन विचारणीय गीतों में ‘नवगीतात्मकता’ का तत्त्व लबालब है। ये गीत किसी भी निकष पर उपेक्षणीय नहीं हैं।
प्रश्न उठता है कि ‘नवगीतात्मकता’ है क्या? इसके समाधान में मेरा निवेदन है कि वह रचना जो अपने बहिरंग स्ट्रक्चर के स्तर पर भले ही ‘गीत’ न हो किन्तु वस्तुगत भूमि पर नवेन्मेषमयी हो उसे नवगीतात्मक ही कहना संगत होगा। ‘जुही की कली’, ‘शेफालिका’, ‘विधवा’, ‘तोड़ती पत्थर’ और इन जैसी ‘निराला’ जी की अनेक कविताएँ ‘नवगीत’ न होकर ‘नवगीतात्मक’ ही हैं। यद्यपि ‘निराला’ से पहले भी श्रीधर पाठक आदि कवियों ने इस ढब की रचनाओं का द्वारोद्घाटन कर दिया था तथापि ‘निराला’ सर्जना और समीक्षात्मक स्तर पर इस शैली में सर्वमान्य स्वीकृत हस्ताक्षर हैं। आरंभ के दौर में ‘निराला’ की तर्ज़ पर ऐसे प्रयोग ‘प्रसाद’ जी ने भी किये थे जो उनके ‘लहर’ शीर्षक गीत-संग्रह में ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’, ‘शेरसिंह का शस्त्र समर्पण’ और ‘प्रलय की छाया’ जैसी रचनाओं में देखे जा सकते हैं। प्रगतिवादी दौर में अधिकांश प्रसिद्ध और उल्लेखनीय कवियों ने इस पद्धति का अनुसरण किया तो प्रयोगवाद और नयी कविता का दौर आते छंद और मुक्तछंद में लिखने की परंपरा ही रुद्ध तथा बहिष्कृत हो गयी, और छंदयुक्त लेखन को ही सर्वात्मना स्वीकृति दी जाने लगी। यह कहने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि लय और छंद अन्योन्याश्रित होते हैं। इन दोनों में ही अविनाभावी सायुज्य है। यही कारण है कि छंदमुक्त शैली में लिखनेवालों ने ही ‘अर्थ की लय’ का नारा दिया। विशुद्ध नवगीतों में छंद और लय दोनों की समवेत संस्थिति होती है।
महेंद्रभटनागर के प्रतिपाद्य गीतों में ‘छंदों की बुनावट’ भले ही न हो किन्तु वे लय की कसौटी पर खरे उतरते हैं। उनमें छंदोमुक्त गद्यात्मकता और सपाटबया कहीं नहीं मिलती। मैंने इसीलिए उन्हें ‘नवगीत’ न कहकर ‘नवगीतात्मक’ कहा है, और शायद इसीलिए वे मेरे प्रिय रचनाकार भी हैं। महेंद्रभटनागर के इन गीतों को ‘नवगीतात्मक’ कहने का आशय उन्हें कमतर मानने का क़तई नहीं है। इस शैली में छायावाद / प्रगतिवाद के परवर्ती रचनाकारों ने प्रचुर मात्रा में लिखा है। स्वयं इन पंक्तियों के लेखक की, दो संग्रहों में समावेश्य रचनाएँ ही होंगी। यहाँ इस तथ्य को मैं ज़ोर देते हुए दोहराना चाहूंगा कि गीत के लिए जितना ‘छंद’ आवश्यक है उतनी ही ‘लय’। लय यदि आत्मा है तो छंद उसको धारण करनेवाला ‘कलेवर’ है। प्रकारांतर से लय यदि जनक है तो छंद उसका जन्य हैं। कविकर्म के संदर्भ में कहा गया है — ‘छन्दोभंग न कारयेत्’ और छन्दोभंग की स्थिति तभी आती है जब रचनाकार का ‘लय’ पर अभीष्ट अधिकार न हो। भिन्न-भिन्न लयानुबंधों से ही विविध प्रकार के छंद जन्म लेते हैं जैसे सवैया, घनाक्षरी, गीतिका, रूपमाला आदि छंदों की अपनी-अपनी विशिष्ट लय है वैसे ही उन लयों से निर्मित मुक्तछंद के रूप भी अनेकानेक होते हैं। ‘जुही की कली’ और ‘वह तोड़ती पत्थर’ तथा ‘भिक्षुक’ तीनों ही मुक्तछंदी रचनाएँ हैं तथापि लय-भिन्नता के आधार पर उन्हें एक दूसरे से अलगाया जा सकता है। महेंद्रभटनागर को लय का पूरा प्रज्ञान है।
