श्रेणियाँ

साक्षरता, शिक्षा और साहित्य पर विचार करते हुए

प्रकाशन :गुरूवार, 1 अप्रेल 2010
विश्व रंजन

लोक की दुनिया : निरक्षर किन्तु शिक्षित और मूल्याश्रित

मैं शुरुआत इतिहास की ओर निगाहें डालते हुए कहना चाहूँगा कि जब समाज अक्षर-परिचित नहीं था, पढ़ी-लिखी और शिक्षित आबादी भी नहीं थी, तब भी साहित्य तो था । विडम्बना देखिए कि साहित्य को हम जिन अक्षर-समूहों के मध्य तलाशते हैं वे एक समय उपस्थित ही नहीं थे, और इतना ही नहीं, समाज में शिक्षा का कोई स्पष्ट सुपरिभाषित तंत्र भी शायद ईज़ाद नहीं हुआ था किन्तु वह समाज साहित्य-शून्य नहीं था। भले ही वह वाचिक स्वरूप में था । वह काग़ज़ के तन में नहीं था, लोक के मन में था। तो क्या यह प्रश्न नहीं उठता कि लोक अपने तईं बगैर साक्षरता, शिक्षा और लिखित साहित्य के भी साहित्यविहीन नहीं हुआ करता । और लोक में उसी (लोक) साहित्य से ही साक्षरता और शिक्षा जैसी भूमिकाओं का निर्वहन हुआ करता था । इसे इसलिए भी हम नहीं नकार सकते क्योंकि लोक साहित्य में भी तात्कालीन समाज के साक्ष्य मौजूद हैं। तब भले ही पाठक नहीं थे, प्रकाशक नहीं थे, आलोचक नहीं थे । वाचक थे, श्रोता थे और आत्मसातीकरण करनेवाला एक बृहत समाज भी था । इस बृहत समाज को आधुनिक मूल्यों और विकासवादी सिद्धांतो के चलते भले ही आज निरक्षर और अनपढ़ समाज कह दिया जाये किन्तु वह अपने अनुभवों, चुनौतियों, विडंबनाओं, विद्रुपताओं से जूझता तो था ही । यदि ऐसा न होता, तो अक्षरविहीन और शिक्षाविहीन समय के लोकसाहित्य में अपने समय का मुठभेड़ नहीं होता । समकालीन मनुष्य के स्वप्नों और इच्छाओं के लिए जद्दोज़हद नहीं होता । जीवन के विभिन्न अनुभव, संवेदना, विश्वास, शंका उसमें मूर्त नहीं होते । कहना अनुचित नहीं होगा - ऐसे दौर में भी श्रोताओं (पाठकों का नहीं) का परिचय मनुष्य के संघर्षों, अंतर्द्वंद्वों और उम्मीदों से होता तो था ही, जिससे आलोचनात्मक जीवन दृष्टि विकसित होती थी । कहना तो यह भी उचित होगा कि विशुद्ध लोक-समाजवाले दौर में भी श्रव्यता की ऐसी प्राकृतिक प्रविधि सक्रिय थी जिसमें मनुष्यता के ठोस, जीवंत और तात्कालिक विवरणों की महीन संवेदनशीलता विन्यस्त थी। ऐसे में यह वास्तविकता भी ग्राह्य होनी चाहिए कि ऐसे मौख़िक साहित्य अर्थात् लोक साहित्य में भी ज़िंदगी को बदलने का दमख़म था । भले ही उसकी गति धीमी रही हो। वह मनोरंजन मात्र नहीं था, उसमें कुछ न कुछ परिमाण में तात्कालीन समाज और मनुष्य के आसपास की ज़िंदगी के साथ रिश्तों को बदलने का माद्दा भी था । तब लोक साहित्य का वाचक ऐसा नहीं रह जाता होगा जैसा वह लोक साहित्य के परिसर में प्रवेश के पूर्व होता था, या उसके समक्ष दुनिया ठीक वैसी नहीं रह जाती होगी जिस रूप में उसे मिली थी ।