लय, छांदसिकता, गीत, नवगीत और नवगीतात्मका सम्बंधी इस विहंगम विमर्श के चलते, हम यहाँ एक भ्रांति की ओर भी इंगित करना चाहेंगे। स्वभावतः नवगीत-विद्वेषी पारम्परिक (मंचीय) गीतकारों और नयी कविता के पक्षपाती इधर एक भ्रामक प्रचार करते नहीं रहे कि नवगीत में जिस बोध-पक्ष और चेतना-पक्ष का उन्मेष हुआ वह प्रयोगवाद और नयी कविता का ही प्रसाद अथवा ‘उच्छिष्ट’ है। ऐसे सोच पर हँसा या रोया ही जा सकता है। क्या बौद्धिकता और आधुनिकता का ठेका इन्हीं लोगों ने ले रक्खा है? क्या जागरूक नवगीतकारों का लिखने-पढ़ने या सोचने का ‘पारपत्र’ भी उन्हें नयीकवितावादियों से ही लेना होगा? क्या अकेलापन, व्यर्थता-बोध, मूल्यगत परिवर्तन अथवा मूल्यभ्रंशजनित अवसाद, समाज में व्याप्त अमानवीय स्थितियों के प्रति विक्षोभ, पारिवारिक विघटन, भौतिकवादी जीवन-दृष्टि, भ्रष्टाचार आदि विषयों पर लिखने का अधिकार केवल नयी कविता के अलमबरदारों तक ही महदूद, मरकूज़ और महफू़ज़ है? क्या इन प्रवृत्तियों की छाप नयी कहानी और औपन्यासिक लेखन में नहीं परिलक्षित होती? मेरा अपना मानना तो यही है कि ये वे व्यापक स्थितियाँ हैं जिनका अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रभाव भारत के प्रत्येक व्यक्ति, लेखक और सर्जनाधर्मी रचनाकार पर न्यूनाधिक मात्रा में पड़ा है। ‘नवगीत’, ‘नयी कविता’ का ‘सहगामी’ तो है, ‘अनुगामी’ क़तई नहीं है। समाज में जैसे क्रिया-प्रतिक्रिया के नाते हर व्यक्ति एक-दूसरे से जुड़ा है वैसे ही सभी समकालीन साहित्यिक विधाएँ परस्पर प्रभावित होती हैं।
कवि महेंद्रभटनागर की इन नवगीतात्मक रचनाओं को इन्हीं उदार और विशद पैमानों पर परखने की ज़रूरत है। रचनात्मकता के इस प्रस्थान-बिंदु तक आते-आते वे ‘प्रगतिवाद’ अथवा मार्क्सवाद की जड़ीभूत और सांस्थानिक-परिसीमाओं से मुक्त हुए हैं। इसके साथ-साथ इन रचनाओं में द्वैतवाद, अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद और शुद्धाद्वैतवाद जैसी दार्शनिक चिंतना की खोज करना भी अप्रासंगिक होगा। ‘सत्य’, ‘शिव’ और ‘सुंदर’ की कलापूर्ण अभिव्यक्ति का प्रतिमान हैं ये रचनाएँ। इन रचनाओं के भीतर से जिस आदर्श और यथार्थ की व्यंजना होती है उसका मूल आधार है ‘मनुष्य’ और उससे गहरे तक जुड़ी हुई ज़िंदगी ‘जीवन: एक अनुभूति’ शीर्षक रचना को यहाँ उद्धृत करना चाहेंगे:
ज़िंदगी:
एक बेतरतीब सूने बंद कमरे की तरह,
दूर सिकता पर पड़े, तल-भग्न बजरे की तरह,
हर तरफ़ से कस रही गाठें
सुलझता कुछ नहीं!
पर, जी रहा हूँ
आग पर शैया बिछाए,
पर, जी रहा हूँ
शीश पर पर्वत उठाए!
पर, जी रहा हूँ
कटु हलाहल कंठ का गहना बनाए,
ज़िंदगी में बस
जटिलता-ही-जटिलता है
सरलता कुछ नहीं!’’
यही वह जटिलता है जो व्यक्ति को न मुकम्मल तौर पर हँसने देती न उदास होने देती है:
गा न पाया कभी
एक भी गीत मैं हर्ष का,
एक भी गीत मैं दर्द का!
गूँजता रव रहा
मात्र:
संघर्ष .... संघर्ष .... संघर्ष!
विश्रांति के पथ सभी मुड़ गए!
ज़िंदगी के बरस रे कई
देखते .... देखते उड़ गए!