लोक साहित्य भी निरक्षरता, अशिक्षा के विरूद्ध एक शंखनाद ही था । यद्यपि वहाँ लेखक अनुपस्थित था किन्तु समाज स्वयं अपनी सांस्कृतिक ज़रूरतों और स्वप्नों को पहचानता था और समाज को नवीन, नैसर्गिक और समरसता की लय में लाने के लिए पुरातन बिम्बों के बरक़्स नये बिम्बों का सृजन करता था। यहाँ एक तथ्य यह भी ग़ौर करने लायक है कि लोक साहित्य सर्वव्यापी आत्मचिंतन, स्वीकृति से भी लैश था । अर्थात् लोक साहित्य लेखक, पाठक, प्रकाशक, आलोचक, प्राध्यापक विहीन होकर भी अपने निरक्षर श्रोताओं के मध्य शिक्षित संसार की चेष्टा का एक आयाम ही था ।

यहाँ मेरे कथन का आशय कदापि यह नहीं कि मैं लोक के समक्ष साक्षरता और शिक्षा पर बहस करते वक़्त साक्षरता और शिक्षा की अपरिहार्यता को ध्वस्त करना चाहता हूँ । मैं कहना सिर्फ़ इतना ही चाहता हूँ कि जनम से मरण काल तक जीवनधारा के निर्धारक तत्वों में हर समय कुछ विश्वास, मूल्य और संस्कार होते ही हैं जो पुराने बिम्बों के साथ लयाकार भी होते हैं तो ठीक दूसरी ओर यहीं से नये बिम्बों का निर्माण कर सामाजिक परिवर्तन की बुनियाद भी गढ़ते हैं । ऐसे समय साक्षरता और शिक्षा जैसे मनुष्य निर्मित परिवर्तनकारी उपायों के बग़ैर भी परिवर्तन के दृश्यों का प्रमाणीकरण मौज़ूद है । संक्षेप में कहें तो लोक स्वयं अपने लोक या दी हुई दुनिया के विरूद्ध सार्वजनिक हस्तक्षेप करने में सक्षम रहा है । तादात का वैज्ञानिक प्रश्न यहाँ बहुत बेमानी होगा क्योंकि हम देख चुके हैं कि एक साक्षर और शिक्षित समाज में भी साहित्य द्वारा निर्धारित मूल्यों वाले उज्ज्वल शब्दों, वाक्यपदों भावार्थों, संकेतों के बावजूद भी मनुष्य को विरोधी घटनाओं-परिघटनाओं की लंबी श्रृंखला चौंकाती रहती हैं । ज्ञान के विशेषीकरण के मुक़ाम पर पहुँचकर वैज्ञानिक प्रकल्पों के सहारे दो दो विश्वयुद्धों की विभीषिका; विकसित और शिक्षित देशों की नियति नहीं उनकी खोटी नियत का परिणाम है । मानवविरोधी उपनिवेशवाद, रंगभेद और अब बाज़ार के अदृश्य षडयंत्रों के विरूद्ध, समूची इंसानी आबादी को उपभोक्ता में तब्दील करने के पीछे जो रहस्यवृत है वह संसार की शिक्षा के मूल उद्देश्यों को नकारे जाने का इशारा नहीं है तो और क्या है ?

एक बात ख़ास तौर पर – जब हम शब्दों की दृश्य और अदृश्य उपस्थिति के कोण से लोक समाज और नागर समाज या विकसित समाज का विवेचन करते हैं तो कुछ अचरजभरी वास्तविकता से भी साक्षात् होता है – जिसमें हम उस लोक समाज को कहीं अधिक अक्षर या शब्दविश्वासी भी पाते हैं जो वर्णमाला से सर्वथा अपरिचित है । वहाँ अक्षर ब्रह्म की तरह मौजूद है । आप किसी भी लोक समाज के किसी भी जन से पूछिए – वह यही कहेगा कि पुस्तकों में लिखा है तो सच ही होगा । वह लिखे हुए शब्दों की सच्चाई और टुच्चाई के बीच फाँक नहीं कर सकता । वह लिखाई और लेखक के सच के बीच दरार को भी नहीं देख सकता। साक्षरता को इसी दरार की पतासाज़ी के लिए कारग़र टूल्स के रूप में देखा जाना चाहिए ।

Error : Empty Script Tag


  विश्वरंजन
पुलिस महानिदेशक
जी-2/15, शांति नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़ - 492001
मो. 9981551000
ई-मेल-prodgpcg@gmail.com

  विश्व रंजन
सी-2/15, शांति नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़ – 492001
dgp_chhattisgarh@yahoo.com
  Bookmark and Share
टिप्पणी लिखें
 
वाक्यांश खोजें




Bing


Site Search Site Search
लेखागार (Archive)