‘चाह’ शीर्षक कविता में कवि की अभीप्सा है कि व्यक्ति के ऊपर क़िसिम-क़िसिम के विधि-निषेधों का शिकंजा जन्म से मृत्यु-पर्यन्त कसा रहता है। वह इस शिकंजे को तोड़ना तो चाहता है किन्तु परिस्थितियाँ उसे वैसा करने नहीं देतीं; जैसा कि ‘घटना-चक्र’ नामक कविता से स्पष्ट होता है :
जीवन अबाधित बहे‘आग्रह’ नामक कविता में वह अपनी मानवीय शुभाशंसाओं को व्यक्त करते हुए लिखता है:
जय की कहानी कहे!
मधु-स्वप्न देखे सदा
झूमे हँसे गहगहे!
मायूस कोई न हो
लगते रहें क़हक़हे!
आदमी को मत करो मजबूर
इतना कि
बेइंसाफ़ियों को झेलते —
वह जानवर बन जाय!
या बेइंतिहा
दर्द की अनुभूतियों को भोगते
वह खण्डहर बन जाय!
अच्छा कवि सदैव मानवीय-मुक्ति का पक्षधर होता है। महेंद्रभटनागर भी इसी मानव-मुक्ति के गायक हैं। वे हर प्रकार के शोषण के विरोध में अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं। ‘परिणति’ शीर्षक कविता इसका परिणाम है:
आजन्मवह अपनी जनपक्षधरता को इन शब्दों में वाणी देता है:
वंचित रह
अभावों-ही-अभावों में
घिसटती ज़िंदगी
औचट दहकती यदि
सहज;
आश्चर्य क्या है?
पछतावे का ज्वार उठा जब उर में
कोमल शैया पर कैसे सोया जाय!
बंजर धरती की कँकरीली मिट्टी पर
नूतन जीवन कैसे बोया जाय!
(‘नियति’)
अपने समसामयिक कवियों की भाँति रूपासक्ति, शृंगार-भावना, प्रणयानुभूति और तज्जनित संयोग-वियोग की संवेदनाओं को भी कई गीत कविताओं में उन्होंने बड़े मर्मस्पर्शी रूप में प्रस्तुत किया है। ऐसा करने से उनके मानव-मंगलवादी सोच पर तनिक भी बट्टा नहीं लगता और न ही वे इन संक्षिप्त गीत कविताओं की बिना पर प्रतिक्रियावादी अथवा रुग्ण-रूमानी भावधारा के रचनाकार ही ठहराये जा सकते हैं। ‘निकष’ में वे कहते हैं:
किसी मधु-गंधिका के
प्यार की ऊष्मा-किरण
मुझको छुए तो —
मोम हूँ!
किसी मुग्धा चकोरी के
अबोध, अधीर, भटके दो नयन
मुझ पर पड़ें तो
सोम हूँ!
और —
क्या-क्या न जीवन में किया
कुछ पल तुम्हारा प्यार पाने के लिए!
डूबा व उतराया सतत
विश्वास का आधार पाने के लिए!
जैसी अनेक लघुगीतिकाएँ यहाँ उद्धृत की जा सकती हैं जिनसे सरलमना कवि की कोमल राग-संवेदना का अनुमान लगाया जा सकता है। एक अन्य रचना — ‘एक साध अधूरी’ — में वे लिखते हैं:
जी करता है — आज का दिन
ज़िंदगी की कश-म-कश से हटकर
बंद कमरे में
सोए-सोए गुज़ार दूँ!
न जाने कितने बरसों से
निश्चिंत बेख़बर हो
आदिम-राग का, अनुराग का
अहसास भर सोया नहीं!
जी करता है — आज का दिन
निश्चेष्ट शिथिल चुप रह
चित्रमाला में अतीत की
खोए-खोए गुज़ार दूँ!
न जाने कितने बरसों से
उजड़े गाँवों की राहों में
छूटे नगरों की बाँहों में खोया नहीं!
जी करता है — आज का दिन
सारे वादे, काम, प्रतिज्ञाएँ भूलकर
गंगा की लहरों-सी तुम्हारी याद में
रोए-रोए गुजा़र दूँ!
न जाने कितने बरसों से
तुम्हारी तसवीर के
रू-ब-रू हो रोया नहीं!
यहाँ न कोई भाषागत अलंकरण है न वाग्वैदग्ध्य तथापि कवि के साथ पाठकीय तादात्म्य स्थापन में कोई आयास नहीं करना पड़ता, अलबत्ता प्रस्तुत उद्धरण में न गीतात्मकता न लय और न छंद — सीधे-सादे तरीक़े से कहा जाये तो यह ‘नयी कविता’ जैसी सपाटबयानी है, फिर भी वेदना और संवेदन से भरपूर।
मुझे आशा और विश्वास है कि कवि महेंद्रभटनागर की इस अभिनव काव्य-कृति का काव्यप्रेमियों के समाज में स्वागत किया जायेगा। वे मेरे साधुवाद के भाजन हैं। इत्यलम्।


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